ध्यान की कमी और अतिसक्रियता का विकार

एडीएचडी क्या है?

ऊर्जा से भरपूर तान्या एक दस साल की लड़की है. उसके टीचर अक़्सर शिकायत करते हैं कि तान्या एक जगह पर नहीं बैठती है, दूसरे बच्चों को डिस्टर्ब करती है और वह क्लास में ध्यान नहीं लगाती है. वह खेलों और बाहरी गतिविधियों में अत्यधिक सक्रिय रहती है, लेकिन रुकने के नाम नहीं लेती. यूँ तान्या के दोस्त उसके साथ खेलना चाहते हैं लेकिन जब वह उन पर हावी होने लगती है और अपने नियम थोपने लगती है तो वे बिगड़ जाते हैं. घर पर तान्या के अनियंत्रित व्यवहार पर उसके भाईबहनों को चिढ़ आता है. वह इस तरह के ख़राब व्यवहार के नतीजों से वाक़िफ़ नहीं है लेकिन अपनी मनमानी करती है

ये काल्पनिक कहानी वास्तविक जीवन स्थितियों में इस विकार को समझने में मदद के लिए तैयार की गई है.

आपने किसी बच्ची में तान्या जैसा व्यवहार देखा हो या सुना हो सकता है. इस तरह का व्यवहार बताता है कि बच्चे को ध्यान की कमी और अतिसक्रियता का विकार हो सकता है. इसे अंग्रेज़ी में

अटेंशन डेफ़ेसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) कहते हैं.

एडीएचडी तंत्रिका तंत्र से जुड़ा एक विकार है जो सीखने, ध्यान देने और व्यवहार पर अपना प्रभाव डालता है. इससे बेचैनी, रोषपूर्ण व्यवहार, ध्यान भटकना और अति सक्रियता जैसी स्थितियाँ पैदा होती हैं. एडीएचडी से ग्रसित बच्चे स्कूल और घर में रोज़ाना के कामों में ध्यान नहीं लगा पाते हैं. एडीएचडी बचपन के सबसे सामान्य विकारों में से एक है और किशोरावस्था और वयस्कता तक जारी रह सकता है.

एडीएचडी क्या नहीं है?

बच्चों का रोष से भर जाना, ख़ूब सक्रिय रहना, बातूनी होना, खेल में दोस्तों के साथ उग्र होना, सीखने से ध्यान आसानी से भटक जाना- ये सब बातें बच्चों में सामान्य बात है. जब तक बच्चा रोज़ाना के काम और अपनी पढ़ाई लिखाई ठीक से कर पा रहा है तो ऊपर जिन व्यवहारों का ज़िक्र किया गया है वो सामान्य ही कहे जाएँगें. ये एडीएचडी नहीं है.

एडीएचडी का संबंध सीखने की अयोग्यता से नहीं है. ये भी एक तंत्रिका संबंधी विकार है जो सीखने की क्षमताओं को अवरुद्ध कर देती है जैसे पढ़ना, लिखना, बोलना, सुनना और गणित का कौशल

एडीएचडी के प्रकार

एडीएचडी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है और इसका तीसरा प्रकार पहले दोनों प्रकारों का मिश्रण है.

अतिसक्रिय-आवेगी किस्म की एडीएचडी (हाइपरएक्टिव-इम्पलसिव टाइप)- इस किस्म के विकार के शिकार बच्चों में कम उम्र में ही लक्षण दिखने लग जाते हैं.

लापरवाही आधारित एडीएचजी (इनअटेन्टिव टाइप)- इस किस्म की एडीएचडी वाले बच्चों में ध्यान न देने की समस्या आ जाती है. वे किसी एक गतिविधि पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं. उनके मातापिता इस विकार को आमतौर पर नज़रअंदाज़ कर देते हैं या इस पर ग़ौर नहीं कर पाते हैं. ये विकार कम उम्र में आ सकता है. जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं और उनकी ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, कार्यों को सही ढंग से अंजाम देने में उनकी मुश्किलें दिखने लगती हैं और वे अव्यवस्थित होते जाते हैं.

