अवसाद (डिप्रेशन)

अवसाद किसे कहते हैं?

क्या आपने कभी सोचा है कि आपका कोई दोस्त या परिजन बहुत उदास दिखता है और लंबे समय तक थका हुआ या सुस्त नज़र आता है? आपने नोट किया होगा कि वह व्यक्ति बहुत ख़ामोश हो गया है, रोज़ाना के काम में उसकी दिलचस्पी ख़त्म हो गई है, ठीक से नहीं खाता है या काम से उसका ध्यान उचट गया है. ऐसे संकेत बताते हैं कि उक्त व्यक्ति अवसाद से पीड़ित हो सकता है.

अवसाद एक सामान्य मनोरोग है जिसके कुछ निश्चित लक्षण होते हैं जो व्यक्ति के विचारों, भावनाओं, व्यवहार, संबंध, कार्य प्रदर्शन को प्रभावित करते हैं और अत्यंत गंभीर मामलों में मृत्यु तक भी हो सकती है.

किसी बुरी घटना या परिस्थिति पर उदास होना स्वाभाविक ही है. लेकिन अगर ये भावना लंबे समय तक बनी रहे (दो सप्ताह से ज़्यादा) या बार बार आती रहे और सामान्य जीवन और स्वास्थ्य को बाधित करे तो ये चिकित्सा परिभाषा में अवसाद की श्रेणी में आ जाता है जिसके इलाज की ज़रूरत पड़ती है.  

टिप्पणी:

  • अवसाद कमज़ोरी या मानसिक अस्थिरता का संकेत नहीं है. मधुमेह या हृदय की समस्याओं की तरह ये भी एक बीमारी है. अवसाद जीवन के किसी पड़ाव में कभी भी किसी को भी अपनी चपेट में ले सकता है.
  • अवसाद का इलाज संभव है.

अवसाद के लक्षण क्या हैं?

"मुझे इन दिनों भूख नहीं लगती है. मुझे दिन भर सोते रहने की इच्छा करती है. लेकिन रातों को मैं जगा रहता हूँ और मेरे दिमाग में बेचैनी भरे विचार आते रहते हैं. मैं न कोई काम करना चाहता हूँ न किसी से बात करना चाहता हूँ. मैं दिन भर अपने कमरे में ही बैठे रहना पसंद करूंगा. जो भी मैं करता हूँ लगता है वो गलत ही होगा. मुझे लगता है कि मैं व्यर्थ और अनुपयोगी हूँ. मुझे कोई समझ नहीं पाता है......"

उपरोक्त विचार और भावनाएँ इस बात का संकेत है कि व्यक्ति अवसाद से पीड़ित हो सकता है. लेकिन इस मनोरोग की गंभीरता और लक्षण हर व्यक्ति में अलग अलग होते हैं. एक ही व्यक्ति में बीमारी से जुड़े सारे लक्षण भी नहीं नज़र आते हैं. अवसाद ज़िंदगी के हर पहलू को प्रभावित कर सकता है.

नोटः ये लक्षण मोटे तौर पर संभावना का संकेत देते हैं. ये महत्त्वपूर्ण है कि किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह ली जाए और सही पहचान करा ली जाए. इससे इलाज का तरीका तय करने में मदद मिलेगी.

कुछ लक्षण इस तरह से हैं:

  • ज़्यादातर समय उदास और मन डूबा हुआ महसूस करना.
  • दैनिक गतिविधियों को पूरा करने में अनिच्छा और कठिनाई. दिन भर थकान और सुस्ती. पहले जिन चीज़ों में मन लगता था, उनसे मन ऊब जाना, आनंद महसूस न कर पाना.
  • ध्यान केंद्रित करने में, सोचने में और फ़ैसला करने में कठिनाई (उदाहरणः हॉबी, पढ़ाई आदि)
  • आत्मविश्वास और आत्म सम्मान में कमी.
  • अपने बारे में, जीवन के बारे में और भविष्य को लेकर नकारात्मक ख़्याल
  • भूख न लगना, ज़्यादा खा लेना
  • अपराधबोध महसूस करना और पुरानी नाकामियों के लिए खुद को दोषी ठहराना, खुद को किसी चीज़ के लायक न समझना
  • काम से अनुपस्थित रहने लगना या काम करने में असमर्थ हो जाना
  • भविष्य को लेकर निराशा की भावना
  • नींद में गतिरोध, नींद न आना
  • यौनेच्छा का अभाव, सेक्स में अरुचि
  • पूरे शरीर में दर्द महसूस करना, सिरदर्द, गर्दन दर्द, ऐंठन, मोच आदि
  • अपना नुकसान कर लेने या आत्महत्या कर लेने के ख़्याल

अगर ऊपरोक्त लक्षणों में से कोई लक्षण आपको अपने किसी परिचित में नज़र आता है तो आप उसे मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से मिलने की सलाह दे सकते हैं.

अवसाद की वजह क्या है?

अवसाद कई सारे कारणों के मिलेजुले असर से हो सकता है जैसे आनुवंशिकी, जीवन में घटी घटनाएँ या तनाव.

मनोविकार: अवसाद ऐसे अन्य मनोविकारों के साथ मौजूद रह सकता है जिनकी पहचान न हो पाई हो जैसे ऑब्सेसिव कम्पलसिव डिसऑर्डर, सामाजिक भय ग्रंथि या सोशियल फ़ोबिया और शिज़ोफ़्रेनिया. ऐसे मामलों में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से एक विस्तृत आकलन की सलाह दी जाती है.

  • जीवन में तनाव के कारक: वयस्कों में तनाव पैदा करने वाले कारण कार्य संबंधी, अंतरवैयक्तिक (पारिवारिक या वैवाहिक), वित्तीय और अन्य हो सकते हैं.
  • शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ: बेकाबू बीमारियाँ जैसे डायबिटीज़ और थायरॉयड से अवसाद हो सकता है. इसलिए मनोचिकित्सक से परामर्श में पूर्व अचिंहित बीमारियों की जाँच भी शामिल है. हृदय रोग, कैंसर या एचआईवी जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों को बीमारी से निपटने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है और इस वजह से भी अवसाद पैदा हो सकता है.
  • व्यक्तित्व: व्यक्तित्व समस्या या शरीर की छवि से (बहुत मोटा या बहुत पतला होना, बहुत लंबा या नाटा होना), पूर्णतावाद, आत्मविश्वास में कमी, स्कूल, कॉलेज या दफ्तर में अनुचित प्रतियोगिता, और सहकर्मियों या सहपाठियों का दबाव. ज़्यादातर शोध बताते हैं कि ये सभी कारक अलग अलग या मिलेजुले रूप में अवसाद को बढ़ा सकते हैं.
  • अल्कोहल या ड्रग की लतः अल्कोहल एक अवसादक है और अधिक सेवन अवसाद को बढ़ा सकता है. ड्रग और अन्य हानिकारक पदार्थों की लत व्यक्ति को परिवार और दोस्तों से दूर कर देती है. लंबे समय तक सेवन और नशा न मिलने की स्थिति में पलायनकारी लक्षण आने लगते हैं और अवसाद भी पैदा होता है.

विभिन्न मनोसामाजिक कारणों के चलते अवसाद विभिन्न आयु वर्गों में नज़र आ सकता है. निम्न खंडों में इस बात की जानकारी दी गई है कि अवसाद किस तरह बच्चों, महिलाओं और बुज़ुर्गों पर असर डालता है.

  • बच्चों में अवसाद
  • महिलाओं में अवसाद
  • बुज़ुर्गों में अवसाद

अवसाद को कैसे पहचान सकते हैं

हर बीमारी में लक्षण का एक निर्धारित सेट होता है और ये ज़रूरी है कि किसी भी तरह का उपचार शुरू करने से पहले सही पहचान के लिए किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह ली जाए. गलत पहचान से जटिलताएँ उभर आती हैं और हालत बिगड़ सकती है.

