व्यक्तित्व के विकार यानि पर्सनैलिटी डिसऑर्डर

व्यक्तित्व यानि शख़्सियत क्या होती है?

मनोवैज्ञानिक संदर्भों में, शख़्सियत का इस्तेमाल उस तरीक़े के लिए किया जाता है जिसके ज़रिए कोई व्यक्ति दूसरों से जुड़ता है या उनसे संबंध बनाता है. शख़्सियत उन सभी गुणों का एक कुल जमा है जो तय करते हैं कि हम कैसा व्यवहार करते हैं, और दूसरों के साथ हम किस तरह से अंतःक्रिया करते हैं, यानि उनसे किस तरह मिलतेजुलते या बातचीत या व्यवहार करते हैं.

कुछ गुण तो हमारी जीन्स में होते हैं जो हमें अपने माता पिता से मिलते हैं. अपने अनुभव और अपने माहौल से भी हमें अपनी मौजूदा विशिष्टताओं को सुधारने या नई विशिष्टताएँ सीखने में मदद मिलती है. हम कुछ ख़ास चीज़ें इसलिए नहीं सीख पाते हैं क्योंकि वे स्वीकार्य नहीं हैं, या हमारे पर्यावरण में हमारी मददगार नहीं हैं. इसलिए ये कुदरत (आनुवंशिक) और पोषण (हमारे अनुभव और हमारा पर्यावरण) का मिलाजुला रूप होता है जो हमारे व्यक्तित्व की विशिष्टता को आकार देता है.

सभी व्यक्तियों में शख़्सियत के बहुत से लक्षण होते हैं लेकिन वे किसी में कम किसी में ज़्यादा होते हैं. इन सार्वभौम विशिष्टताओं का ख़ास और अलग मिश्रण ही हमारे व्यक्तित्व या हमारी शख़्सियत को परिभाषित करता है.

व्यक्तित्व के विकार यानि पर्सनैलिटी डिसऑर्डर क्या होते हैं?

हममें से से हरेक व्यक्ति के पास व्यक्तित्व के ऐसे लक्षण या गुण होते हैं जो हमें रोज़मर्रा के विभिन्न कार्यों को निभाने में हमारी मदद करते हैं जैसे घर में, कामकाज में या सामाजिक संबंधों में. ये लक्षण हमें जीवन की विभिन्न परिस्थितियों और बदलावों में मदद करते हैं. कुछ ख़ास लोगों के साथ, ये विशिष्ट लक्षण उस स्तर पर पहुँच जाते हैं जहाँ उनकी क्रियाशीलता को प्रभावित करने लगते हैं और उनके लिए या उनके आसपास के लोगों के लिए तनाव का कारण बन जाते हैं.

व्यक्तित्व के विकार से पीड़ित व्यक्ति दूसरों से संबध जोड़ पाने में कठिनाई महसूस करता है और नई परिस्थिति के अनुकूल ख़ुद को नहीं ढाल पाता है. कुछ स्थायी और पक्के लक्षण ऐसे होते हैं जो बदलावों के समक्ष या किसी कठिन स्थिति से निपटने के लिए उपयुक्त रूप से सामंजस्य बैठाने में व्यक्ति की योग्यता को बाधित करते हैं.

व्यक्ति को अपनी भावनाओं पर काबू रख पाने में कठिनाई होती है और उन्हें सामाजिक स्थितियों में दूसरों के साथ अंतःक्रिया करने यानि घुलने मिलने में भी समस्या आती है. वे ऐसा कुछ कर सकते हैं या ऐसा कुछ बोल सकते हैं जो सामाजिक रूप से अनुपयुक्त और अटपटा माना जाता है. सही और ग़लत के बारे में उनके बहुत ही कट्टर ख़्याल या विचार होते हैं, दुनिया कैसी होनी चाहिए, और कोई काम किस तरह से संपादित किया जाना चाहिए. इन सारी मुश्किलों के साथ, व्यक्ति एक क्रियाशील जीवन बिता पाने के लिए संघर्ष करता रहता है.

“जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, मैं किसी समूह में फ़िट नहीं हो पाया. अपने परिवार, पड़ोसी, मित्र या स्कूल के सहपाठी. मुझे इनके साथ तालमेल बैठाने में कठिनाई होती थी. अपनी पूरी ज़िंदगी में मेरे आसपास तमाम लोगों का मेरे साथ प्यार और लगाव का व्यवहार नहीं रहा. उन्हें मेरी किसी बात में कोई तुक या औचित्य नज़र ही नहीं आता है, वे ये बात नहीं जानते थे या जान ही नहीं सकते थे कि मैं सही हूँ और वे ग़लत हैं.

