नशामुक्ति का मार्ग

नशे की लत के इलाज में प्रेरणा एक महत्त्वपूर्ण निभाती है
डॉ गरिमा श्रीवास्तव

व्यवहार में किसी भी कार्य या बदलाव की दिशा में पहला कदम प्रेरणा का होता है. हम सब लोगों ने एक कहावत सुनी है, “आप घोड़े को पानी तक खींच कर ला सकते हैं लेकिन उसे पानी पने के लिए विवश नहीं कर सकते.” इसका आशय ये है कि लोग तब तक इच्छित व्यवहार का प्रदर्शन नहीं करते हैं जब तक कि वे इसके लिए ख़ुद को प्रेरित न करें. ये बात विशेषकर नशे की लत और नशीले पदार्थों पर निर्भरता के मामलों में सच है.

नशीले पदार्थ पर निर्भर व्यक्ति, उपचार के लिए मदद लेने पर लंबा समय ले सकता है और उससे बंधा रह सकता है. उनकी प्रेरणा के स्तर या बदलाव के लिए सहमत हो पाने के स्तर में उतारचढ़ाव हो सकता है. नशे की लत से जुड़े उपचार में प्रेरणा को बढ़ाने की पद्धति का उपयोग इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज़ के पास अपने व्यवहार को जारी रखने या बदलने का विकल्प है. प्रेरणा आधारित एप्रोच व्यक्तियों को निष्क्रिय के बजाय सक्रिय बनाती है, उसका जोर इस पर रहता है कि वे अपने उपचार का चयन खुद करे और खुद को बदलने की जिम्मेदारी अपने ऊपर लें. अगर नशे की लत के आदी लोगों के पास विकल्प चुनने की आजादी रहती है, तो उनमें थेरेपिस्ट या परिवार के सदस्यों के विचार का विरोध करने या उसे खारिज करने की जरूरत नहीं महसूस नहीं होती है. जब व्यक्ति ये अहसास कर लेते हैं कि बदलाव की प्रक्रिया के जिम्मेदार वे खुद हैं, तो वे सशक्त महसूस करते हैं और उस पर ज़्यादा ध्यान देते हैं और इससे उपचार के बेहतर नतीजे मिलते हैं.

शोधकर्ताओं ने व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव की प्रक्रिया के तहत कुछ अवस्थाओं को रेखांकित किया है. ये अवस्थाएं नशे का इस्तेमाल करने वालों पर भी लागू होते हैं जब वे नशामुक्ति उपचार की ओर अपने कदम बढ़ाते हैं.

पूर्व चिंतनः ये वो अवस्था है, जहां व्यक्ति परिवर्तन को मद्देनज़र नहीं रखता है, वो अपने व्यवहार के नकारात्मक नतीजों से वाक़िफ़ है और जल्द ही कोई कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं है. इसलिए, शुरुआती सत्रों में, थेरेपिस्ट को एक राब्ता बनाना चाहिए और व्यक्ति पर भरोसा रखना चाहिए जिससे ऐसे रास्ते खोजे जा सकें जिनके ज़रिए वे इलाज की ओर बढ़ सकें, उपचार के लिए आने वाले व्यक्ति के फैसले की तारीफ करनी चाहिए और फिर उपचार के लिए संभावित दिशा तय करनी चाहिए.

इस अवस्था के दौरान आमतौर पर संक्षिप्त हस्तक्षेप का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें बदलाव के प्रति व्यक्ति की तैयारी को आंका जाता है. उन्हें नशे की लत के नकारात्मक नतीजों के बारे में भी शिक्षित किया जाता है. उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति अवसादग्रस्त है, तो उसे बताया जा सकता है कि उसकी शराब की लत, और अवसाद पैदा कर सकती है या बढ़ा सकती है. थेरेपिस्ट उस व्यक्ति या उसके परिवार के किसी सदस्य से भी मदद लेकर नशे की लत के पैटर्न, जीवन में आने वाली समस्याएं और पारिवारिक इतिहास को सामने ले सकता है.

अवलोकन/चिंतन: इस चरण में, व्यक्ति नशे की लत के अच्छे बुरे को जानता है, लेकिन बदलाव को लेकर दुविधा में रहता है और बदलने के प्रति पूरी तरह से प्रतिबद्ध नहीं हो पाता है. कुछ जानकार ऐसा भी करते हैं कि वे व्यक्ति को दे खाने बनाकर फायदे और नुकसान की लिस्ट बनाने को कहते हैं. इसे बतौर होमवर्क भी किया जा सकता है और अगले सत्र में इस पर बात की जा सकती है या सत्र के दौरान लिस्ट तैयार की जा सकती है. व्यक्ति को बाहरी प्रेरणा को अपनी स्वाभाविक प्रेरणा में बदलने की प्रक्रिया में मदद से वो चिंतन से आगे बढ़कर फैसला करने की ओर कदम बढ़ा सकता है.

यहां पर डॉक्टर व्यक्ति को प्रेरित करने में मदद कर सकता है. उदाहरण के लिए व्यक्ति को द्वंद्व और नशे की लत और अपने निजी मूल्यों की टकराहट की भावनाओं को खंगालने का अवसर मिल जाता है. हस्तक्षेप से व्यक्ति निरंतर लत के नतीजों के बारे में और जागरूक हो पाता है और नशे की लत छोड़ने या कम करने के फायदों को जान पाता है.