सीखने की अशक्तता (लर्निंग डिसऐबिलिटी-एलडी) और एडीएचडी में समानताएँ और अंतर

तकनीकी रूप से एडीएचजी सीखने की अशक्तता नहीं है लेकिन ये सीखने की योग्यता को बाधित कर सकती है. देखा गया है कि एडीएचडी और सीखने की अशक्तता 15-20 फ़ीसदी बच्चों में साथ साथ रहती है. इसलिए मातापिता को इन दोनों स्थितियों की समानताओं और इनके अंतरों के बारे में जानना ज़रूरी है. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लक्षणों और मेडिकल हिस्ट्री का आकलन करते हैं और दूसरी उन जैसी स्थितियों को अलग करने के लिए विशिष्ट परीक्षण करते हैं.

एडीएचडी

सीखने की अशक्तता (एलडी)

समानताएँ

तंत्रिका संबंधी एक ऐसा विकार है जो मस्तिष्क की इस व्यवस्था को प्रभावित करता है कि वो किसी संदेश, उद्दीपन या सूचना को कैसे ग्रहण करता है, कैसे उसे समझता है और उस पर कैसी प्रतिक्रिया करता है.

 

तंत्रिका संबंधी एक ऐसा विकार है जो मस्तिष्क की इस व्यवस्था को प्रभावित करता है कि वो किसी संदेश, उद्दीपन या सूचना को कैसे ग्रहण करता है, कैसे उसे समझता है और उस पर कैसी प्रतिक्रिया करता है.

अंतर

दीर्घकालीन व्यवहारगत विकार है जिसके लक्षण हैं अतिसक्रियता का बने रहना, रोष और आवेगपूर्ण व्यवहार और ध्यान भटकना.

 

विकारों का एक समूह जो व्यक्ति की इस क्षमता को प्रभावित करता है कि वो किसी सूचना को कैसे ग्रहण करता है, उसे संग्रहीत करता है और उसका इस्तेमाल करता है. इस तरह उसकी सीखने की क्षमता को बाधित करता है.

बुनियादी क्रियाशीलता के साथ समस्याएँ जैसे चीज़ों को सहेजना व्यवस्थित करना, नए कौशल सीखना, ध्यान देना, विस्तार पर फ़ोकस करना, किसी काम को पूरा करने के लिए निर्देश या नियमों का पालन करना, अनियंत्रित व्यवहार

 

सुनने, पढऩे, लिखने, गणित आदि में समस्याएँ जिससे कुछ अन्य विकार पैदा होते हैं जैसे वे मानसिक विकार जिनसे पढ़ने लिखने में कठिनाई हो यानि डिस्लेक्सिया, ऐसे मानसिक विकार जिसमें मस्तिष्क कामकाज में तालमेल नहीं बैठा पाता यानि डिस्प्रेक्सिया, या गणनाओं में कठिनाई वाले विकार यानि डिसकैलकुलिया

ज़्यादातर मामलों में चिकित्सा और थेरेपी से इलाज हो जाता है. इसमें हस्तक्षेपी कार्यक्रम और उपचारी शिक्षा भी शामिल की जा सकती है.

व्यवहारगत थेरेपी से इलाज, सीखने के वैकल्पिक तरीके जैसे उपचार से जुडी शिक्षा, वैयक्तिक शैक्षिक योजना(इंडिविजुअलाइज़्ड एजुकेश्नल प्लैन-आईपी) और हस्तक्षेपी कार्यक्रम.

 


 

एडीएचडी कैसे होता है?

एडीएचडी के विशिष्ट कारणों के बारे में विशेषज्ञ निश्चित नहीं हैं. लेकिन वे मानते हैं कि संदेश प्रेषित करने वाले न्यूरोट्रांसमीटर के निम्न स्तरों से (डोपामीन और नोरेपिनेफ़्रीन) से ये विकार हो सकता है. ये न्यूरोट्रांसमीटर एकाग्रता, संगठन, समन्वय और भावनाओं को नियंत्रित करने संबंधी मस्तिष्क के कार्य से जुड़े हैं.

