ऑटिज़्म (स्वलीनता)

ऑटिज़्म यानि स्वलीनता क्या है?

ऑटिज़्म तंत्रिका संबंधी विकलांगता है जो दिमाग के सामान्य विकास में बाधा पहुँचाती है. इससे संचार, सामाजिक अंतःक्रिया, संज्ञान और व्यवहार पर असर पड़ता है.

ऑटिज़्म को एक स्प्रेक्ट्रम विकार माना जाता है क्योंकि इसके लक्षण और विशेषताएँ कई मिलेजुले तरीक़ों से प्रकट होते हैं जो बच्चों को अलग अलग ढंग से प्रभावित करते हैं. कुछ बच्चों में गंभीर समस्या आ सकती है और उन्हें मदद की ज़रूरत रहती है जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो हल्कीफुल्की मदद के साथ स्वतंत्र रूप से अपना कामकाज स्वयं ही कर पाते हैं.

पहले हर विकार जैसे ऑटिस्टिक डिसऑर्डर, व्यापक विकासात्मक अनिर्दिष्ट विकार(परवेसिव डेवलेपमेंटल डिसऑर्डर नॉट अदरवाइज़ स्पेसीफ़ाइड (पीडीडी-एनओएस) और ऐसपर्जर सिंड्रोम को अलग अलग देखा जाता था लेकिन अब ये सारे विकार एक साथ रखकर ही देखे जाते हैं और सामूहिक रूप से ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार कहे जाते हैं.

तथ्य

• ऑटिज़्म तीसरी सबसे आमफ़हम शारीरिक और मानसिक विकलांगता है.

• ऐक्शन फ़ॉर ऑटिज़्म के एक अध्ययन के मुताबिक, इसके घटित होने की दर करीब 17 लाख है (अनुमानित दर के मुताबिक 250 बच्चों में से एक बच्चा ऑटिज़्म से पीड़ित होता है).

• ऑटिज़्म का कोई इलाज नहीं है.

ऑटिज़्म के लक्षण क्या हैं?

ऑटिज़्म के लक्षण बच्चे के जीवन के पहले तीन साल के दरम्यान देखे जा सकते हैं. ये लक्षण हल्के, औसत से लेकर गंभीर तक हो सकते हैं. हर बच्चे में लक्षण भी अलग अलग हो सकते हैं और उम्र बढ़ने के साथ भी उनमें बदलाव हो सकता है. गंभीर संज्ञानात्मक निर्बलता की स्थिति में बच्चे को एपीलेप्सी भी हो सकती है. फिर भी कुछ विशिष्ट व्यवहारों से ही स्थिति का अंदाज़ा लग पाता है.

बच्चे में शारीरिक और मानसिक वृद्धि के दौरान निम्न लक्षण देखे जा सकते हैं

ऑटिज़्म के साथ मौजूद स्थितियाँ: मानसिक दुर्बलता, हाइपरएक्टिविटी, संचालन में मुश्किलें, दौरे, सीखने से जुड़ी अशक्तता, सुनने और देखने की शक्ति में गिरावट- ये सब स्थितियाँ ऑटिज़्म के साथ मौजूद रहती हैं.

• अर्थपूर्ण वाक्य बनाने में काफ़ी कठिनाई होती है

• सुने गए शब्दों औऱ वाक्यों को दोहराने की प्रवृत्ति

• बोलते हुए संकेतों का भी इस्तेमाल

• संचार के लिए भाषा न सीखना

• अपनी ज़रूरतों, भावनाओं और मनोभावों को समझा न पाना

• बातचीत, आवाज़, चेहरे के हावभाव, बॉडी लैंग्वेज को समझने में असक्षमता

• जब दूसरा बात कर रहा हो तो उससे आँख न मिला पाना

 

ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चों को सामाजिक अंतःक्रिया यानि लोगों के साथ मिलनेजुलने और बात करने के दौरान निम्न में से कुछ मुश्किलें आ सकती हैं-

• नवजात शिशु के रूप में वो किसी वयस्क के उठाए जाने पर न मुस्कराते हैं न किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया का इज़हार करते हैं.