मुझसे कोई प्यार नहीं करता है. मैं जब भी अपने दोस्त, परिवार और सहकर्मी के नज़दीक जाने की कोशिश करता हूँ वे मेरी उपेक्षा करते हैं, खारिज करते देते हैं.

कभी-कभी सोचता हूँ कि हर दिन एक नई यातना है. कभीकभी ये महसूस करता हूँ कि ऐसा जीवन व्यर्थ है.

कभीकभी मैं अपने परिवार और दोस्तों को बताता भी हूँ कि मैं अपनी जान लेना चाहता हूँ, क्योंकि उसी से मुझे अपनी कीमत का अंदाज़ा होगा....लेकिन ये तरीक़ा भी कारगर नहीं रहता है.

मैंने वो सब किया जो वे मुझसे चाहते थे, मैंने अपना व्यवहार बदला ताकि वे मुझे प्यार करते रह सकें, मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश कर रहा हूँ कि वही सब करूँ जो हम सबके लिए सबसे अच्छा हो. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता. मेरे पास कोई नहीं है, मेरा कोई नहीं है, मैं अकेला हूँ.”

(ये काल्पनिक आख्यान इस विकार को समझने में मदद के लिए तैयार किया गया है और इसके लिए इसे वास्तविक जीवन स्थितियों में रखा गया है.)

व्यक्तित्व की विशिष्टता और व्यक्तित्व के विकार (पर्सनैलिटी डिसऑर्डर) में क्या अंतर है?

कुछ विशिष्ट लक्षणों की उपस्थिति की वजह से व्यक्तित्व में विकार नहीं आते हैं. हम सबमें अपने अपने व्यक्तित्व की विशिष्टताएँ हैं. किसी में कम हैं किसी में ज़्यादा यानि अपने व्यवहार में हम उस विशिष्टता को कितना ज़ाहिर करते हैं या उसका कितना इस्तेमाल करते हैं, इस आधार पर किसी में कम किसी में ज़्यादा हो सकती हैं. दूसरे शब्दों में, व्यक्तित्व के विकार से पीड़ित व्यक्ति में किसी और ही तरह की विशिष्टताएँ हो सकती हैं, लेकिन वो इतनी ज़्यादा हो सकती हैं जिससे नुकसान होता है या तनाव का कारण बनती है.

ये भी ध्यान रखना महत्त्वपूर्ण है कि संस्कृति और संदर्भ अपनी भूमिका निभाते हैं- कई सांस्कृतिक संदर्भों में कुछ लक्षण स्वस्थ या सामान्य नज़र आ सकते हैं लेकिन कई ऐसे सांस्कृतिक पर्यावरण हैं जिनमें यही लक्षण अस्वस्थ और अतिशय नज़र आ सकते हैं.

इस बात को इस तरह से भी समझ सकते हैं- हममें से कई लोगों ने ये सीखा है- भले ही अपने अनुभवों से या अपने आसपास लोगों को देखकर- कि हम जिस किसी व्यक्ति से मिलते हैं उस पर विश्वास करना सही नहीं है. विश्वास का ये गुण एक अविच्छिन्नक स्थिति में काम करता रहता है यानि पूरा का पूरा बना रहता है. लेकिन अतिशयता के छोर पर वे लोग हैं जो बहुत सीधेसादे या भोलेभाले होते हैं और जो अपने आसपास हर व्यक्ति पर अविश्वास करते हैं.

ज़्यादातर लोग इन दो पराकाष्ठाओं के बीच आते हैं, उनमें अपने दोस्तों और परिवार पर भरोसा करने की क्षमता होती है, और अपने को सुरक्षित रखने के लिए अजनबियों पर अविश्वास की औचित्यपूर्ण मात्रा भी होती है यानि वे जानते हैं कि उस पर भरोसा करना सही है या नहीं. मध्य आयु के लोग (इनमें वे भी शामिल हैं जिनमें अविश्वास की एक स्वस्थ मात्रा है) बेहतर ढंग से तालमेल बना लेते हैं और अपनी देखरेख ख़ुद कर सकते हैं.