वे कुछ कारक जिनकी वजह से एडीएचडी हो सकता है, इस तरह से हैं-

  • जीन्सः कई अध्ययनों में पाया गया है कि 80 फीसदी से भी ज़्यादा मामलों में एडीएचडी एक आनुवंशिक यानि जेनेटिक समस्या पाई गई है क्योंकि मस्तिष्क में स्थित न्यूरोट्रांसमीटर सही ढंग से कार्य नहीं कर पाते हैं.

  • पर्यावरण या माहौल से जुड़े कारकः ये देखा गया है कि अगर कोई गर्भवती महिला धूम्रपान करती है या शराब का सेवन करती है तो बच्चे में एडीएचडी से प्रभावित होने का ख़तरा बढ़ जाता है. ये भी पाया गया है कि लेड के संपर्क में आने वाले भ्रूण या नवजात शिशुओं को भी एडीएचडी होने की आशंका बनी रहती है.

  • मनोवैज्ञानिक कारणः जैसे लंबे समय तक भावनात्मक उपेक्षा और परिवार में समस्याएँ (जैसे वैवाहिक जीवन के तनाव, मनमुटाव, घरेलू हिंसा आदि) ऐसी वजहें जिनका असर बच्चों पर भी पड़ सकता है और वे एडीएचडी के शिकार हो सकते हैं.

  • व्यवहारगत निशानः कुछ मामलों में देखा गया है कि बच्चे के मिज़ाज या उसकी मनोदशा की वजह से एडीएचडी हो सकता है.

एडीएचडी के चिन्ह क्या हैं?

मातापिता और शिक्षक वे पहले लोग हैं जो बच्चे के घर में व्यवहार और स्कूल में उसके प्रदर्शन में आ रहे परिवर्तनों को सबसे पहले रेखांकित कर सकते हैं.

एडीएचडी की पहचान के लिए, इसके लक्षण सात साल की उम्र से पहले मौजूद रहने चाहिए. सात लक्षणों से ज़्यादा लक्षण स्पष्ट तौर पर विभिन्न पर्यावरणों में दिखने चाहिए जैसे स्कूल में या घर में या किसी अन्य सामाजिक दायरे में. जब इन लक्षणों की वजह से बच्चे के सीखने की प्रक्रिया, उसके व्यवहार और उसकी सामान्य गतिविधियों में कुछ ज़्यादा ही रुकावट या परेशानी आने लगती है तो समझना चाहिए कि वह बच्चा एडीएचडी से जूझ रहा हो सकता है.

नोटः जैसे जैसे ये बच्चे वयस्क होते जाते हैं, इनमें से ज़्यादातर लक्षण गायब हो सकते हैं. फिर भी उनकी आवेगी भावना और ध्यान भटकने जैसी समस्याएँ बनी रह सकती हैं. ये निर्भर करता है कि वे किस तरह की सामाजिक और पेशेवर ज़िंदगी बिता रहे हैं.

ये जानना महत्त्वपूर्ण है कि बच्चे को यद्यपि पढ़ाई लिखाई में मुश्किलें आ सकती हैं लेकिन अपनी किसी अन्य पसंदीदा गतिविधि में वो बेहतर कर सकता है.


 

ध्यान की कमी के लक्षण

अतिसक्रियता यानि हाइपरएक्टिविटी के लक्षण

जो सिखाया जा रहा है उस पर ध्यान न देना, निर्देशों का पालन करने में दिक्कत होना.

बेचैनी, अस्थिरता, चंचल और व्यग्र बने रहना, एक जगह कुछ मिनट से ज़्यादा स्थिर न बैठ पाना.

 

पढ़ते, लिखते या स्पेलिंग बोलते या लिखते हुए लापरवाही करना और गलतियाँ करना

 

क्लासरूम में बैठने से मना करना, क्लास में हर किसी का ध्यान भंग करने की कोशिश करना, क्लास में इधर उधर घूमना या भागना

चीज़ों को संगठित करने में कठिनाई और चीज़ों को तार्किक रूप से व्यवस्थित न कर पाना या एक निर्धारित ढंग से काम कर पाना जैसे किताबें ठीक करना, होमवर्क करना.

