स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति की देखभाल

स्किज़ोफ़्रेनिया का इलाज किया जा सकता है?

  • अन्य कई मनोविकारों की तरह, स्किज़ोफ़्रेनिया एक ऐसी बीमारी है जिसका प्रभावी तरीके से इलाज संभव है. और कई मामलों में, मरीज़ उपचार के बाद लगभग स्वतंत्र क्रियाशील जीवन में लौट आता है. अन्य लंबी शारीरिक बीमारियाँ जैसे डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन की तरह, दवाओं और सहायता के ज़रिए इस विकार पर काबू पाया जा सकता है. ज़रुरत है तो उचित दवाओं की, परिजनों और मित्रों के सपोर्ट की, एक तयशुदा रूटीन की और उचित मनोवैज्ञानिक इनपुट की.

    “नियम ये है कि स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित एक तिहाई लोग सामान्य जीवन में लौट आते हैं, उनमें से एक तिहाई सामान्य से ज़रा कम के स्तर पर क्रियाशील जीवन में लौटते हैं और वे स्थितियों से निपटने में सक्षम होते हैं, शेष एक तिहाई लोगों को क्रियाशील या सामन्य जीवन बिता पाने में ज़्यादा सहायता की ज़रूरत पड़ती है.

    कोई ये निश्चित अनुमान नहीं लगा सकता कि मरीज़ कब पूरी तरह से सामान्य हो पाएगा. इसका सूत्र टिका है शुरुआती पहचान परः जितना जल्दी आप समस्या की शिनाख़्त कर लेंगे और बीमारी की पहचान पक्की हो जाएगी तो आपका इलाज भी उतना ही गंभीरता और मुस्तैदी से चलेगा, और इसी आधार पर अच्छे नतीजे की संभावना बढ़ जाएगी. एक योजनाबद्ध उपचार का पालन करना सुधार की कुंजी है,” ये कहना है मनोचिकित्सक डॉक्टर एस कल्याणसुंदरम का. वे रिचमंड फ़ैलोशिप सोसायटी की बंगलौर शाखा के एमडी और सीईओ हैं.

पहचान और इलाज में देखरेख करने वालों की क्या भूमिका है?

  • स्किज़ोफ़्रेनिया धीरे धीरे उभरता है, अगर इलाज न मिले तो लक्षण समय के साथ बिगड़ते चले जाते हैं. स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित मरीज़ को पता नहीं होता है कि उनका व्यवहार विचित्र या असाधारण हो गया है. उसके परिवार और मित्र निश्चित ही ये पहचान सकते हैं कि उसे ये विकार है और उसे इसके लिए उचित इलाज की ज़रूरत है.

    शिज़ोफ्रेनिया की शुरुआती अवस्था, पहचान औऱ इलाज के लिए आदर्श अवस्था है. जितना जल्दी इलाज शुरू कर दिया जाए, उतना ज़्यादा दवाओं के असरदार रहने की संभावना रहती है. स्किज़ोफ़्रेनिया की शुरुआत के चिन्ह इस तरह से हैं: किसी स्पष्ट वजह के बिना भी चिड़चिड़ेपन में बढ़ोतरी, अलगाव, भूख और नींद का न रहना, बिना वजह हँसना या मुस्कुराते रहना, ध्यान की कमी और अपनी साफ़ सफ़ाई और साज संवर को लेकर उदासीन हो जाना.

    ये ध्यान रखने की बात है कि किसी एक अकेले लक्षण की मौजूदगी का अर्थ ये नहीं है कि आपके प्रियजन को स्किज़ोफ़्रेनिया ही होगा. स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित मरीज़ एक पूरी समयावधि के दौरान ऊपर बताए गए लक्षणों का मिलाजुला व्यवहार प्रदर्शित करता है और ये लक्षण सप्ताहों या महीनों की अवधियों में धीरे धीरे उभरते जाते हैं. ये भी संभव है कि उन्हें किसी अन्य प्रकार का मनोविकार हो. जो भी हो, इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए और विकार की पहचाना कर इलाज शुरू करना चाहिए.

बीमारी की पहचान के लिए मैं डॉक्टर की क्या मदद कर सकता/सकती हूं? मुझे कितनी सूचना शेयर करनी चाहिए यानी डॉक्टर को क्या सबकुछ बता देना चाहिए या नहीं?