• सामाजिक व्यवहार को सीखने में कठिनाई, लोगों से मिलनेजुलने में भी मुश्किल

• दोस्त बनाने से कतराते हैं और अकेले ही खेलना चाहते हैं

• आँख से आँख नहीं मिला पाते हैं

• दूसरों की भावनाओं को नहीं समझ पाते हैं, इसीलिए किसी की बात या भावना पर उचित प्रतिक्रिया नहीं दे पाते हैं.

• रुटीन के बदलावों के साथ ख़ुद को ढाल नहीं पाते हैं

• किसी चीज़ की गंध, स्वाद, आकृति या आवाज़ के प्रति अलग ढंग से प्रतिक्रिया करते हैं.

ख़ास क़िस्म की पहचान क्या है?

कोई अन्य विकार है या नहीं, ये पता लगाने के लिए पहचान का एक ख़ास तरीका अपनाया जाता है. जैसेः

• बचपन में ही शिज़ोफ्रेनिया हो जाना

• जन्मजात बहरापन, गंभीर श्रव्य विकार

• गंभीर मानसिक मंदता. ऑटिज़्म और मानसिक मंदता में एक प्रमुख अंतर ये है कि जो बच्चे मानसिक रूप से दुर्बल हैं वे आमतौर पर अपनी मानसिक उम्र के सहारे वयस्कों से ख़ुद को जोड़ते हैं और उस भाषा का इस्तेमाल करते हैं जो वे दूसरों के साथ संचार के लिए करते हैं.

• साइकोसोशल अभाव की वजह से भी बच्चे उदासीन, अलगथलग और अजनबी दिखने लगते हैं.

ऑटिस्टिक बच्चों की अपनी क्षमताएँ और प्रतिभाएँ होती हैं. माता पिता और शिक्षकों को उनके सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए और बच्चे को उन्हीं पहलुओं का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए.

क्षमताएँ और योग्यताएँ

• दृश्यों की और अपने आसपास की अच्छी याददाश्त

• चीज़ों को कायदे से यानि व्यवस्थित और संगठित ढंग से करना

• अमूर्त अवधारणाओं को समझने की योग्यता

• अपनी रुचि के क्षेत्र में उत्कृष्टता

• भाषाओं के प्रति दिलचस्पी (उन बच्चों में जो ठीक से बोल पाते हैं)

ऑटिज़्म के कारण?

ऑटिज़्म की सही सही वजह तो अब तक पता नहीं चली है लेकिन शोध बताते हैं कि ये आनुवंशिक और परिस्थितिजन्य या पर्यावरणजनित कारकों की मिलीजुली वजह से हो सकता है. पर्यावरणीय या परिस्थिति से जुड़ी वे विभिन्न स्थितियाँ हैं जो मस्तिष्क के विकास पर असर डालती हैं. ये जन्म के पहले या जन्म के फ़ौरन बाद उत्पन्न हो सकती हैं. ये भी देखा गया है कि बच्चे के केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को नवजात दिनों में कोई नुकसान पहुँचने से भी ऑटिज़्म हो सकता है.

 

ऑटिज़्म का इलाज

ऑटिज़्म एक जीवनपर्यंत की स्थिति है और इसका कोई इलाज नहीं है. लेकिन सही थेरेपी और सही दख़ल से बच्चे को ज़रूरी कौशल सीखने में मदद मिल सकती है जिनसे वे अपनी ज़िंदगी को बेहतर बना सकते हैं. चूंकि 18 महीने की उम्र या उससे पहले ही बच्चे में ऑटिज़्म का पता चल सकता है लिहाज़ा बच्चे के बेहतर विकास के लिए काफ़ी पहले से मदद मुहैया कराई जा सकती है.