चलने के बजाय दौड़ना, ऊपर नीचे चढ़ना उतरना, सड़क पर नियमों का पालन न करना, ऐसी हरकतें करना जिनसे माता पिता चिंतित होते हैं और उन्हें अपने बच्चे की दुर्घटना या उसे चोट लगने का डर बना रहता है.

रूटीन कामों के प्रति अनिच्छा जैसे स्कूल का काम या होमवर्क. रूटीन कामों से जल्दी ऊब जाना

 

दोस्तो से लड़ाई, सही ढंग से न खेलना, अपनी गलती न मानना, अपनी ज़िद पर अड़े रहना

कई सारे बाह्य कारकों जैसे शोर, हलचल या अन्य वजहों से आसानी से ध्यान भंग हो जाना

 

 

अत्यधिक बोलना, बातचीत के बीच में बोल पड़ना, दो लोगों की बातचीत को बाधित करना, अधीरता और किसी व्यक्ति के बात ख़त्म करने से पहले ही प्रतिक्रिया देने के लिए बोल पड़ना

चीज़ों का ध्यान रखने में असमर्थ जैसे स्टेशनरी, एसाइनमेंट, खिलौने आदि

 

बेहिचक यानि बिना किसी संकोच के, अपनी भावनाएँ प्रदर्शित कर देना, भावनात्मक आवेगों पर नियंत्रण न रख पाना

निर्देशों और रोज़मर्रा के अन्य कामों को एकदम भुला देना जैसे दाँतों में ब्रश, जूते पहनना, हाथ धुलना आदि

बिना सोचे समझे, नतीजों की परवाह किए बगैर जल्दबाज़ी में और आवेश में काम करना

 


 

एडीएचडी की पहचान कैसे होती है?

ध्यान की कमी और अतिसक्रियता के विकार यानि एडीएचडी का कोई अकेला चिकित्सीय, शारीरिक या जेनेटिक टेस्ट नहीं है.

माता पिता के तौर पर विकार का पता लगाने के लिए आप किसी बालरोग विशेषज्ञ या मनोचिकित्सक से मिल सकते हैं. विशेषज्ञ ऐसे कई परीक्षण करते हैं जिनसे एडीएचडी का पता लगाया जा सकता है. ऐसा ही एक परीक्षण है विकार के लक्षणों की एक सूची का- बच्चे के व्यवहार और आदतों से मिलान. मानक व्यवहार की माप के विभिन्न स्तरों का भी एक चार्ट उनके पास रहता है, उस मानक व्यवहार के आधार पर भी विशेषज्ञ परीक्षण करते हैं. दूसरे विकारों या अन्य बीमारियों का पता लगाने के लिए मेडिकल टेस्ट भी किए जाते हैं. (जैसे बहुत तेज़ बुखार, सीखने की अशक्तता या घर में समस्याएँ)

कभीकभार, घबराहट, डिसलेक्सिया, सीखने की अशक्तता और ऑटिज़्म भी एडीएचडी के साथ साथ हो सकते हैं. इसलिए अन्य बीमारियों या विकारों की संभावना को दूर करने के लिए एक सावधान और व्यापक चिकित्सा और शैक्षिक जाँच ज़रूरी है. अगर कोई दूसरी समस्या भी है तो उसका आकलन और इलाज भी एडीएचडी के इलाज के साथ साथ किया जाना ज़रूरी है.

नोटः ऐसे बच्चे जिनमें हाइपरएक्टिविटी एक प्रमुखतम लक्षण के रूप में उभर कर आता है उन्हें ही अधिकांश इलाज के लिए सलाह दी जाती है. ऐसे बच्चों को इलाज की कम ज़रूरत पड़ती है जिनमें ध्यान की कमी के प्राथमिक लक्षण ही दिखते हैं.