  • मनोविकारों की पहचान करना शारीरिक बीमारियों की पहचान करने से ज़्यादा चुनौतीपूर्ण होता है. डॉक्टर के पास कोई विज़ुअल प्रमाण नहीं होता है जैसे एक्सरे, स्कैन या लैब टेस्ट. उन्हें मरीज़ के साथ संवाद और उसकी देखरेख करने वालों की संभावित लक्षणों के बारे में दी गई रिपोर्ट की मदद से ही, विकार की पहचान करनी होती है.

    स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित मरीज़ में बीमारी को लेकर सजगता नहीं होती है. उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं हो पाता है कि उनका व्यवहार विचित्र है या असाधारण है. इस तरह परिवार को ही सही और सटीक सूचना मुहैया कराने के मामले में डॉक्टर की मदद करनी होती है. वे मरीज़ के व्यवहार में आ रहे बदलावों के बारे में डॉक्टर को बेहतर बता सकते हैं.

    डॉक्टर से खुलकर बात करें. वो एक पेशेवर व्यक्ति होता है और वो गोपनीयता के उसूलों से बँधा होता है. परिवार की निजी बातें या बहुत नगण्य या तुच्छ सी बातें जिन्हें आप नज़रअंदाज़ कर देना ही बेहतर समझते हैं, ऐसी बातें भी डॉक्टर के लिए बीमारी की पहचान की दिशा में महत्त्वपूर्ण और उपयोगी हो सकती हैं. क्योंकि हो सकता है कि ऐसी ही किसी बात से मरीज़ को तक़लीफ़ हो रही हो सकती है. डॉक्टर ही ये भाँप सकता है. डॉक्टर से मरीज़ के तमाम असामान्य व्यवहार के बारे में विस्तार से बता देना ही सही होता है. डॉक्टर ही ये तय कर सकता है कि उसके लिए कौन सी सूचना प्रासंगिक है या नहीं.

    ध्यान रखिए कि कोई भी सूचना अप्रासंगिक या व्यर्थ नहीं होती है. और डॉक्टर सिर्फ़ ये चाहता है कि मरीज़ की हालत में सुधार हो और वो ठीक हो जाए. उसका काम आपको या मरीज़ के बारे में कोई राय बनाने या कोई फ़ैसला सुनाने का नहीं होता है.

बीमारी की पहचान करने वाले डॉक्टर से मैं कौनसी सूचना शेयर करूं?

  • इलाज करने वाले डॉक्टर से आप निम्न प्रश्न पूछ सकते हैं जिससे आपको बीमारी को पहचानने में मदद मिल सकती हैः

    • लक्षण क्या हैं?

    • पहचान का आपके प्रिय के लिए क्या मायने है?

    • मरीज़ की बेहतरी के लिए किस तरह की सहायता और इंतज़ाम की ज़रूरत पड़ती?

    • क्या उसे दवाओं की ज़रूरत है? काउंसलिंग की भी ज़रूरत होगी?

    • क्या मरीज़ के साथ हर समय देखरेख करने वाले को रहने की ज़रूरत है?

    • इलाज कब तक चलेगा?

    • क्या चेतावनी के भी कोई संकेत होते हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए?

    • मरीज़ को कौनसी दवाएं दी गई हैं? वे अपना असर कबसे दिखाना शुरू कर देंगी?

    • अगर मरीज़ दवा न लेना चाहें तो फिर क्या करें?

    • संभावित साइड अफ़ेक्ट क्या हो सकते हैं? मरीज़ को इनसे निपटने में आप क्या मदद कर सकते हैं? क्या ऐसे कोई साइड अफ़ेक्ट होते हैं जिनके बारे में डॉक्टर को तत्काल सूचना देना ज़रूरी है?

    • क्या आपको इस बात की निगरानी रखने की ज़रूरत है कि मरीज़ अपनी दवाएं किस प्रकार लेता है? बिना उसे अटपटा महसूस कराए या उसे असुविधाजनक न लगे, इसे ध्यान में रखते हुए, निगरानी का काम किस तरह किया जा सकता है?

    • मरीज़ के स्वास्थ्य में सुधार में मदद के लिए परिजन या मित्र के रूप में आप क्या कर सकते हैं?