जो बहुत ज़्यादा भोलेभाले हैं वे बार बार धोखा खा सकते हैं जबकि वे जो हरेक के प्रति अविश्वास ही रखते हैं वे नज़दीकी संबंध बनाए रखने में असमर्थ होते हैं. उन्हें अपना व्यवहार बदलने में कठिनाई होती है या उसे बदलना उनके लिए लगभग असंभव हो जाता है भले ही वे जानते हैं कि इससे उनका कुछ भला नहीं हो रहा है.

व्यक्तित्व विकार को कैसे पहचान सकते हैं?

व्यक्तित्व विकार की पहचान के लिए ये ज़रूरी है कि व्यक्ति एक सतत तय अवधि के दौरान और विभिन्न सामाजिक स्थितियों में एक ही जैसे लक्षणों का प्रदर्शन करता है.

उदाहरणः असामाजिक व्यक्तित्व विकार वाले लोगों में दूसरों के प्रति एक रूखा व्यवहार देखा जाता है, वे संवेदनहीन होते हैं और दूसरों का इस्तेमाल अपना काम निकालने या फ़ायदा हासिल करने के लिए करते हैं. एक ऐसे आदमी का मामला लें जो दफ़्तर में बहुत आक्रामक और जुगाड़ में माहिर है. वो इतना महत्त्वाकांक्षी होता है कि सफल होने के लिए दूसरों का इस्तेमाल करने के बारे में सोचता भी नहीं.

वो काम निकालने के लिए शॉर्टकट अपनाता है और अपने आसपास के लोगों की तुलना में उसमें कोई नैतिकता या विवेक नहीं होता- उसके लिए, ईमानदारी से बढ़कर है सफलता. घर पर, फिर भी, उसका व्ववहार बहुत ज़्यादा अलग हो सकता है, वो अपने परिवार के साथ अच्छे ढंग से रहता है, और उनसे भावनात्मक रूप से सही प्रकार जुड़ा रहता है.

उपरोक्त व्यक्ति का कार्यस्थल पर व्यवहार ये बता सकता है कि वो असामाजिक व्यक्तित्व विकार से पीड़ित है, लेकिन ये आकलन सही नहीं है. वो असामाजिक व्यक्तित्व विकार से पीड़ित है या नहीं, ये पता लगाने के लिए उसमें हर जगह और हर अवसर पर बेरुख़ी, संवेदनहीनता, चालाकी और अनादर की भावना वैसी ही रहनी चाहिए. यानि जो व्यवहार उसका दफ़्तर में है, वही उसका घर पर, दोस्तों के बीच और दूसरी सामाजिक स्थितियों के दौरान रहना चाहिए.   

व्यक्तित्व विकार यानि पर्सनैलिटी डिसऑर्डर के लक्षण क्या हैं?

पर्सनैलिटी डिसऑर्डर कई तरह के होते हैं. और हरेक विकार के अपने लक्षण होते हैं. पर्सनैलिटी डिसऑर्डरों को तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता हैः

समूह क: अटपटा/ सनक भरा व्यवहार

समूह ख: नाटकीय, डांवाडोल, भावुक व्यवहार

समूह ग: व्याकुल, चिंतातुर और भयातुर व्यवहार

संविभ्रम या व्यामोह विकार (दूसरों के प्रति अविश्वास, संदेह, दूसरों पर नुकसान पहुँचाने या फ़ायदा उठाने का आरोप)

असामाजिक व्यक्तित्व विकार

त्याज्य व्यक्तित्व विकार

एकांतिक या सामाजिक विच्छेद व्यक्तित्व विकार (उदासनीता या समाज से कट जाना)

बॉर्डरलाइन पर्सनैलिटी विकार

पराश्रित व्यक्तित्व विकार

अलगावजन्य विकार (शिज़ोटाइपल विकार)

(सामाजिक अलगाव में रहने की इच्छा, सामाजिक स्थितियों में घबराहट, उटपटांग ख़्याल)

आत्मकामी व्यक्तित्व विकार (आत्मकेंद्रित)

आसक्त-बाध्यकारी व्यक्तित्व विकार (एनानकास्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर)

 

नाटकीय व्यक्तित्व विकार (अतिनाटकीय विषाद या निराशा)

 

कुछ लक्षण जो ज़्यादातर पर्सनैलिटी डिसऑर्डरों में समान रूप से पाए जाते हैं, वे इस तरह से हैं:

  • दूसरे लोगों के साथ व्यवहार में कठिनाई (दोस्त, परिजन या सहकर्मी)
  • जीवन में आने वाले परिवर्तनों के हिसाब से ख़ुद को ढालने में कठिनाई
  • हर चीज़ को ब्लैक ऐंड व्हाइट यानि लिखित में देखने की प्रवृत्ति, हर चीज़ पहले से तय हो, लिखी हुई हो, काम कैसे हो इसे लेकर एक तय और एकांगी नज़रिया
  • लंबी अवधि वाले स्वस्थ संबंधों को निभाने में असमर्थता
  • अपने काम की ज़िम्मेदारी लेने की कमी
  • हर चीज़ को बहुत गंभीरता से लेने की प्रवृत्ति, या किसी चीज़ से पूरी तरह अलगथलग पड़ जाना (ख़ासकर भावनात्मका मामलों में)
  • व्यवहार के पैटर्न में बदलाव करने में असक्षम, उस स्थिति में भी जबकि ये पैटर्न उन्हें ख़ुद या दूसरों को नुक़सान पहुँचाते हैं.

व्यक्तित्व विकार यानि पर्सनैलिटी डिसऑर्डर की वजह क्या है?

व्यक्तित्व विकार आनुवंशिक वजहों से हो सकते हैं, इसके साथ बचपन में यौन शोषण, हिंसा या सदमे की घटनाएँ भी वजह बन सकती हैं.

आधुनिक जैवमनोसामाजिक मॉडल कहता है कि जैविक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों को व्यक्तित्व विकार की पहचान के लिए एक साथ रखकर देखा जाता है.

  • जैविक कारक: इनका संबंध मस्तिष्क की संरचना और उसमें न्यूरोट्रांसमीटर (एक तरह के रसायन) की मौजूदगी से है जो दिमाग से महत्त्वपूर्ण संदेश ले जाते हैं और उस तक ऐसे संदेश पहुँचाते हैं. शोध बताते हैं कि व्यक्तित्व विकार से पीड़ित व्यक्ति में एक विकृत जीन हो सकती है जो उसे जोखिम में डालती है. अगर वो व्यक्ति ऐसे किसी व्यक्ति से आनुवंशिक रूप से जुड़ा है जिसे व्यक्तित्व विकार है तो उसमें भी ये विकार पनपने का ज़्यादा जोखिम रहता है.
  • मनोवैज्ञानिक कारक: ऐसे बच्चे जिन्होंने यौन शोषण या कोई अन्य सदमा झेला है, उन्हें व्यक्तित्व का विकार हो सकता है.
  • सामाजिक कारक: जैविक और सामाजिक स्थितियों की अनुपस्थिति में यानि स्नेह वाले समुदाय और सहायता के उद्यत संबंधों की कमी से भी बच्चे में व्यक्तित्व का विकार पनप सकता है. शोध के मुताबिक अगर मज़बूत और स्नेहिल संबंध हों तो जैविक और सामाजिक कारकों से होने वाले ख़तरे दूर किए जा सकते हैं.

मुझे कैसे पता चलेगा कि किसी को व्यक्तित्व का विकार यानि पर्सनैलिटी डिसऑर्डर है

व्यक्तित्व विकार आमतौर पर बचपन के बाद और किशोरावस्था में पनपता है. व्यक्ति ज़रूरतमंद, बहुत सख़्त, साथ के लिए बहुत दुष्कर या चालाक दिख सकता है. क्योंकि ये नज़रिए या रवैये की समस्या मानी जाती है लिहाज़ा परिवार और दोस्त हो सकता है इसे व्यक्तित्व विकार के तौर पर शुरुआत में नहीं पहचान पाएँ. इस विकार की स्पष्ट पहचान युवा उम्र से ही हो पाती है.

अगर आपको लगता है कि आपके जानने वाले किसी व्यक्ति को व्यक्तित्व विकार है तो कुछ संकेत या चिन्ह हैं जिनकी आप तस्दीक कर सकते हैं.