एडीएचडी का इलाज

एडीएचडी के इलाज में थेरेपी, काउंसलिंग, व्यवहारगत और उपचारी शैक्षिक ट्रेनिंग- इन सबकी मिलीजुली ज़रूरत रहती है. बच्चे में लक्षणों की गंभीरता, उसके व्यक्तित्व और उसके स्वास्थ्य के आधार पर इलाज किया जाता है. कई बच्चे हालात से निपटना सीख लेते हैं और आगे चलकर सामान्य जीवन बिता पाते हैं.

 

  • फ़ार्माकोथिरेपीः वो थेरेपी जिसमें विकार के इलाज के लिए फ़ार्मास्यूटिकल दवाएँ इस्तेमाल की जाती हैं.

  • साइकोथेरेपीः थेरेपी प्रदाता (मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक) बच्चों में स्वास्थ्यवर्धक और ज़्यादा असरदार आदतें विकसित करने के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों का इस्तेमाल करता है. थेरेपिस्ट बच्चों के नकारात्मक व्यवहार पैटर्न को समझने के लिए उनके साथ समय बिताता है और उन पैटर्नों को सकारात्मक और दृढ़ व्यवहार में ढालने की कोशिश करता है. यानि बच्चों का व्यवहार बदलने में मदद करता है.

  • संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी, कोगनिटिव बिहेवियर थेरेपी (सीबीटी): इस प्रकार की थेरेपी बच्चों के व्यवहार से निपटने के लिए माता पिता और शिक्षकों को रणनीतियाँ सिखाने में मदद करती है. स्वीकार्य व्यवहार के लिए बच्चों को पुरस्कृत करना, हर गतिविधि की टाईमिंग रखना और रूटीन या रोज़मर्रा के कामों का एक शेड्यूल बनाना- इन सब चीज़ों से बच्चों को विकार से निपटने में काफ़ी हद तक मदद मिलेगी.

  • पारिवारिक थेरेपी या अभिभावकीय प्रशिक्षणः एडीएचडी से पीड़ित बच्चे का ध्यान रखते हुए माता पिता, संरक्षक, अभिभावक और भाईबहन भी एक बड़े तनाव और चिंता में घिरे रहते हैं. इसलिए अभिभावकीय प्रशिक्षण यानि माता पिता के लिए ट्रेनिंग एडीएचडी प्रबंधन का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है. माता पिता और अभिभावकों को ऐसे वैकल्पिक तरीकें और रणनीतियाँ सीखने और इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी जाती है जो बच्चे के लिए विकार से निपटने में मददगार होती हैं.

  • सामाजिक कौशल का प्रशिक्षणः बच्चों को उचित सामाजिक व्यवहार की ट्रेनिंग दी जाती है. स्कूलों में समूह थेरेपी के सत्र चलाए जाते हैं जिनसे बच्चों में सामाजिक कौशल आता है और आत्मसम्मान की भावना में सुधार होता है.

नोटः इसके लिए सामूहिक प्रयास यानि टीम एफ़र्ट की ज़रूरत होती है जिसमें मातापिता, शिक्षक, मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, डॉक्टर, थेरेपिस्ट आदि सब शामिल होते हैं. इस साझा प्रयत्न से ही बच्चा एडीएचडी जैसे विकार से निजात पा सकता है.

एडीएचडी से पीड़ित बच्चे की देखरेख

हम जानते हैं कि भारत में पढ़ाई लिखाई में अव्वल रहना या पढ़ाई लिखाई में अच्छे नंबर लाना या उसमें सफल रहना कितना महत्त्वपूर्ण माना जाता है. ऐसे माँ-बाप जिनके बच्चे को एडीएचडी है, वे आमतौर पर अपने बच्चे की स्कूली शिक्षा और भविष्य को लेकर चिंतित रहते हैं. लेकिन जब वे जान जाते हैं कि एडीएचडी क्या है और ये उनके बच्चे पर क्या असर डालता है तो वे ये भी जानते हैं कि इस विकार को दूर करना मुश्किल नहीं है और इससे निपटा जा सकता है.