मैं अपने प्रियजन से उसके व्यवहार के बारे में कैसे बात करूं और उसे कैसे मनाऊं कि उसे इलाज की ज़रूरत है? क्या उसकी इच्छा के बिना उसका इलाज किया जा सकता है?

  • स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित मरीज़ कई बार वास्तविकता से कट जाता है. इलाज़ ज़रूरी है और वो ज़्यादा कारगर तभी हो सकता है जब मरीज़ ये मान ले कि उसे मदद की ज़रूरत है. उसके व्यवहार के बारे में उसके साथ सहजता से बातचीत कीजिए और मददगार रवैया अपनाइये. उसे ये बताइए कि परिवार उसके व्यवहार में आ रहे बदलावों को लेकर चिंता करता है (लेकिन इसके लिए मरीज़ को दोषी मत ठहराइए) और जो भी आप कर रहे हैं वो इस चिंता और सरोकार की वजह से ही कर रहे हैं. अगर आप मरीज़ के साथ इस तरह का संवाद कर पाने में ख़ुद को समर्थ नहीं पाते हैं या इस बारे में निश्चित नहीं है कि उसके साथ बात कैसे करनी है तो डॉक्टर से सलाह लीजिए.

    तीव्र स्किज़ोफ़्रेनिया की स्थिति में, मरीज़ भ्रांतियों में जा सकता है और बाज़ दफ़ा उग्र भी हो सकता है. व्यक्ति अटपटा महसूस कर सकता है और परिवार के सदस्यों की सलाह पर मदद लेने का भी अनिच्छुक हो सकता है. उसे महसूस होने लगता है कि उसके ख़िलाफ़ साज़िश की जा रही है.

    ऐसे मामलों में मरीज़ इलाज़ के लिए भी मना कर सकता है. ये ज़रूरी है कि ऐसा कोई परिजन या दोस्त जो मरीज़ के निकट हो और जिस पर मरीज़ को बहुत भरोसा हो वो उससे उसके बदलते व्यवहार के बारे में बात करे और उन्हें इलाज के लिए प्रेरित करे.

    कभी कभी स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित मरीज़ तार्किक ढंग से सोच नहीं पाते हैं और इलाज के लिए भी सहमति नहीं दे पाते हैं. अगर मरीज़ अपनी या अन्य लोगों की सुरक्षा के लिए ख़तरा बन जाता है या उसके भाग जाने का अंदेशा है तो उसे उसकी इच्छा के विपरीत अस्पताल में भर्ती कराया जा सकता है. मरीज़ को अनैच्छिक रूप से अस्पताल में (मनोरोग विभाग में भर्ती) तभी भर्ती कराया जा सकता है जब इस बात का डर हो कि वो दूसरों या ख़ुद को नुक़सान पहुँचा सकता है.

साइकोटिक एपीसोड का मामला: अपने प्रियजन से उसके मतिभ्रम या भ्रांतियों के बारे में, कैसे बात की जाए?

  • जब मरीज़ अपनी भ्रांतियों और अजीबोग़रीब ख़्यालों, आत्मभ्रम आदि को लेकर बातें करता है, तो देखरेख करने वाले कई लोग उसे ये बताने की कोशिश करने लगते हैं कि उसके अनुभव सच्चे नहीं हैं और वो सिर्फ़ उनकी कल्पनाएँ कर रहा है. ये ध्यान रखना चाहिए कि मरीज़ के लिए अनुभव वास्तविक और सच्चा है. उसके मतिभ्रम, आत्मभ्रम या भ्रांतियाँ उसके लिए बहुत वास्तविक होती हैं.

    मरीज़ जब आवाज़ों के बारे में कुछ बताना चाहता है तो उसे समझने की कोशिश कीजिए- क्या उसे सुनाई देने वाली आवाज़ें प्रिय हैं या अप्रिय? वे उससे क्या कहती हैं? अगर व्यक्ति को किसी बात पर शक होने लगता है तो इस बात की छानबीन कीजिए कि उसे ऐसा क्यों लग रहा है. मरीज़ को ये भी पूछ सकते हैं कि उसे अच्छा लगे, इसके लिए आप क्या कर सकते हैं.