मेडिकल हिस्ट्रीः आमतौर पर विशेषज्ञ आपकी मेडिकल हिस्ट्री को रिकॉर्ड करता है ताकि ऐसी बीमारियों का पता लगाया जा सके जो समान लक्षण पैदा कर रही हो सकती हैं. अगर वे बीमारियाँ नहीं हैं तो फिर अवसाद के इलाज की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है.

मनोवैज्ञानिक आकलनः मानसिक स्वास्थ्य विशेष एक प्रश्नावली तैयार करता है और इसके ज़रिए पीड़ित व्यक्ति के लक्षणों, विचारों और व्यवहार के पैटरनों के बारे में सूचनाएँ एकत्र करता है. विशेषज्ञ लक्षणों की अवधि की भी जाँच करता है, वे कैसे और कब शुरू हुए, उनकी गंभीरता और इन लक्षणों की वजह से कैसे व्यक्ति के विचार और व्यवहार पर असर पड़ा है, इन सब चीज़ों की जाँच की जाती है.

किसी व्यक्ति की पहचान अवसाद से पीड़ित के रूप में तभी की जाती है जब उसमें, दो सप्ताह की अवधि के दौरान दिन भर में कई बार अवसाद के पाँच से ज़्यादा लक्षण नज़र आए. ये लक्षण इतने सघन और गंभीर होने चाहिए कि व्यक्ति की घर पर या दफ़्तर में रोज़ना की गतिविधि बाधित हो जाए. 

अवसाद का इलाज

ज़्यादातर समय अवसाद छिपा हुआ रहता है क्योंकि लोग इस बारे में बात करने से हिचकते हैं. हममें से कई लोग सिर्फ मुस्करा देते हैं और कोई मज़ाक न उड़ाए या कमज़ोर न समझे, इस चक्कर में अपनी समस्या किसी के साथ शेयर करने से पीछे हटते हैं. अवसाद से जुड़ी शर्म की भावना ही वो सबसे बड़ा रोड़ा है जो इस बारे में पीड़ित लोगों को मदद लेने से रोकता है. बिना उपचार के, व्यक्ति खामाख्वाह लंबे समय के लिए इस विकार को झेलता है और अपने परिवार को भी परेशानी में डाले रखता है.

कई लोग जानकारी और जागरूकता के अभाव में अवसाद के चिन्हों की ठीक से पहचान नहीं कर पाते हैं. इस वजह से, इलाज शुरू करने से पहले ही वक्त का बड़ा फ़ासला आ जाता है जिससे स्थिति बिगड़ सकती है. हल्के और मद्धम अवसाद से उबरने के लिए स्वयंसिद्ध तकनीकें, परामर्श (काउंसिलिंग) या कोई भी थेरेपी कारगर हो सकती है. लेकिन गंभीर अवसाद के मामलों में व्यक्ति को मुकम्मल उपचार और दवाओं की ज़रूरत पड़ती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया की सबसे ज़्यादा निर्योग्यकारी (डिसैबलिंग) बीमारियों में अवसाद को भी रखा है. फिर भी, अवसाद से पीड़ित व्यक्ति इससे निजात पा सकता है और फिर से सामान्य और ख़ुशहाल जीवन बिता सकता है.

अवसाद का इलाज कई तरीकों से संभव है. ये निर्भर करता है अवसाद की गंभीरता, स्वास्थ्य की दशा, और मरीज़ के जल्द स्वस्थ हो जाने के संकल्प और निश्चय पर.

  • डॉक्टर आमतौर पर अवसाद निरोधी गोलियाँ देते हैं.
  • डायबिटीज़ या थायरॉयड जैसी साथ में मौजूद रह सकने वाली बीमारियों की पहचान की जाती है और उनका इलाज किया जाता है, इससे भी मरीज़ को अवसाद से उबरने में मदद मिलती है.
  • अवसाद के इलाज में कई मनोवैज्ञानिक थेरेपियाँ भी कारगर पाई गई हैं. मरीज़ को विश्रांति या तनाव मुक्ति की विधियाँ सिखाई जा सकती हैं जिनसे उसमें सकारात्मक सोच का विकास हो और वह बीमारी से जूझने का हौसला रख सके. ये काम अन्य थेरेपियों के ज़रिए भी किया जा सकता है जैसे सीबीटी, सहायक थेरेपी आदि. 

