स्पीच डिसऑर्डर यानि वाक् शक्ति के परेशानी

स्पीच डिसऑर्डर क्या है?

अपनी सामान्य वृद्धि और बढ़ती उम्र के साथ बच्चे वाक् और भाषा के कौशल हासिल करते हैं. लेकिन कुछ बच्चो में बोलने की समस्याँ हो सकती हैं. उनकी वाक् शक्ति में गड़बड़ी हो सकती है.

वाक् विकार एक ऐसी स्थिति है जिसके तहत बच्चे को बोलने में हर तरह की दिक्कत आती है. संचार के लिए ज़रूरी उच्चारण, आवाज़, प्रवाह और वाक ध्वनियाँ निर्मित करने और उनका इस्तेमाल करने में समस्या रहती है हालांकि वो शब्दों को अच्छी तरह समझता है और भाषा जानते हैं.

सूचना: वाक् विकार भाषा के विकार से अलग है. वाक् विकार वाले बच्चों को शब्दों की ध्वनियाँ बोलने में दिक्कत आती है. भाषा विकार ऐसी स्थिति है जहाँ बच्चों को दूसरों के साथ संवाद करने में मुश्किल आती है (अभिव्यक्ति की भाषा का विकार) या दूसरे क्या कह रहे हैं उसे समझने में समस्या आती है (ग्रहणात्मक भाषा विकार). 

स्पीच डिसऑर्डर के प्रकार

  • एप्रेक्सिया (Apraxia) मनःशक्ति क्षय: ये एक ऐसा संवेगी विकार है जिसमें बच्चे को जीभ, ओंठ या जबड़े के ऐच्छिक घुमाव में मुश्किलें आती हैं. बच्चा जानता है कि वो क्या कहना चाहता है लेकिन मस्तिष्क शब्द निर्मित करने के लिए ज़रूरी पेशी संचालन के साथ तालमेल नहीं कर पाता है. यानि मुँह की पेशियाँ उसका बोलने में साथ नहीं दे पाती हैं.
  • डिसारथ्रिया (Dysarthria), कठिन और दोषयुक्त बोल: लकवा, दुर्बलता या मुँह की पेशियाँ की सामान्यतः कमज़ोर स्थिति. इससे वाक् या बोलने की कोशिश धीमी, ग़लत, लड़खड़ाती हुई और हाइपरनेज़ल यानि बहुत ज़्यादा नाक से निकलती हुई लगती है. 

स्पीच डिसऑर्डर क्या नहीं है

जब बच्चे बोलना शुरू करते हैं, वे नए शब्द सीखने और ख़ुद को अभिव्यक्त करने में समय लेते हैं. इस दौरान वे टूटेफूटे ढंग से यानि तोड़ तोड़कर बोलते हैं. ये एक स्वाभाविक बात है और इसे वाक् विकार नहीं कहा जा सकता है. इस अवस्था में बच्चों के बोलने में प्रवाह के अभाव पर अत्यधिक ध्यान देने से हकलाहट पैदा हो जाने की आशंका भी रहती है.

स्पीच डिसऑर्डर के चिन्ह क्या हैं?

प्रत्येक बच्चे में लक्षणों की संख्या और उनकी गंभीरता अलग अलग पाई जाती है. कभीकभार लक्षण इतने मद्धम या हल्के होते हैं कि पहचान में ही नहीं आ पाते हैं. ऐसे हल्के रूप अपने स्तर पर ग़ायब भी हो जाते हैं.

कुछ बच्चों में वाक् विकार के अलावा दूसरी समस्याएँ भी हो सकती हैं. इनमें शामिल हैं- कमज़ोर शब्दज्ञान, पढ़ने, लिखने, स्पेलिंग या गणित करने में समस्याएँ, शरीर में समन्वय की कमी, चबाने और गटकने में समस्याएँ.

बहुत छोटा शिशु (0-5 वर्ष)

• नवजात की तरह तुतलाता नहीं है.

• ध्वनियों और शब्दांशों या अक्षरों को सही क्रम या सिलसिले में रखने में कठिनाई महसूस करता है.

• शब्द का उच्चारण करते हुए अक्षर या ध्वनि छोड़ देता है.

• ध्वनियों को जोड़ने में समस्याएँ होती हैं, ध्वनियों के बीच लंबे अंतराल छोड़ता है.

• कठिन ध्वनियों के बदले आसान ध्वनियों का इस्तेमाल कर शब्दों को सरलीकृत करता है या कठिन ध्वनियों को हटा ही देता है.