इसीलिए बच्चों को होने वाले इस विकार से जूझने और उसे ठीक करने में माँ-बाप, अभिभावकों और शिक्षकों की बहुत अहम भूमिका है.

नीचे लिखी कुछ गाइडलाइन इस दिशा में काम आ सकती हैं-

  • ज्ञानः एडीएचडी क्या है, ये समझने से आपको हालात समझने और उससे निपटने में मदद मिलेगी.

  • प्रोत्साहन, समर्थन, सहायता और संबलः एडीएचडी से पीड़ित बच्चे बड़े तनाव से गुज़रते हैं क्योंकि वे पढ़ाईलिखाई के साथ तालमेल नहीं रख पाते. माँ-बाप या अभिभावक के तौर पर आपके प्रेम और समर्थन से बच्चा सुरक्षित महसूस करेगा. जब भी बच्चा कोई काम पूरा कर ले या किसी निर्देश का सही सही पालन कर ले तो उसकी तारीफ़ करने में मत हिचकिए. बच्चे की प्रशंसा उदार भाव से कीजिए. ये एक साबित तथ्य है कि बड़े से बड़ा इलाज भी नाकाम रह जाता है अगर बच्चा एक असहयोगी और अनुदार माहौल में रहता हो फिर वो चाहे घर हो या स्कूल.

  • गतिविधियाँ: व्यवहारगत बदलावों के लिए कुछ आसान तकनीकें (पुरस्कार, अभीष्ट या वांछित व्यवहार को बढ़ाने और अवांछित व्यवहार को कम करने के लिए सकारात्मक और नकारात्मक मज़बूती लाना, ध्यान बढ़ाने वाले अभ्यास(क्रॉस वर्ड पहेली, वर्ग पहेली, दाल की सफ़ाई) लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद करती हैं.

  • शेड्यूलः हर रोज़ एक ही रूटीन रखिए, जागने से लेकर सोने तक. होमवर्क, बाहर खेलने और अंदर की गतिविधियों के लिए भी समय शामिल कीजिए.

  • चीज़ों को सहेजना, सही ढंग से रखनाः हर चीज़ के लिए जगह बनाइए और हर चीज़ को जगह पर रखिए- कपड़े, खिलौने और दूसरी चीज़ें जो बच्चे की हैं.

  • घर का काम और स्कूल का कामः अपने बच्चे को एसाइनमेंट लिखने, नोट्स बनाने के लिए प्रोत्साहित कीजिए. उसे डायरी लिखने के लिए प्रेरित कीजिए जिसमें वो अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियों को दर्ज कर सकता है.

  • अपनी मदद ख़ुदः आप एडीएचडी पर आयोजित कार्यशालाओं में शामिल हो सकते हैं या किसी सहायता समूह में शामिल हो सकते हैं जहाँ आप उन अभिभावकों से बातचीत कर सकते हैं जो आपकी जैसी समस्या से जूझ रहे हैं. ऐसी गतिविधियाँ आपको परिस्थिति से निपटने में मदद करेंगी.

वयस्कों में एडीएचडी

विशेषज्ञों ने पाया है कि एडीएचजी एक क्रोनिक यानि लंबे समय की समस्या है और ऐसे दो तिहाई बच्चे जिन्हें एडीएचडी है उनमें वयस्क उम्र में भी यही लक्षण बने रहते हैं. इससे कई तरह की समस्याएँ पैदा हो सकती हैं जैसे घर और काम में अव्यवस्थित रहना, समय पर काम पूरे न कर पाना, निर्देशों का पालन करने में अधीरता और बेचैनी, एक ही तरह के रूटीनी काम में बोरियत महसूस करना और संबंधों में तनाव.

वयस्कों में एडीएचडी को अनदेखा कर दिया जाता है क्योंकि उनकी क्रियाशीलता का आकलन कम होता है. ये एक बड़ी समस्या नहीं मानी जाती क्योंकि सामाजिक चिंताएँ, समाज का डर, मूड में उतार चढ़ाव, नशे की लत, और दूसरे कारक पहले से उपस्थित समस्या पर हावी रहते हैं. ऐसे मामलों में एडीएचडी लंबे समय तक रहता है क्योंकि उसकी पहचान नहीं की जाती लिहाज़ा इलाज भी नहीं हो पाता.