  • ये लक्षण जो या तो कम होता है या अत्यधिक, व्यक्ति और उसके आसपास के लोगों को बहुत सारी स्थितियों के दरम्यान मुश्किल में डाल देता है. विभिन्न जगहों या देशकाल में इस व्यवहार का दोहराव देखा जाता हैः घर पर, दफ़्तर में, स्कूल में और सामाजिक अंतःक्रिया के अन्य क्षेत्रों में
  • व्यक्तित्व के विकार से पीड़ित व्यक्ति को भावनाओं पर वश रखने में समस्याएँ आती हैं, वह भावनात्मक रूप से अस्थिर हो सकता/सकती है. 
  • व्यक्ति को दोस्तों और संबंधों में संकट का सामना करना पड़ सकता है. ऐसा व्यक्ति दूसरों के साथ किसी तरह संबंध नहीं जोड़ पाता. और कई व्यक्तियों के साथ संबंध बनाने के लिए परेशान रहता है या तड़पता रहता है. उसके संबंध स्थायी नहीं रहते और वे बनते बिगड़ते रहते हैं.
  • अगर चीज़ें और संबंध अपने अनुकूल न हों तो व्यथित होकर व्यक्ति ख़ुद को नुकसान भी पहुँचा सकता है. याद रखें कि व्यक्तित्व विकार के शिकार किसी व्यक्ति में वही व्यवहारजन्य विशिष्टताएँ होती हैं जो अन्य सामान्य लोगों में होती हैं. कोई एक व्यक्तित्व विकार संभावित रूप से अस्वस्थ या अहितकारी हो सकता है. लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि हमारे चारों ओर हर व्यक्ति में कोई न कोई व्यक्तित्व विकार है. ये संकेत सिर्फ पहचान या शिनाख़्त के लिए हैं और अंतिम तौर पर पहचान यानि डायग्नोसिस का काम किसी प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ पर छोड़ देना ही सबसे सही है.

व्यक्तित्व विकार या पर्सनैलिटी डिसऑर्डर की पहचान कैसे की जाती है?

पर्सनैलिटी डिसऑर्डर यानि व्यक्तित्व विकार की पहचान चुनौतीपूर्ण हो सकती है. क्योंकि इस विकार का पीड़ित व्यक्ति ये देखने में अनिच्छुक और असमर्थ रहता है कि उसके व्यक्तित्व में एक ऐसा अवगुण आ गया है जो उसके लिए और अन्य लोगों के लिए कठिनाई का कारण बना हुआ है.

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मरीज़ और उसके दोस्तों और परिजनों के साथ बातचीत के आधार पर विकार की पहचान करता है. वो तमाम विशिष्टताओं की पहचान करता है और उनकी समीक्षा करता है जो विकृति पैदा कर रहे हैं और विकृति का स्तर क्या है, इसकी भी पड़ताल करता है. मनोचिकित्सक कुछ ख़ास प्रश्नों के साथ संबंधित व्यक्ति का संदर्शन भी करता है, ये सुनिश्चित करने के लिए कि कहीं पीड़ित व्यक्ति के लक्षणों के आधार पर ज्यादा ही डायग्नोज़ या कम डायग्नोज़ तो नहीं किया गया है.  

व्यक्तित्व विकार या पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का इलाज

पर्सनैलिटी विकार से पीड़ित मरीज़ों के लिए थेरेपी, इलाज का एक प्रमुख माध्यम है. मरीज़ को सलाह दी जाती है कि वो नियमित रूप से थेरेपिस्ट से मिले और कैसा महसूस करता है, इस बारे में उसे बताता रहे. उसे अपनी शख़्सियत की ख़ासियतों का अंदाज़ा होता रहे, उनके बारे में वह थेरेपिस्ट को बताए, उनके बारे में सजग हो और दूसरों के साथ उसका व्यवहार कैसा है, इस बारे में भी बात करता रहे. इससे उसे अपने उस व्यवहार को पहचानने में मदद मिलेगी जिसे बदलने की ज़रूरत है.

व्यक्ति के किसी पर्सनैलिटी विकार के मामले में जो बचपन के किसी कठिन और अप्रिय अनुभव से पैदा हुआ है (जैसे सदमा, शारीरिक या मानसिक शोषण), उसके लिए थेरेपिस्ट व्यक्ति को ये समझने में मदद करते हैं कि इस क़िस्म के व्यवहार क्यों सामने आते हैं और इस व्यवहार को बदलने के लिए क्या करना चाहिए.

पर्सनैलिटी विकार से पीड़ित मरीज़ों को आमतौर पर अपने लक्षणों के लिए दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती है. अलबत्ता डॉक्टर दूसरे संबंद्ध मामलों जैसे अवसाद, मनोरोग या घबराहट के लिए कुछ दवाएँ लेने की सलाह दे सकते हैं.