मातापिता के लिए महत्त्वपूर्ण नोटः ऐहतियाती क़दम के तौर पर, माता पिता बाल रोग विशेषज्ञों को ऐसे रूटीन विकास संबंधी टेस्ट करने के लिए कह सकते हैं जिनसे ये पता चल सके कि बच्चे का शारीरिक मानसिक और भाषाई विकास ठीक से हो रहा है या नहीं.

ऑटिज़्म की पहचान कैसे की जाती है?

ऑटिज़्म की पहचान का कोई एक मेडिकल टेस्ट उपलब्ध नहीं है. लेकिन कुछ विशिष्ट आकलन और जाँच, इस विकार के होने की पुष्टि कर सकती हैं. ऐसी ही कुछ जाँचों में शामिल हैं-

• शारीरिक और तंत्रिका तंत्र के परीक्षण

• ऑटिज़्म डायगनोस्टिक इंटरव्यू- रिवाइज़्ड (एडीआई-आर)

• ऑटिज़्म डायगनोस्टिक ऑबज़र्वेशन शेड्यूल (एडीओएस)

• चाइल्डहुड ऑटिज़्म रेटिंग स्केल (सीएआरएस)

• जिलियम ऑटिज़्म रेटिंग स्केल

• परवेसिव डेवलेपमेंटल डिसऑर्डर स्क्रीनिंग टेस्ट

• क्रोमोसोम असमान्यता को चेक करने के लिए जेनेटिक परीक्षण

• संचार, भाषा, बोलचाल, संचालन, पढ़ाईलिखाई में प्रदर्शन, संज्ञानात्मक कौशल से जुड़े टेस्ट

ऑटिज़्म के इलाज के तरीक़े

इलाज का लक्ष्य ऐसे व्यवहारों को साधना होता है जिनसे बच्चे स्कूल आने जाने और वहाँ सबके साथ घुलनेमिलने, पढ़ने लिखने समझने और खेलने कूदने की अपनी योग्यताओं को सुधार सकें, रिश्ते बना सकें, और वयस्क होने पर एक स्वतंत्र ज़िंदगी बिता पाने में सक्षम हो सकें.

इलाज में हस्तक्षेप का लक्ष्य होता है बच्चे में सामाजिक रूप से स्वीकार्य और समाज अनुकूल व्यवहार करने की प्रवृत्ति को बढ़ाना, उनके अजीब व्यवहार में कमी लाना और उनकी बोलचाल, संकेत या हावभाव को अनुकूल या सही बनाना.

अगर सही, सुव्यवस्थित और निरंतर मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप बना रहे तो ऑटिस्टिक बच्चों की हालत में महत्त्वपूर्ण सुधार हो सकता है.

 

ऐपलाइड बिहेवियर ऐनालिसिस (एबीए)- आनुभाविक स्वभावजन्य विश्लेषण: बच्चे में संज्ञानात्मक, संवेदी, सामाजिक और अपनी मदद आप करने की योग्यताएँ विकसित हो सकें, इसके लिए वन-टू-वन सत्र रखे जाते हैं. बच्चे को साधारण से लेकर जटिल कामों तक एक ढांचागत कार्ययोजना को पूरा करना सिखाया जाता है. हर काम को फिर से एक उप काम में बाँटा जाता है और एक बार में एक उप काम को सीखना और उसे पूरा करना, बताया जाता है. इस तरीक़े में इनाम भी रखे जाते हैं और बच्चे में इच्छित व्यवहार और कौशल को सीखने और उन्हें बनाए रखने में ये तरीक़ा मददगार होता है. बच्चे की तरक्की का रिकॉर्ड रखा जाता है और उसका फिर आकलन किया जाता है. एबीए निम्न प्रकार का होता हैः

 

• डिस्क्रीट ट्रायल ट्रेनिंग (डीटीटी)- चैतन्यता प्रयोग प्रशिक्षण: इस शिक्षण विधि में इच्छित व्यवहार या प्रतिक्रिया को सिखाने के लिए ट्रायल की सीरिज़ इस्तेमाल की जाती हैं. पाठों को उनके सरलतम हिस्सों में बाँट दिया जाता है. और सही जवाब या सही व्यवहार प्रदर्शन पर इनाम दिया जाता है. गलत जवाबों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है.