• खाने में समस्याएँ आती हैं.

थोड़ा बड़ा बच्चा (5-10 साल)

• ध्वनि की समझ और इस्तेमाल में असंगत और अस्थिर रहता है. ये ध्वनि त्रुटियाँ अपरिपक्वता का नतीजा नहीं होती हैं.

• बोलने से ज़्यादा भाषा को बेहतर ढंग से समझता है.

• छोटे वाक्यों की अपेक्षा बड़े वाक्यों को कहने में ज़्यादा कठिनाई होती है.

• शब्द का ठीक से उच्चारण करने के लिए संघर्ष करता रहता है और दोहराते हुए फिर से ग़लती करता है

• बोलते हुए अस्थिर, एकांगी लगता है. ग़लत अक्षर या शब्दांश या शब्द पर ज़ोर देता है

• बोलते हुए लगातार ग़लतियाँ करता है

 

​स्पीच डिसऑर्डर की वजह क्या है?

ज़्यादातर बच्चों में, वाक् विकार की वजह अज्ञात है. शोध के मुताबिक बोलने के लिए ज़रूरी पेशियों की हरकत के साथ दिमाग तालमेल बनाने में असमर्थ रहता है और इसी से बोलने में समस्या आती है. यानि वाक् शक्ति का विकार होता है, जिसे हम यहाँ वाक् विकार भी कह रहे हैं. वाक् विकार अन्य वजहों से भी हो सकता है जैसे फटा हुआ तालू, बहरापन या दिमागी लकवा.

स्पीच डिसऑर्डर की पहचान कैसे होती है?

विकार का पता लगाने के लिए या इसकी पहचान के लिए बच्चे की किसी विशिष्ट उम्र का होना ज़रूरी नहीं है. विशेषज्ञ, तीन साल से कम उम्र वाले बच्चों में विकार की पहचान न कर पाएँ क्योंकि बच्चा इस पहचान के लिए निर्धारित परीक्षणों और उसमें निहित निर्देशों का पालन नहीं कर पाएगा या इस जाँच में सहयोग नहीं कर पाएगा. इसीलिए पहचान का काम इस बात पर बहुत निर्भर करता है कि बच्चा उस जाँच से कैसा सहयोग करता है या उसकी प्रतिक्रिया कैसी रहती है और इस तरह के टेस्टों में वो पूरा सहयोग कर पा रहा है या नहीं.

निम्न में से कुछ टेस्ट वाक् विकार की पहचान के लिए किए जाते हैं-

  • डेनवेर आर्टिकुलेशन स्क्रीनिंग इक्ज़ामिनेशन
  • अर्ली लैंग्वेज माइलस्टोन स्केल
  • डेनवेर II
  • पीबॉडी चित्र शब्दावली टेस्ट, संशोधित अंक
  • हियरिंग टेस्ट (सुनने की क्षमता का परीक्षण)

वाक् टेस्ट: वाक् और भाषा चिकित्सक विकास संबंधी इतिहास का रिकॉर्ड दर्ज करता है और अन्य चिकित्सागत समस्याओं की जाँच भी करता है. जानकार ये भी देखता है कि बच्चे की बोलने की क्षमता सामान्य पैटर्न पर विकसित हो रही है या दूसरे बच्चों की तुलना में धीमी है.

अगर जानकार ये पाता है कि बच्चे के भीतर सामान्य वाक् विकास के गुण नहीं नज़र आ रहे हैं तो बच्चे को वाक् विकार की पुष्टि के लिए अलग ढंग से जाँच और निरीक्षण का काम किया जाता है.

संवर्धी और वैकल्पिक संचार, ऑगमेंटेटिव एंड ऑल्टरनेटिव कम्यूनिकेशन (एएसी): इस पद्धति में सहायता के लिए प्रोद्योगिकी की मदद ली जाती है जैसे कम्प्यूटर, आईपैड और ऑडियो-वीडियो वाले मॉडयूल जो स्पीच यानि बोलने की क्षमता को सुधारने में उपयोगी हो सकते हैं.

ऑडियोमिट्री टेस्ट: बौद्धिक अक्षमता और बहरापन भी वाक् विकार की वजह हो सकते हैं. जिन नवजात बच्चों में इस विकार के पनपने की आशंका रहती है उन्हें ऑडियोलॉजिस्ट को दिखाना चाहिए और एक ऑडियोलॉजी टेस्ट कराना चाहिए. ज़रूरत पड़ने पर ऑडियोलॉजिकल और स्पीच थेरेपी, उसके बाद शुरू की जा सकती है.