नोटः सामाजिक भय और लोकलाज की चिंता और समाज में जागरूकता की कमी के चलते एडीएचडी के लक्षण बढ़ सकते हैं.

वयस्कों में एडीएचडी के लक्षण

ऐसे वयस्क जो एडीएचडी से पीड़ित हैं उन्हें निम्न शिकायतें हो सकती हैं जिनसे स्थिति का अंदाज़ा लगता हैः


 

  1. ध्यान की अवधि में गतिरोध

  2. रोज़ाना के साधारण काम में बोरियत

  3. बाहरी कारकों पर आवेशपूर्ण प्रतिक्रिया, निर्णय करने में भी जल्दबाज़ी

  4. बेक़ाबू ड्राइविंग जिससे चोट या दुर्घटना का ख़तरा

  5. किसी बात को सजगता और ध्यान से न सुन पाना और बातचीत में गतिरोध पैदा करना

  6. चीज़ों को व्यवस्थित न कर पाना और समय पर कोई काम पूरा न कर पाना

  7. काम की डेडलाइन को बनाए रखने में कठिनाई जिससे चिंता और तनाव की अधिकता

  8. आत्मविश्वास और आत्मसम्मान में भारी कमी- ये संकट उस स्थिति में ज़्यादा रहता है जब परिवार और मित्रों से कोई सहायता या सहयोग नहीं मिल पाता है.

एडीएचडी से पीड़ित वयस्कों की पहचान और इलाज

वयस्कों में लक्षण बहुत दबे हुए रहते हैं. इस वजह से डॉक्टर भी ठीक ठीक अनुमान नहीं लगा पाता कि किसी वयस्क की फलां स्थिति एडीएचडी है या नहीं. जैसे महिलाओं में ये स्थिति घबराहट या मूड में परिवर्तन की हो सकती हैं और डॉक्टर ये समझने में असमर्थ रह सकते हैं कि इसके पीछे असली वजह एडीएचडी है.

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मुकम्मल जाँच करता है. इसमें बचपन से लेकर वर्तमान तक, वयस्क व्यक्ति का पूरा मेडिकल और सामाजिक इतिहास देखा जाता है, उसका पहले का चिकित्सा इतिहास भी और परिजनों और दोस्तों से भी बातचीत की जाती है. ऐसे परीक्षण किए जाते हैं जिनसे ये पता चले कि कहीं एडीएचडी से भी ऊपर कोई शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य से जुडी समस्या उक्त व्यक्ति को है कि नहीं.

इलाज के लिए, विशेषज्ञ व्यक्ति के व्यक्तित्व (क्षमताएँ, योग्यताएँ और कौशल), और व्यवहार की जाँच करता है. इसके बाद वो विकार से ज़्यादा सकारात्मक पहलुओं पर फ़ोकस करता है.

नोटः एडीएचडी का इलाज करने या उसकी दवा शुरू करने से पहले व्यक्ति की मेडिकल हिस्ट्री का आकलन कर लेना बहुत ज़रूरी है.

एडीएचडी से निपटना

एडीएचडी से पीड़ित लोगों में अच्छा प्रदर्शन करने की योग्यता तो होती है लेकिन दूसरे लोगों के मुकाबले उन्हें अतिरिक्त ऊर्जा और प्रयत्न झोंकना पड़ता है. ये परेशान करने वाला हो सकता है. एडीएचडी को समझकर आप इस अंतर से निपट सकते हैं और सामान्य ज़िंदगी बिता पाने के लिए निपटने के तरीकों को सीख सकते हैं.


