किशोरों में आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है

जीवन कौशल के प्रशिक्षण के ज़रिए किशोरों में आत्महत्या को रोका जा सकता है
डॉ वृंदा एम एन

आए दिन किशोरों की आत्महत्या की दर्दनाक दास्तानें हम अख़बारों में पढ़ते हैं और टीवी समाचारों में देखते हैं. मनोचिकित्सक के रूप में, हमें ऐसे कुछ मामले भी सुनने को मिल जाते हैः

दसवीं कक्षा में पढ़ रहा 16 साल का महेश एक लड़की से प्यार करता था लेकिन उसने उसे ठुकरा दिया और किसी और से दोस्ती कर ली. भावुकता में आकर, महेश ने अपने मातापिता के नाम एक नोट लिखा और आत्महत्या कर ली.  

दूसरे मामले में, 15 साल की जान्हवी की दोस्त निशा ने उसे 10वी के फ़ाइनल इम्तहान के नतीजे देखने को कहा. जान्हवी ने मोबाइल फ़ोन पर अपना रिजल्ट देखा और वो ये देखकर बुरी तरह हताश हो गई कि वो एक विषय- अंग्रेज़ी में फ़ेल हो गई थी. अपने अभिभावकों को बताए बिना और स्कूल रिजल्ट की पुष्टि का इंतज़ार किए बिना ही जान्हवी ने आत्महत्या कर ली.

18 साल की प्रज्ञा का मामला पारिवारिक समस्या का था. प्रज्ञा के माता पिता अक्सर झगड़ते रहते थे, उसके पिता शराब पीकर घर लौटते थे और उसकी मां को पीटते थे. उसके माता पिता के वैवाहिक जीवन के टकराव ने प्रज्ञा के भावनात्मक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाला. वो न तो अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान लगा पाती और न ही किसी अन्य गतिविधि में भाग ले पाती जिससे उसका ध्यान घर की पेचीदगी के हट पाता. लेकिन अपनी समस्या पर किसी से बातचीत करने या मदद मांगने के बजाय, प्रज्ञा ने अपनी जान लेने का फ़ैसला किया.

किशोर और उनकी भावनात्मक दशा

किशोर भरपूर ऊर्जा और भरपूर भावना से भरे होते हैं. वयस्कों की तुलना में उनके सोचने और किसी  काम को करने का तरीका अलग और कभीकभार अतार्किक भी हो जाता है. इस वजह से, जब कभी नाकामी, निराशास, तनाव या किसी अन्य समस्या के रूप में वे किसी विपरीत हालात से टकराते हैं तो वे उसका मुकाबला करने में असमर्थ होते हैं. मदद मांगने की अपेक्षा वे किसी अन्य विनाशकारी कदम का सहारा लेते हैं जैसे मुश्किलों से पीछा छुड़ाने के लिए नशे की लत में पड़ जाना या आत्महत्या कर लेना.  

किशोर आवेश में आकर आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं, वे उसके नतीजों के बारे में नहीं सोचते हैं . वे  ये भी गलत मान बैठते हैं कि मुश्किल समय में मदद मांगना कमज़ोरी की निशानी मानी जाएगी. लेकिन किशोरों को ये समझने की ज़रूरत है कि संकट की स्थितियों में अपने परिवार या दोस्तों से समय पर मदद और परामर्श मिल जाए और एक पर्याप्त भावनात्मक सपोर्ट हासिल हो जाए तो उनकी समस्याएं दूर हो सकती हैं.

तथ्य और आंकड़ें

आज दुनिया भर में किशोर मौतों के मामलों में आत्महत्या सबसे प्रमुख वजहों में एक मानी जाती है.  साक्ष्य बताते हैं कि इन वर्षों में आत्महत्या करने वाले किशोरों की संख्या में गंभीर बढ़ोतरी हुई है. ये भी पाया गया है कि आत्महत्या की कई वजहें होती हैं, जिनमें व्यक्तिगत, परिवार, स्कूल और मनोवैज्ञानिक वजहें शामिल हैं. वैश्विक स्तर पर, हर साल अनुमानित 71,000 किशोर आत्महत्या कर लेते हैं.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक भारत में आत्महत्या करने वाले हर सौ व्यक्तियों में से 34 ऐसे थे जो 15-29 साल की उम्र में थे. 2001 में इस आयु वर्ग में आत्महत्या करने वालों की संख्या 38910 थी जो 2012 में बढ़कर 46,635 हो गई थी. यानी आत्महत्या की दर में 19.9 प्रतिशत की भयावह बढ़ोतरी पाई गई थी.  

जीवन कौशल की ट्रेनिंग

किशोरों में आत्महत्या के अधिकांश मामले रोके जा सकते हैं. किशोरों में हालत से निपटने की क्षमता और कौशल विकसित कर उन्हें अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने, हताशाओं का मुकाबला करने और जीवन को तार्किक रूप से बरतने के बारे में सिखाया जा सकता है. जीवन कौशल की ट्रेनिंग से किशोर समय प्रबंधन के गुण सीख जाते हैं, असरदार ढंग से कम्यूनिकेशन कर पाते हैं, अंतरवैयक्तिक संबंधों में सहज हो पाते हैं, तनाव को काबू में रखना सीखते हैं, चीज़ों से निपटना सीखते हैं, संकट का हल निकालते हैं, और निर्णय क्षमता विकसित कर पाते हैं. इस तरह के प्रशिक्षण से किशोरों में निश्चित रूप से आत्महत्या के मामले रुकेंगें, वे सामान्य होंगे, उनमें लचीलापन आएगा और उनकी मानसिक सेहत में प्रोन्नति होगी.

डॉ वृंदा एमएन निमहान्स में साइकेट्रिक सोशल वर्क की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.


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