    मरीज़ जब भ्रमों या भ्रांति पर यक़ीन करने लगता है तो इस बात को नकारने से समस्या बिगड़ सकती है. उससे उसके अनुभव के बारे में बात कीजिए और ये मानिए कि इससे उन्हें कष्ट होता है. मिसाल के लिए, आप ऐसे सवाल पूछ सकते हैं: “क्या तुम्हें डर महसूस होता है जब आवाज़ें तुम्हें कहती हैं कि.......?”

    उससे पूछिए कि क्या किसी दूसरी जगह पर वो ख़ुद को सुरक्षित महसूस करेगा. इस बात की भी जाँच कर लीजिए कि उसके साथ सैर पर जाने या किसी दूसरी गतिविधि में उसके साथ शामिल होने से उसे अच्छा लगेगा या नहीं. अगर वो सुस्ती महसूस करता है और ज़्यादा सक्रिय नहीं रहना चाहता है तो उसे शांत कमरे में ले जाएँ. अति-उत्तेजना या अति प्रोत्साहन से बचें, इससे मतिभ्रम की स्थिति बिगड़ सकती है.

    उससे पूछिए कि क्या कोई और भी चीज़ उसे उकसाती है- क्या आवाज़ें तभी आती हैं जब व्यक्ति अकेला है, खाली बैठा है, तनाव में है या चिंतित है या अजनबियों के बीच है? किन स्थितियों में आवाज़ें कम हो जाती हैं? जब व्यक्ति किसी काम में व्यस्त होता है तो क्या आवाज़ें ग़ायब हो जाती हैं?

    ये भी पूछिए कि क्या आवाज़ें व्यक्ति को कुछ ख़ास करने के लिए कहती हैं और क्या वो उन आवाज़ों का निर्देश मानने के लिए ख़ुद को बाध्य महसूस करने लगता है. अगर ऐसा है तो जहाँ तक संभव हो व्यक्ति को अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए.

    ये जानिए कि क्या व्यक्ति को आत्महत्या के ख़्याल आते हैं या वो मरना चाहता है-कभी कभी व्यक्ति को लग सकता है कि आवाज़ों से होने वाली तक़लीफ़ बर्दाश्त से बाहर हो जाती है तो मरना ही बेहतर है. ये एक ग़लत धारणा है कि आत्मघाती प्रवृत्तियों के बारे में पूछने से व्यक्ति को नये विचार मिलते हैं. ऐसे व्यवहार पर नज़र रखिए (उदाहरण के लिए घर पर रखे जाने वाले विषाक्त पदार्थों की जाँच). या इस बारे में अन्य लोगों से बातचीत पर भी नज़र रखिए.

    इस बारे में पूछिए कि आप मदद के लिए क्या कर सकते हैं.

    ऐसे लोग जो गंभीर अवस्था में हैं, डॉक्टर ‘एसओएस सेडेटिव’ के आपात स्थिति में सेवन का परामर्श दे सकता है. सेडेटिव्स का इस्तेमाल ज़रूरत पड़ने पर ही करें, मरीज़ की निगरानी करें और संदेह हो तो मदद माँगें.

अगर मुझे लगे कि लक्षण बदल गए हैं या बिगड़ गए हैं तो मुझे क्या करना चाहिए? क्या ये दवाएं बदलने का वक़्त है?

  • देखरेख करने वाले के तौर पर, लक्षणों में बदलाव के बारे में सूचित करने के लिए इलाज कर रहे डॉक्टर के संपर्क में रहें. स्किज़ोफ़्रेनिया के लक्षण धीरे धीरे उभरते हैं. लक्षणों में बदलाव या उनका बिगड़ना इस बात का संकेत हो सकता है कि मरीज़ ने दवाएँ ठीक से नहीं ली हैं. या छोड़ दी हैं. अगर ऐसा होता है तो मरीज़ का निरीक्षण कीजिए और ये सुनिश्चित कीजिए कि वे बताई गई सभी दवाएँ उचित तरीके से लेते रहें.

    कभी कभी, मरीज़ अपनी दवाओं और इलाज की ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं होता है. ऐसे में देखरेख करने वालों को लक्षणों के कम होने तक इस काम की ज़िम्मेदारी लेनी होती है.

    ध्यान रखिए कि कोई भी दवा या उपचार मरीज़ को रातोंरात बेहतर महसूस नहीं करा सकते हैं. कुछ दवाएँ कुछ दिनों का समय लेती हैं जबकि कुछ दो सप्ताह में अपना असर दिखा पाती हैं. डॉक्टर से पूछिए कि दवाएँ कब तक अपना असर दिखाना शुरू कर सकती हैं.