अवसाद से पीड़ित व्यक्ति की देखभाल

आप अवसाद से पीड़ित किसी व्यक्ति की हमेशा मदद कर सकते हैं. लेकिन पीड़ित व्यक्ति को ये बात समझाना मुश्किल हो जाता है कि वो इस बात को स्वीकार करे कि उसे अवसाद है और इसके लिए मदद ले. फिर भी अगर आप उपरोक्त लक्षणों में से कोई भी एक लक्षण अपने परिचित में देखते हैं तो उसे प्रेरित कीजिए कि वो किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श ले.

देखरेख करने वाले व्यक्ति के रूप में आप निम्न बातों का ध्यान रख सकते हैं:

  • ज़्यादा समझदारी दिखाएँ, मददगार बनें, परवाह करें
  • पीड़ित व्यक्ति की बात हमदर्दी से सुनें और उससे प्यार से बात करें.
  • पीड़ित व्यक्ति को बोलने के लिए और अपनी भावनाओं को साझा करने के लिए प्रेरित करें.
  • पीड़ित व्यक्ति को गतिविधियों में शामिल होने में मदद करें, ये एक तरह से एंटीडोट का काम करता है.
  • आत्महत्या संबंधी टिप्पणियों का ध्यान रखें, और फ़ौरन मनोचिकित्सक को सूचित करें.

अवसाद से निबाह

अवसाद एक बीमारी है और आपको इससे निकलने के लिए सहायता की ज़रूरत है. परिवार औक दोस्तों से बात कीजिए और पहले कदम के रूप में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लीजिए जो सही पहचान और उसके बाद सही इलाज शुरू करेगा.

उपचार या थेरेपी के साथ साथ आपको अपना भी ख्याल रखना चाहिए. ये आसान नहीं होता लेकिन रूटीन में छोटे छोटे बदलावों का सकारात्मक नतीजा मिल सकता है.

नकारात्मकता के चक्र को तोड़िए. अवसाद का एक लक्षण है अपराधबोध और निरर्थक होने की सतत भावना. ऐसे विचारों पर नियंत्रण पाया जाना ज़रूरी है और ऐसे ख़्याल मन में उठें तो आप सजग रहें. नकारात्मक सोच के इस पैटर्न को पहचानने की कोशिश करें और इसे सकारात्मक और रचनात्मक सोच से बदलें. अगर संभव हो, ऐसे विचारों के नोट बनाएँ और देखें कि आप उन्हें किस तरह ख़ुशनमा विचारों और भावनाओं से बदल सकते हैं.

सक्रिय रहें: रोज़ाना के काम और गतिविधियाँ भी थेरेपी की तरह हो सकती हैं. जितना संभव हो सके रोज़ाना के काम पूरे करें. छोटे और साध्य लक्षण रखें और उन पर काम करें. किसी तरह का व्यायाम शुरू करें. शोध से साबित हुआ है कि व्यायाम शरीर और मन दोनों के लिए बेहतर है.

अपने डर का सामना करें: आमतौर पर, उदास या चिंतित होने पर लोग दूसरों से बात करने से परहेज़ करने लगते हैं या ऐसे काम टाल देते हैं जैसे, यात्रा करना, बागवानी करना. खाना पकाना आदि. सबसे अच्छा है अपने भय का सामना करना और इन कामों में धीरे धीरे खुद को लगा देना.

अपनी गतिविधियों और रोज़ाना के रुटीन की योजना बनाएँ: अवसाद चूंकि नींद के पैटर्न को बाधित करता है, तो अपने सामान्य समय में उठें और हर रात सोने का भी एक निश्चित समय बना लें. जितना संभव हो सके इस रुटीन का पालन करें.