• अर्ली इंटेंसिव बिहेवरियल इंटरवेंशन (ईआईबीआई)- पूर्व प्रचंड स्वभावजन्य हस्तक्षेप: पाँच साल या उससे भी कम उम्र के बच्चों के लिए ये टेस्ट है.

• पाइवटल रिस्पॉन्स ट्रेनिंग (पीआरटी)- केंद्रीय या आधारभूत प्रतिक्रिया प्रशिक्षण: इसका उद्देश्य होता है बच्चे में सीखने के लिए प्रेरित करना. अपने व्यवहार का निरीक्षण करना और दूसरों के साथ संवाद की शुरुआत कर पाना. इन व्यवहारों में सकारात्मक बदलावों का दूसरे व्यवहारों पर भी व्यापक असर पड़ सकता है.

• वर्बल बिहेवियर इंटरवेन्शन (वीबीआई)- भाषाई व्यवहार हस्तक्षेप: ये परीक्षण प्रत्येक क्रियात्मक इकाई को उप इकाई में तोड़कर भाषा को सिखाने पर ज़ोर देता है.

• ट्रीटमेंट ऐंड ऐजुकेशन ऑफ़ ऑटिस्टिक ऐंड रिलेटड कम्यूनिकेशन हैंडिकैप्ड चिल्ड्रन मैथड (टीईएसीसीएच)- ऑटिस्टिक और संबंद्ध संचार विकलांगता वाले बच्चों के इलाज और शिक्षण की विधि: ये विधि उन कौशलों का इस्तेमाल करती है जो बच्चों के भीतर पहले से ही मौजूद रहते हैं जिनसे वे स्वतंत्र रूप से जी सकें. एक भौतिक पर्यावरण का आयोजन, रोज़ाना के रूटीन की तैयारी, स्पष्ट उम्मीदों का ख़ाका, और संचार के लिए दृश्य सामग्रियों का इस्तेमाल- ये सब तरीक़े बच्चों में स्वतंत्र रूप से अपना रोज़ाना का काम करने में मददगार और प्रभावी साबित होते हैं.

ऑटिज़्म के इलाज के तहत दी जाने वाली थेरेपी के प्रकार

नोटः थेरेपियाँ या हस्तक्षेप-विधियाँ इस तरह की तैयार की जाती हैं कि वे ऑटिस्टिक बच्चे में कुछ विकास संबंधी समस्याओं को कम कर सकें. जैसा कि हम जानते हैं कि हर बच्चे की अलग समस्या हो सकती है, माता पिता और विशेषज्ञों को साथ मिलकर काम करते हैं और फ़ैसला करते हैं कि उनके बच्चे के लिए कौनसी थेरेपी सबसे उचित रहेगी और फिर उसे जारी रखा जाता है. ये ध्यान रखा जाना चाहिए कि जो इलाज बच्चे के लिए कारगर हो वो कोई ज़रूरी नहीं कि दूसरे बच्चे के लिए भी उतना ही असरदार हो क्योंकि ऑटिज़्म हर व्यक्ति को अलग अलग ढंग से प्रभावित करता है.

कुछ थेरेपी ऑटिस्टिक बच्चे के लिए संपूर्ण इलाज कार्यक्रम का हिस्सा हो सकती हैं-

• विकास संबंधी, वैयक्तिक भेद, संबंध आधारित पद्धति (Developmental, Individual Differences, Relationship-Based Approach-DIR -: इसे “फ़्लोरटाइम” भी कहा जाता है. इसका फ़ोकस भावनात्मक और संबंधपरक विकास पर होता है (भावनाएँ, देखरेख करने वालों के साथ संबंध). इसमें ये भी देखा जाता है कि बच्चा दृश्य, ध्वनि और गंध से किस तरह तारतम्य बैठाता है.