तैयारीः एक बार व्यक्ति ने बदलने का फैसला कर लिया तो वो सुधार की ओर कदम बढ़ाने की योजना बनाते हैं. थेरेपिस्ट और व्यक्ति के परिवार को चाहिए कि वे उसकी प्रतिबद्धता को मजबूत करने के लिए उसे प्रेरित करते रहें, उसे इस बात के लिए प्रोत्साहित करें कि वो अन्य व्यक्ति को बदलाव की अपनी इच्छा के बारे में बताएं. ये अहम कदम व्यक्ति को जिम्मेदार बनने में मदद करेगा और वो आंतरिक प्रतिरोध को लेकर सजग बना रहेगा. संक्षिप्त हस्तक्षेप व्यक्ति को इलाज के लिए विकल्पों की सूची भी मुहैया कराता है. व्यक्ति ये तय कर सकता है कि उसे अपना उपचार किस योजना के तहत कराना है जो उसके लिए सबसे अच्छा हो.

इस अवस्था में ये अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है कि, इलाज कराने के फैसले के महत्त्व को समझा जाए, आत्मबल को सहारा दिया जाए, व्यक्ति की उपचार करने की क्षमता का स्वागत किया जाए, उचित, सहज एक्शन के लिए उसे तैयार किया जाए और उसे समझाया जाए कि रिलैप्स की स्थिति में उसके अपने थेरेपिस्ट के साथ संबंध खराब नहीं होने चाहिए. कुल मिलाकर, तैयारी के चरण में बदलाव की संभावित रणनीतियों की पहचान और अपने लिए सबसे उपयुक्त रणनीति का चयन करने में मदद मिलती है.

कार्रवाई का चरणः ये वो चरण है जिसमें अधिकतर इलाज औपचारिक रूप से शुरू हो जाते हैं. यहां, व्यक्ति नये व्यवहार लाने की कोशिश करता है लेकिन वे स्थिर नहीं होते हैं. इस चरण में, बदलाव की ओर पहला सक्रिय कदम बढ़ाया जाता है जहां व्यक्ति को बदली हुई रणनीतियों के साथ तालमेल बैठाने और उनके साथ आगे बढ़ने में मदद की जरूरत होती है. उन्हें एक्शन प्लान को कार्यरूप में ले में मदद चाहिए होती है और गंभीरता और परहेज़ बना रहे इसके लिए कौशलों पर काम करना पड़ता है. थेरेपिस्ट और परिवार के सदस्यों की भूमिका इस चरण में ये होती है कि वे व्यक्ति की भावनाओं और अनुभवों को सुधार के एक सामान्य हिस्से के रूप में देखें. सुधार प्रक्रिया में बने रहने की अहमियत उसे बताते रहें और उसे प्रोत्साहित करते रहें.

संरक्षणः जब व्यक्ति आखिरकार इस चरण में आता है, तो इसका अर्थ ये है कि वे दीर्घकालीन आधार पर नये व्यवहार स्थापित करने में समर्थ हैं और उन्हें मदद की जरूरत है खासकर रिलैप्स को रोकने के लिए. संक्षिप्त हस्तक्षेप की मदद से मौजूदा ऐक्शन देखे जा सकते हैं उनका आकलन कर परहेज़ के संरक्षण की दीर्घकालीन योजनाएं बनाई जा सकती हैं. व्यक्ति के परहेज के निरंतर प्रयासों के बावजूद उनकी प्रेरणा का स्तर डांवाडोल हो सकता है और वे फिर से लत के शिकार हो सकते हैं.

रिलैप्सः इस चरण में व्यक्ति नशे की लत के लक्षण फिर से अनुभव करने लगता है. उसे अब नतीजों से निपटने में सक्षम होना चाहिए और आगे क्या करना है इसका फैसला करना चाहिए. इस चरण में, परिवार के सदस्यों को मरीज की मदद करनी चाहिए और लक्षणों पर काबू पाने की वैकल्पिक रणनीतियों को अपनाने को लेकर उसकी मदद करनी चाहिए. इस बीच थेरेपिस्ट, बदलाव के चक्र में मरीज़ को फिर से प्रवेश कराता है, सकारात्मक बदलावों की पहचान करता है और लत के लक्षण के दोबारा प्रकट होने के अर्थ और वास्तविकता को एक सीखने के अवसर के तौर पर देखता है.

शोधों से साबित हुआ है कि मरीज़ के उपचार के नतीजे तब बेहतर रहते हैं जब कि उसका कोई ख़ास साथी, परिवार का सदस्य या पार्टनर, नशे की लत छुड़ाने की उपचार प्रक्रिया में शामिल होता है. वे व्यक्ति को अपने आंतरिक संसाधनों को पैदा करने, उनका इस्तेमाल करने और खुद पर काबू रख सकने के लिए प्रेरित करते हैं और ऐसी जीवनशैली की ओर अग्रसर करते हैं जिसमें नशे की कोई जगह नहीं होती. उनकी बदौलत मरीज खुद में बदलाव के लिए हल भी खुद ही तलाश करने लगता है. फिर भी ये ध्यान रखना जरूरी है कि बदलाव की आखिरी जिम्मेदारी मरीज पर ही है.

हालांकि एक मजबूत रिश्ता जरूरी है, लेकिन मोटिवेश्नल काउंसलिंग में मरीज के निकटस्थ महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को शामिल करना ही पर्याप्त नहीं होता है. इसके लिए ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो मरीज के उपचार के दौरान और उसके बाद मरीज की नशामुक्त जिंदगी में सहायक होता है और जिसकी सहायता की मरीज बहुत कद्र करता है.


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