स्पीच डिसऑर्डर का इलाज

वाक् शक्ति में आए विकार के इलाज के लिए कोई एक अकेली पद्धति नहीं है. विशेषज्ञ इलाज के विभिन्न तरीकों और थेरेपियों को मिलाजुलाकर काम में लाते हैं और इस तरह बच्चे की बोलचाल में सुधार में मदद करते हैं. हर बच्चा इलाज के प्रति अपने अपने ढंग से रिस्पाँड करता है यानि हर बच्चे पर इलाज का असर अलग अलग पड़ता है क्योंकि कु्छ बच्चों में अन्य की अपेक्षा तेज़ी से सुधार होता है.

विशेषज्ञ अभिभावकों को ये सलाह दे सकते हैं कि वे बच्चे के लिए समुचित सहायता और देखरेख का इंतज़ाम रखें. अभिभावक थेरेपी के सत्रों में भी भाग ले सकते हैं. इससे वे सीख सकते हैं कि घर पर थेरेपी को कैसे जारी रखा जा सकता है क्योंकि निरंतर अभ्यास हालत में तेज़ी से सुधार करता है. सहायता के लिए प्रतिबद्ध और प्रेम से भरपूर घरेलू पर्यावरण सुधार की दिशा में बहुत उपयोगी औ और हितैषी है.

एक स्वस्थ बच्चा इलाज और थेरेपियों के प्रति ज़्यादा ग्रहणशील या संवेदनशील होता है. किसी शारीरिक बीमारी (कान और साइनस के संक्रमण, टाँसिल, एलर्जी या दमा) से जूझते बच्चे को इलाज का फ़ायदा हो सकता है न मिले क्योंकि शारीरिक इलाज के लिए की जाने वाली चिकित्सा, वाक् थेरेपी के आड़े आ सकती है.

इसलिए अभिभावकों को वाक् विकार से पीड़ित बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखना चाहिए क्योंकि स्वास्थ्य ठीक रहेगा तो बच्चा वाक् सुधारने के लिए दी जा रही चिकित्सा या थेरेपी से पूरी तरह या कहें एकतरफ़ा लाभ ले पाएगा और उसकी हालत में तेज़ी से सुधार देखा जा सकेगा.

अगर स्पीच डिसऑर्डर का इलाज न किया जाए तो क्या होता है?

अगर बच्चे को शुरुआती अवस्था में इलाज नहीं मिलता तो उसे अन्य और भी समस्याएँ हो सकती हैं, जैसेः

  • भाषा विकास में विलंब या देरी
  • शब्द को समझने या दोहराने या वाक्य में शब्दों के क्रम को लेकर भ्रम
  • सूक्ष्म मोटर गति या समन्वय में मुश्किल
  • मुँह में अति संवेदनशील (हाइपरसेंसेटिव) या अधःसंवेदनशील (हाइपोसेंसेटिव) हो जाने की आशंका (दाँतो पर ब्रश करना पसंद न करना या कुरकुरी चीज़ न खा पाना)
  • पढ़ने, स्पेलिंग बोलने या लिखने में समस्याएँ. इसका असर उनके अकादमिक विकास पर पड़ता है.

स्पीच डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चे की देखरेख

निर्धारित थेरेपी के साथ, आप अपने बच्चे को निम्न गाइडलाइन यानि दिशा निर्देशों की मदद से भी बोलने, संवाद करने या बातचीत करने में मदद कर सकते हैं.

  • कुछ थेरेपी गतिवधियों का घर पर अभ्यास करें. इससे आपका बच्चा शब्दों की सही ध्वनियों से परिचित हो पाएगा.
  • साधारण सवाल पूछें जिससे आपका बच्चा उन शब्दों को बोलना और उनका अभ्यास करना सीख पाए.
  • अपने बच्चे को धीरे बोलने के लिए प्रोत्साहित कीजिए. धैर्य से सुनिए कि वह क्या कह रहा है या कहना चाहता है और जब वह शब्द का सही उच्चारण करता है तो उसकी सराहना कीजिए.
  • अपने बच्चे को सुरक्षित महसूस करने दीजिए. और उसे ये अहसास कराइए कि उसकी बात सुनने के लिए आप हमेशा उपलब्ध हैं. और किसी भी किस्म की मुश्किल आने पर, उसके हल के लिए हमेशा उसकी मदद के लिए भी उपलब्ध है. 

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