• पेशागत थेरेपीः इस थेरेपी में ये सिखाया जाता है कि बच्चा जितना संभव हो सके उतना स्वतंत्र रूप से रहना सीख पाए. इसके तहत उसे पहनना, खाना, नहाना, और लोगों को पहचानना सिखाया जाता है.

• संवेदी समन्वय थेरेपीः ये बच्चे को संवेदी सूचनाओं को समझने और उन्हें बरतने में मदद करती है जैसे दृश्य, ध्वनि और गंध. ये थेरेपी ऐसे बच्चों के लिए उपयुक्त हो सकती है जो कुछ ख़ास आवाज़ों से परेशान हो उठते हैं और ख़ुद को स्पर्श किया जाना पसंद नहीं करते हैं.

• वाक थेरेपी या बोलचाल की थेरेपीः इस थेरेपी के तहत विशेषज्ञ पीड़ित बच्चों के बोलने के तरीकों में सुधार करते हैं. वे वैकल्पिक तरीके इस्तेमाल करते हैं जैसे हावभाव, पिक्चर बोर्ड आदि. इससे बच्चा सीखता है कि अपने विचार वो दूसरों के सामने कैसे रखे या कैसे ख़ुद को अभिव्यक्त करे.

• संगीत थेरेपीः गाना, संगीत तैयार करना, और लाइव म्यूज़िक पेश करना- ये सब इस थेरेपी के अंतर्गत सिखाए जाते हैं.

• चित्र आदानप्रदान संचार पद्धति(Picture Exchange Communication System (PECS): संचार सिखाने के लिए चित्रों के ज़रिए चिन्ह या कार्ड इस्तेमाल किए जाते हैं.

• शुरुआती हस्तक्षेप: शोधों से पता चलता है कि शुरुआती हस्तक्षेप आधारित इलाज बच्चे के विकास में काफ़ी सुधार कर सकता है. बच्चे की बीमारी का पता चलते ही ये थेरेपी शुरू की जा सकती है. छह महीने के बच्चे पर भी ये थेरेपी इस्तेमाल कर सकते हैं. ये हस्तक्षेप ऑटिज़्म से प्रभावित होने वाले मुख्य क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करता है जैसे सामाजिक कौशल, अनुकरण, भाषा और संचार, खेलने के गुण, रोज़ाना का जीवन और संचालन के कौशल. इस कार्यक्रम में मातापिता को भी सक्रिय रूप से शामिल किया जाता है. वे निर्णय करने और इलाज शुरू करने जैसी प्रक्रियाओं में सक्रिय रहते हैं. इसलिए ये महत्त्वपूर्ण है कि अगर आपको लगता है कि आपके बच्चे को ऑटिज़्म या कोई अन्य विकास संबंधी समस्या है तो आप जितना जल्दी संभव हो सके अपने बच्चे के डॉक्टर से बात करें.

• अभिभावकीय प्रशिक्षणः ये प्रोग्राम उन मातापिता और अभिभावकों के लिए है जो अपने बच्चे की हालत से टूट चुके हैं. उन्हें सहायता दी जाती है और उनकी काउंसलिंग की जाती है. व्यवहार में आने वाले बदलावों के बारे में उन्हें बताया जाता है. और इस तरह उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है कि वे अपने बच्चे के इलाज के लिए थेरेपिस्ट के साथ मिलकर काम कर सकें. सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये है कि माँ-बाप अगर बच्चे की मदद का दृढ़ निश्चय कर लें तो उसकी भाषा, संज्ञानात्मक क्षमताओं और सामाजिक व्यवहार में उल्लेखनीय सुधार आ सकता है.