पारिवारिक सहायताः परिवार के सदस्यों और दोस्तों से मदद लें. डॉक्टर की सलाह मुताबिक आवश्यक इलाज या थेरेपी लेते रहें. इससे आपकी हालत में जल्द सुधार होगा. प्रेरणा और दृढ़ निश्चय अवसाद से उबरने में मुख्य रूप से सहायक होते हैं. 

देखरेख करने वाले को भी है देखभाल की ज़रूरत

अवसाद से ग्रसित किसी व्यक्ति की देखरेख आपको भी थका सकती है और तनाव दे सकती है. ये ज़रूरी है कि आप अपनी सेहत का भी ख़्याल रखें ताकि आप अपने प्रियजन की ठीक ढंग से देखभाल कर सकें. परिवार, दोस्तों से मदद और अन्य पेशेवर सहायता या सलाह लेना आपके लिए मददगार होगा. आप देखरेख करने वाले अन्य लोगों से भी बात कर सकते हैं जो जान सकते हैं कि आप किस स्थिति का सामना कर रहे हैं और जो आपकी स्थिति को ज़्यादा बेहतर ढंग से समझने में समर्थ हो सकते हैं.

आप खुद की देखरेख के लिए निम्न बातों का ध्यान रख सकते हैं:

  • विकार के बारे में जानकारी लें, इससे आपको अपनी घबराहट को कम करने में मदद मिलेगी और केयरगिवर के रूप में आप ज़्यादा असरदार तरीके से काम कर पाएँगें.
  • अपने शारीरिक स्वास्थ्य का ख़्याल रखिए, उचित पोषण और पर्याप्त नींद लीजिए.
  • सैर पर जाइए, किसी मनपसंद काम को हाथ में लीजिए.
  • दोस्त या किसी विश्वस्त से बात करिए, उनसे अपने ख़्याल और भावनाएँ साझा (शेयर) कीजिए. इससे आपको अपने अवरोधों से निकल पाएँगें.
  • अपनी सीमाओं को पहचानिए और इस बारे में यथार्थवादी बनिए कि आप अपना कितना समय देखरेख के काम में लगा पाएँगें. अपनी इस सीमा के बारे में मरीज़ को, अपने परिवार और डॉक्टर को बताइये ताकि सबको इस बात का पता रहे और कोई आपसे अतिरिक्त की अपेक्षा न करने लगे.
  • खुद को कुछ समय (कम अवधि के लिए) देखरेख के काम से दूर रखिए. अगर बहुत तनावपूर्ण हो रहा है तो ब्रेक ले लीजिए. 

अवसाद के लिए उपलब्ध उपचार के प्रकार

कई किस्मों की साइकोथेरेपी अवसाद में असरदार पाई गई है. इसमें संज्ञानात्मक व्यवहारजन्य थेरेपी (सीबीटी) और अंतरवैयक्तिक थेरेपी (आईपीटी) भी शामिल हैं. सामान्य रूप से, ये दोनो थेरेपी छोटी अवधि की हैं, इनका उपचार 10-20 सप्ताह तक चलता है. शोधों से पता चला है कि हल्के से मद्धम अवसादों का उपचार या तो दवा या सिर्फ साइकोथेरेपी से सफलतापूर्वक हो सकता है. लेकिन तीव्र अवसाद से पीड़ित व्यक्ति के लिए दोनों उपचारों की मदद लेना ही उचित माना जाता है.