लक्षण अब नियंत्रण में हैं. क्या मरीज़ दवाएं लेना बंद कर सकता है?

  • ये एक मिथक है कि एक बार लक्षण नज़र आने बंद हो गए तो दवाएँ रोकी जा सकती हैं. डॉक्टर जब तक न कहें तब तक दवाओं का इस्तेमाल करते रहना चाहिए. दवाओं से लक्षण निय़ंत्रण में रहते हैं, अगर उन्हें रोक दिया जाता है तो मरीज़ में लक्षण फिर से उभरने का ख़तरा पैदा हो जाता है यानि उसे रिलैप्स हो सकता है. हर सिलसिलेवार रिलैप्स के साथ, मरीज़ की क्रियाशीलता कम होती जाती है और विकार पर काबू पाना भी मुश्किल होता जाता है.

    देखरेख करने वाले कई लोग मानते हैं कि दवाओं की लत लग जाती है या उनके कई गंभीर साइड अफ़ेक्ट हो जाते हैं. लेकिन स्किज़ोफ़्रेनिया के इलाज के लिए दी जाने वाली दवाओं के बारे में ये बात सच नहीं है. डॉक्टर लागत-लाभ के आकलन के बाद ही दवाएँ देता हैः क्या दवाएँ लेने का लाभ, साइड अफ़ेक्ट या उसके बुरे प्रभाव से होने वाली असुविधा से बेहतर है? अगर मरीज़ को दी जाने वाली दवाओं को लेकर आपकी कुछ चिंताएँ हैं तो डॉक्टर से इस बारे में बात कीजिए.

रिलैप्स के बारे में मुझे क्या करना चाहिए?

  • रिलैप्स होने की स्थिति में, शुरुआती अवस्था के लक्षणों में दोहराव होने लगता है. यानि वे दोबारा उभरने लगते हैं- चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, मूड में बदलाव, संदेह या भ्रम, सामाजिक अलगाव, अचानक गुस्सा भड़कना, बिना किसी वजह के हँसना या मुस्कुराना, अपने स्वास्थ्य और साज संवार के प्रति उदासीनता का आ जाना. रिलैप्स की पहचान करना बहुत महत्त्वपूर्ण है. और जितना जल्दी संभव हो इलाज उपलब्ध करा देना चाहिए.

पुनर्वास क्या होता है? क्या ये ज़रूरी है?

  • स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित मरीज़ के लिए कई बार पुनर्वास की ज़रूरत पड़ सकती है. बीमारी तो अपने आप में अदृश्य रहती है लेकिन ये मरीज़ के विचार और व्यवहार को प्रभावित करती रहती है. अगर बीमारी के असर को स्वीकार नहीं किया जाता, या ये चिंहित नहीं किया जाता कि व्यवहार में बदलाव बीमारी की वजह से भी हो सकता है तो ऐसे में परिवार और मित्र परिचित ये समझने की गलती कर सकते हैं कि मरीज़ मूडी है, आलसी है और ज़िद्दी है.

    दवाएँ मरीज़ के कुछ ख़ास सक्रिय और तक़लीफ़ भरे लक्षणों को कम करने में मदद करती हैं लेकिन मरीज़ फिर कई नकारात्मक लक्षणों से घिरा रहता है जैसे अलग थलग रहना और अपने डर और निषेधों की वजह से घुलनेमिलने में असमर्थ हो जाना. पुनर्वास मरीज़ों के लिए उन गुणों को फिर से हासिल कर लेने के लिए ज़रूरी है जिनकी मदद से वे अपनी ज़िंदगी स्वतंत्र रूप से बिता सकें और दूसरों से घुलमिल सकें.

    पुनर्वास के दौरान, मरीज़ अपने परिवार से इतर लोगों से भी मिलतेजुलते हैं जैसे स्टाफ और अन्य मरीज़, वे अपनी अभिरुचियों पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं और दिन भर की गतिविधियों के एक तय शेड्यूल का पालन करते हैं. उनकी इन गतिविधियों की निगरानी की जाती है.