 

  • एडीएचडी के बारे में जानिए. ज़्यादा जानकारी के लिए किसी जानकार से मिलिए

  • एक जागरूक और सजग उपभोक्ता बनिए और अपनी बात रखिए

  • अपनी ज़िंदगी और काम में झाँकिए और अपने व्यक्तित्व और जीवनशैली के हिसाब से बदलाव लाइए

  • ख़ुद को सक्रिय और चुस्त रखिए. दिलचस्प और अर्थपूर्ण गतिविधियों में व्यस्त रहिए

बचपन से ही एडीएचडी से जूझ रहे कई लोग कहते हैं ये एक सामान्य स्थिति है और किसी भी तरह से कमज़ोरी या कम बौद्धिकता या कम अक्ली की निशानी नहीं है. एडीएचडी वास्तव में व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य और प्रतिभा को खोजने में समर्थ बनाता है. व्यक्ति अपने सकारात्मक व्यवहार पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं और उन लक्ष्यों को हासिल कर सकते हैं जो संभव है. वे महज़ एडीएचडी के बारे में सोचते नहीं रह सकते. एडीएचडी वयस्कता में भी बना रहता है लिहाज़ा अच्छा यही है कि इससे तालमेल बैठाकर इससे निपटा जाए और सबसे बड़ी बात, निराश न हुआ जाए.

एडीएचडी का इलाज करने वाले विशेषज्ञ

स्थिति की गंभीरता के आधार पर एडीएचडी से पीड़ित बच्चे निम्न विशेषज्ञों में से किसी से सलाह ले सकते हैं.

  • क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, मनोवैज्ञानिकः ये बौद्धिक और भावनात्मक क्रियाओं का आकलन करता है और साइकोथेरेपी करता है.

  • शैक्षिक मनोविज्ञानीः बच्चों में सीखने की क्षमता और व्यवहार का आकलन करता है और उनकी शैक्षिक स्थिति, संज्ञानात्मक और बौद्धिक क्रियाशीलता का पता लगाता है.

  • वाक और भाषा पैथोलॉजिस्टः बोलचाल और भाषा संबंधी मुश्किलों को पहचानता और उसका आकलन करता है. ये सीखने में नाकाम रहने से जुड़े विकार की एक सामान्य समस्या है.

  • व्यवसायगत थेरेपिस्टः तंत्रिका तंत्र का आकलन करता है, समझने और देखने की स्थिति, संवेदना और रोज़ाना की क्रियाशीलता का आकलन.

  • न्यूरोलॉजिस्टः इस बात का पता लगाता है कि कहीं मस्तिष्क को कोई नुकसान तो नहीं पहुँचा है.

  • मनोचिकित्सकः व्यवहार से जुड़ी और भावनात्मक समस्याओं की पहचान करता है और उनका इलाज करता है, इसके लिए दवाएँ भी देता है.

  • बालरोग विशेषज्ञः नवजात शिशुओं, बच्चों, किशोरों को चिकित्सा सेवा प्रदान करता है. बच्चों के समस्त विकास और वृद्धि में प्रशिक्षित

  • विशेष शिक्षकः ऐसे बच्चे जिन्हें सीखने की विशेष ज़रूरतें होती हैं, जो संवेदी, बौद्धिक, मनोवैज्ञानिक या सामाजिक सांस्कृतिक कमियों से पैदा होती हैं, उन बच्चों को मुख्यधारा के शैक्षिक तंत्र के साथ सामंजस्य बैठाने में अक़्सर कठिनाई होती है. विशेष शिक्षा का ध्यान विभिन्न वैकल्पिक अध्यापन संसाधनों के इस्तेमाल पर रहता है (सीखने के औजार, निर्देशात्मक सामग्रियाँ, ऑडियो विज़ुअल यानि श्रव्य-दृश्य सामग्री, तकनीकी), क्योंकि पारंपरिक शैक्षिक प्रोग्राम या प्रविधियाँ एडीएचडी वाले बच्चों को सिखाने के लिए कारगर नहीं भी हो सकती हैं. विशेष शिक्षक इस क्षेत्र में प्रशिक्षित होते हैं और वे ऐसे विशेष शिक्षा कार्यक्रम मुहैया करा पाते हैं.


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