ऑटिज़्म से पीड़ित बच्चे की देखरेख

जब किसी बच्चे के ऑटिस्टिक होने का पता चलता है कि तो उसके मातापिता या अभिभावक पर बहुत भारी गुज़रती है और वे बड़ा तनाव झेलते हैं. वे अपना अधिकांश समय बच्चे के साथ बिताते हैं. उन्हें बच्चे को इलाज और थेरेपी के लिए, इंटरवेन्शन प्रोग्राम में और स्कूल ले जाना लाना पड़ता है. ज़्यादातर अभिभावक, ख़ासकर माँएँ अपनी नौकरियाँ छोड़ देती हैं और अपने बच्चे की फुलटाइम यानि पूरावक़्ती देखरेख में जुट जाती हैं. घर पर बहुत समझौते करने पड़ते हैं, हर चीज़ में सामंजस्य बैठाना होता है, बच्चे के भाईबहन भी बदले हुए माहौल में रहने की आदत डाल देते हैं क्योंकि उन्हें बता दिया जाता है कि वे अपने एक विशेष भाई या बहन के साथ हैं, परिवार के सदस्य ज़्यादा सहायता करते हैं, ऑटिस्टिक बच्चे की रुचि और ज़रूरत को ध्यान में रखते हुए परिवार की गतिविधियाँ चलाई जाती हैं और योजनाएँ बनाई जाती हैं. ऑटिस्टिक बच्चे को पालना और उसकी देखरेख करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. लेकिन अगर अभिभावकों को इस बारे में सही जानकारी और सही ज्ञान है तो वे अपने बच्चे के लिए बेहतर विकल्प तैयार कर सकते हैं और उसे बेहतर माहौल दे सकते हैं.

इन हालात में, अभिभावक या देखरेख करने वाले व्यक्ति के तौर पर आपः

 

• ऑटिज़्म के बारे में जितना संभव हो उतना सीखें और जानें.

• रोज़ की तमाम गतिविधियों के लिए योजना बनाएँ और नियमित रखें

• हालात से निपटने के लिए ज़रूरत पड़े तो काउंसलिंग लें.

• ये स्वाभाविक है कि विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के मातापिता ही पूरी तरह समझ सकते हैं कि अन्य अभिभावकों पर क्या गुज़रती होगी. सहायता समूहों में शामिल हों और ऐसे अभिभावकों से जुड़ें जिनके बच्चे ऑटिस्टिक हैं.

• पेशेवर मदद लें

• प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लें. वहाँ आप व्यवहार में बदलाव ला सकने वाली विधियों के बारे में जान सकते हैं जिनका इस्तेमाल आप अपने बच्चे की कठिनाइयाँ दूर करने में कर सकते हैं.

• अपने लिए समय निकालें, अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत का भरपूर ख़्याल रखें

एक ऑटिस्टिक बच्चे की माँ: “ मैं नहीं जानती कि सामान्य होना किसे कहते हैं जब मैं अपने बेटे को देखती हूँ जो ऑटिस्टिक होने के बावजूद एक अच्छा ख़ासा बच्चा है. मैं चाहती हूँ कि वो हमेशा ख़ुश रहे, अपनी उपलब्धियों पर गर्व करे और अच्छे क्षणों में हँसे और उनका आनंद उठा सके.”

समावेशी शिक्षा

ये अनिवार्य है कि स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के लिए समान अवसर मुहैया कराएँ. कानूनी प्रावधानों और ऐसे बच्चों के लिए सरकारी कार्यक्रमों के बावजूद शिक्षण संस्थान ऐसे बच्चों को अपने यहाँ दाखिला नहीं देते और ऐसी अतिरिक्त सुविधाएँ मुहैया नहीं कराते हैं जैसे वैयक्तिक शैक्षिक योजना, सिखाने के वैकल्पिक तरीक़े आदि.

संदर्भ

• ऑटिस्टिर सोसायटी ऑफ़ इंडिया: http://autismsocietyofindia.org/

• सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन: http://www.cdc.gov/

• वीफ़ॉरऑटिज़्मः http://www.we4autism.org/


और जानकारी

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