    पुनर्वास का फ़ोकस मरीज़ और परिवार, दोनों पर रहता है. देखरेख करने वालों को बीमारी की प्रकृति के बारे में पूरी जानकारी दी जाती है, वे कैसे मरीज़ की सहायता कर सकते हैं, उनके साथ किस तरह संवाद कर सकते हैं और दूसरी व्यवहारजन्य समस्याओं के साथ कैसे निपट सकते हैं.

अगर मेरे परिचित किसी व्यक्ति को स्किज़ोफ़्रेनिया है, तो क्या वे विवाह कर सकते हैं? क्या विवाह से स्किज़ोफ़्रेनिया के उपचार में मदद मिल सकती है?

  • ये ग़लतफ़हमी है कि विवाह मनोरोगों का उपचार कर सकता है. और दुर्भाग्य से हमारे देश में ये एक बहुत पक्की धारणा बन गई है.

    इस बात की कोई वजह नहीं है कि स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति को शादी नहीं करनी चाहिए और सुखी जीवन नहीं बिताना चाहिए. ये इस बात पर निर्भर करता है कि लक्षण नियंत्रण में रहें और संभावित जीवनसाथी को बीमारी के बारे में पूरी जानकारी हो और वो ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हो.

    दूसरी तरफ़, अगर पीड़ित व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करता या करती है जो इस विकार को स्वीकार नहीं कर पाता, ऐसी स्थिति में समस्याएँ फिर सर उठा सकती हैं और स्थिति को और ख़राब कर सकती हैं. ये सिफ़ारिश भी की जाती है कि संभावित जीवनसाथी और परिवार के सदस्यों को बीमारी के बारे में जानकारी रहे और उन्हें उस इलाज के बारे में भी पता हो जो मरीज़ को दिया जा रहा हो.

    स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित मरीज़ विवाह के बंधन में बंध सकते हैं बशर्ते उनका या उनकी पार्टनर उन्हें इस बीमारी के साथ स्वीकार कर सके. विवाह से जुड़ी नई ज़िम्मेदारियों के प्रति भी मरीज़ को तैयार रहना चाहिए. मरीज़ को निम्न जानकारी रहनी चाहिए या इनके लिए तैयार रहना चाहिएः

    • शारीरिक और भावनात्क अंतरंगता
    • वित्तीय प्रबंधन, घर के कामकाज से जुड़ा प्रबंधन और दूसरी ज़िम्मेदारियाँ (अगर जीवनसाथी इन कामों को ख़ुद करने के लिए इच्छुक न हो)
    • संभावित जीवनसाथी/देखरेख करने वाले व्यक्ति को क्या ध्यान रखना चाहिए:
    • अपने पार्टनर से मरीज़ कितनी बात शेयर करना चाहता है?
    • क्या मरीज़ की संपत्ति या वित्तीय मामलों से जुड़े कोई कानूनी मसले हैं जिनका ध्यान रखा जाना है?
    • क्या दवाएँ मरीज़ की उर्वरता या प्रजनन क्षमता में अवरोध पैदा करती हैं या दवाओं की वजह से यौन निष्क्रियता आ जाती है? क्या इससे संबंधों पर असर पड़ सकता है?
    • इस विकार से पीड़ित होने की बच्चों में कितनी संभावना रहती है?
    • क्या पार्टनर, प्राइमेरी केयरगिवर की भूमिका निभाने में आरामदेह महसूस करता है? अगर नहीं, तो क्या इंतज़ाम किए जाने चाहिए?

    ये सलाह दी जाती है कि देखरेख करने वाले लोग और संभावित जीवनसाथी अपनी चिंताओं के निराकरण और सही तस्वीर की जानकारी के लिए मनोचिकित्सक से मुलाकात करें.

संभावित जीवनसाथी/देखरेख करने वाले व्यक्ति को क्या ध्यान रखना चाहिए:

    • अपने पार्टनर से मरीज़ कितनी बात शेयर करना चाहता है?
    • क्या मरीज़ की संपत्ति या वित्तीय मामलों से जुड़े कोई कानूनी मसले हैं जिनका ध्यान रखा जाना है?
    • क्या दवाएं मरीज़ की उर्वरता या प्रजनन क्षमता में अवरोध पैदा करती हैं या दवाओं की वजह से यौन निष्क्रियता आ जाती है? क्या इससे संबंधों पर असर पड़ सकता है?
    • इस विकार से पीड़ित होने की बच्चों में कितनी संभावना रहती है?
    • क्या पार्टनर, प्राइमेरी केयरगिवर की भूमिका निभाने में आरामदेह महसूस करता है? अगर नहीं, तो क्या इंतज़ाम किए जाने चाहिए?