संज्ञानात्मक व्यवहारजन्य थेरेपी (सीबीटी) एक असरदार और साक्ष्य आधारित थेरेपी है जो अवसाद के इलाज में लाभदायक मानी जाती है. ये थेरेपी अवसाद से जुड़े नकारात्मक विचारों के पैटर्न और व्यवहार को बदलने में मदद करती है. नकारात्मक विचार प्रक्रिया (उदाहरण के लिएः मैं कोई भी काम सही ढंग से कर ही नहीं सकता हूँ.) की पहचान की जाती है और उसे सकारात्मक विचारों से बदला जाता है (जैसेः मैं ये काम सही सही कर सकता हूँ.) इससे एक ज़्यादा प्रभावी और सकारात्मक व्यवहार निर्मित करने में मदद मिलती है. ये भी देखा गया है कि अपना व्यवहार बदल देने भर से विचार और मूड में सुधार हो सकता है. ये बात इतनी सीधी सी है जैसे कि घर से बाहर कदम रखें और हर रोज़ 15 मिनट की सैर कर आएँ.

इंटरपर्सनल या अंतरवैयक्तिक थेरेपी (आईपीटी) के तहत व्यक्तिगत संबंधों को सुधारने पर ध्यान दिया जाता है. थेरेपिस्ट लोगों को सिखाता है कि दूसरों के साथ अपने मिलनेजुलने और बातचीत करने का आकलन करें और आत्म-अलगाव और घुलनेमिलने में, दूसरों से जुड़ने या उन्हें समझने में होने वाली परेशानियों के बारे में सजग हों.

साइकोएजुकेशन यानि मनोशिक्षा के तहत व्यक्ति को उसकी बीमारी के बारे में सिखाया जाता है, कि उसका इलाज कैसे हो सकता है, रिलैप्स के निशानों की पहचान कैसे करनी है ताकि बीमारी बिगड़ने या फिर से हो जाने से पहले ज़रूरी उपचार दिया जा सके.

पारिवारिक साइकोएजुकेशन परिवार के भीतर तनाव, दुविधा और घबराहट को कम करने में मदद करती है. परिजन हालात से जूझने में समर्थ हो पाते हैं. और इस तरह अवसाद से ग्रस्त अपने प्रियजन की बेहतर देखरेख कर पाते हैं और उसे उचित सहायता मुहैया करा पाते हैं.

मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों और उनके परिवारों के लिए सेल्फ़ हेल्प और सपोर्ट ग्रुप अब ज़्यादा व्यापक तौर पर उपलब्ध हैं. लोग अपने अनुभवों, भावनाओं को साझा कर सकते हैं और क्वालीफ़ाइड विशेषज्ञों से मिलने की सलाह भी पा सकते हैं, वे सामुदायिक संसाधनों के बारे में सीखते हैं और इस बारे में सूचना पाते हैं कि उनकी हालत में सुधार के लिए कौनसा उपचार या थेरेपी बेहतर काम कर सकती है.

इलेक्ट्रोकन्वलसिव थेरेपी (ईसीटी): अवसाद के तीव्र दौरों और साइकोसिस के साथ तीव्र अवसाद के लिए ये बहुत असरदार इलाज है. जब दवाएँ या साइकोथेरेपी तीव्र लक्षणों जैसे एक्यूट साइकोसिस या आत्महत्या के ख़्याल जैसी स्थिति में कारगर नहीं हो पाती हैं या व्यक्ति अवसाद निरोधी दवाएँ नहीं ले पाता है तो ऐसे में ईसीटी के ज़रिए उपचार के बारे में सोचा जा सकता है. कुछ व्यक्तियों में अवसाद निरोधी दवाओं के साथ ईसीटी को मिलाकर इलाज किया जाता है. इस उपचार से स्मृति संबंधी समस्याएँ हो सकती है इसलिए एक सावधान लाभ-हानि आकलन किए जाने की ज़रूरत है ताकि इस महत्त्वपूर्ण और असरदार तरीके को कारगर बनाया जा सके. 

क्या आप जानते हैं?

विश्व स्वास्थ्य संगठन का आकलन है कि:

  • दुनिया की करीब पाँच फ़ीसदी वयस्क आबादी अपने जीवन की किसी भी अवस्था में अवसादजन्य विकार से प्रभावित होती है.
  • 2020 तक अवसाद दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी मानसिक बीमारी हो जाएगी.
  • पूरे विश्व में अवसाद की अधिकतम दर भारत में पाई गई है. 

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