व्यक्तित्व विकार या पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति की देखरेख

पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से पीड़ित व्यक्ति की देखरेख कई कारणों से बहुत चुनौतीपूर्ण हो सकती हैः पहला, मरीज़ ये नहीं मानता या ये नहीं समझता कि उसका व्यवहार असामान्य है और दूसरों को उसके व्यवहार से तक़लीफ़ हो रही है. दूसरा, मरीज़ की कुछ धारणाएँ बड़ी पक्की होती हैं जैसे उसे लगता है कि उसके आसपास का माहौल उसके प्रति अन्यायपूर्ण है, वो अकेला है, कोई उसे नहीं समझता है और उनका जीवन व्यर्थ है, वे बेकार हैं.

इन धारणाओं से मरीज़ के भीतर जो गुस्सा, उदासी और हताशा पनपती है उन्हें वो अपने परिजनों और दोस्तों की तरफ़ मोड़ देता है. ऐसी स्थिति में, कुछ चीज़ें है जो आप देखरेख करने वाले के रूप में ध्यान रखकर मरीज़ की मदद कर सकते हैं-

याद रखें कि पर्सनैलिटी डिसऑर्डर दुराग्रही या सुविचारित विकल्प नहीं है. यानि कोई जानबूझकर ऐसा नहीं करता है. ये किसी मरीज़ के क्रियाशील जीवन का अंत भी नहीं है- जितना जल्दी विकार का इलाज शुरू हो जाए उतना अच्छा है क्योंकि जो भी इलाज की प्रक्रिया अपनाई जाती है उसके प्रति मरीज़ ख़ुद को ढाल सकता है और उस प्रक्रिया में सहजता से शामिल हो सकता है. इस तरह उसमें सुधार की संभावना बढ़ जाती हैं.

विशेष क़िस्म के पर्सनैलिटी विकारों वाले मरीज़- असामाजिक व्यक्तित्व विकार, एकांतिक या सामाजिक विच्छेद व्यक्तित्व विकार यानि अकेले रहने और समाज से अलगथलग हो जाने की प्रवृत्ति से जुड़ा विकार, सनक या पीड़ानोन्माद या संविभ्रम व्यक्तित्व विकार, आसक्त-बाध्यकारी व्यक्तित्व विकार (एनानकास्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर) और खंडनवादी व्यक्तित्व विकार से पीड़ित मरीज़ ये नहीं जान पाते हैं या नहीं मानते हैं कि उनके व्यवहार से कष्ट हो रहा है. देखरेख करने वाले के लिए मरीज़ को ये समझाना कठिन हो जाता है कि उसे इलाज की ज़रूरत है.

उसके व्यवहार को ग़लत बताने या उस ओर इंगित करने के बजाय, ऐसी स्थिति देखनी चाहिए जहाँ व्यक्ति की अस्वस्थ विशिष्टता उसे किसी स्तर की कठिनाई में डाल देती है. फिर उस अवसर का इस्तेमाल उसे ये बताने के लिए करना चाहिए कि कष्ट कैसे हुआ (इसे उसकी कमी या गलती की तौर पर पेश न करें).

इस बात का उल्लेख सुनिश्चित करें कि आप व्यक्ति के बारे में चिंतित हैं, उसकी चिंता करते हैं और अगर वो मदद चाहता या चाहती है तो उसकी मदद के लिए तैयार हैं. ऐसे किसी बयान या हावभाव से परहेज़ करें जिससे व्यक्ति ये मान लेने पर विवश हो जाए या ऐसा महसूस करने लगे कि अपने विकार के लिए वही ज़िम्मेदार है.

अगर मरीज़ मनोचिकित्सक से मुलाकात के लिए मना करता है, तो आप ये सुझाव दे सकते हैं कि वो किसी काउंसलर या परामर्शदाता से मिल ले जो उसकी इस हालत से निपटने में मदद कर सकता है. काउंसलर भी समस्या की पहचान करने में समर्थ होगा और ये भी बहुत संभव है कि वो मरीज़ को इस बात के लिए तैयार कर ले उसे इलाज की ज़रूरत है. अगर आपको लगता है कि व्यक्ति ख़ुद का या दूसरों को नुक़सान पहुँचा सकता है या सकती है तो सीधे मनोचिकित्सक से मिलना ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा.


और जानकारी

संबंधित