    ये सलाह दी जाती है कि देखरेख करने वाले लोग और संभावित जीवनसाथी अपनी चिंताओं के निराकरण और सही तस्वीर की जानकारी के लिए मनोचिकित्सक से मुलाकात करें.

मैं ये बात कैसे सुनिश्चित कर सकता हूं कि स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति परिवार या दोस्तों से विमुख न हो? क्या हम उसके साथ सामान्य ढंग से व्यवहार कर सकते हैं?

  • स्किज़ोफ़्रेनिया से उबरने का संघर्ष कठिन हो सकता है, मरीज़ के लिए भी और देखरेख करने वाले के लिए भी. मरीज़ जब अजीबोग़रीब हरकत करता है, दवा लेने से इंकार कर देता है या अपने ही मित्रों और परिवार पर अपने ख़िलाफ़ साज़िश का शक करने लगता है तो ये निराश करने वाला हो सकता है.

    हमेशा ये ध्यान रखने की कोशिश करें कि बात सिर्फ़ मनोरोग की नहीं होती है. स्किज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति के लिए ये ठप्पा बहुत कष्टपूर्ण हो सकता है. और वो इसे अपनी शख्सियत या पहचान से जोड़ लेता है कि “मैं कौन हूँ?” देखरेख करने वाला व्यक्ति पीड़ित के आत्मसम्मान और उसकी गरिमा को फिर से लौटाने में मदद कर सकता है. उसे ये अहसास दिलाते रहकर कि उसकी अहमियत जैसी की तैसी है और वो मायने रखता है. आप ऐसा निम्न तरीक़ों से कर सकते हैं:

    परिवार के फ़ैसलों में उन्हें शामिल करें: मरीज़ ज़्यादा योगदान नहीं दे सकता है लेकिन फ़ैसलों में भागीदारी से उसका आत्मसम्मान बढ़ता है और वो जुड़ाव महसूस करता है.

    छोटेमोटे तरीकों से उन्हें समाज में घुलनेमिलने में मदद करना: भारत में देखा जाता है कि मरीज़ों को दोस्तों और अन्य लोगों से दूर ही रखा जाता है क्योंकि इसके साथ एक लांछन जैसी बात और शारीरिक नुकसान का भय जुड़ा रहता है. जब मरीज़ अलगथलग कर दिया जाता है तो वो अपनी भावनाओं को ज़ाहिर नहीं कर पाता है. और जब वो ज़ाहिर करता भी है तो गुस्से और चोट के साथ. देखरेख करने वाले इसे बीमारी का लक्षण मान सकते हैं. इसका मरीज़ पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. देखरेख करने वाले मरीज़ को घुलनेमिलने के लिए मना सकते हैं लेकिन इसका फ़ैसला मरीज़ पर ही छोड़ देना चाहिए.

    पारदर्शिता रखें: कष्ट न पहुँचे इस डर से, महत्त्वपूर्ण सूचनाओं को मरीज़ से न छिपाएँ. ख़ासकर परिवार के दूसरे सदस्यों से जुड़े समाचार. इस तरह की कोई सूचना अगर उसे दुर्घटनावश या किसी बाहरी व्यक्ति से पता चल जाए तो उसे ज़्यादा तक़लीफ़ होगी. अगर आपको पारिवारिक समस्याओं के बारे में मरीज़ के साथ कोई सूचना शेयर करने में असुविधा होती है या आप नहीं जानते कि कैसे उन्हें बताया जाए तो अपने डॉक्टर या सहायता समूह से परामर्श करें.

मुझे सहायता समूह की ज़रूरत क्यों है?

  • कुछ मनोरोग, ख़ासकर स्किज़ोफ़्रेनिया, जीवनपर्यंत प्रबंधन की माँग करते हैं. मनोचिकित्सक दवाएँ और परामर्श देकर आपकी मदद कर सकता है. लेकिन दोस्त और परिजन, मरीज़ के स्वतंत्र और सक्रिय जीवन बिताने योग्य हो पाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं. दशकों तक मरीज़ की देखभाल करने के विचार से देखरेख करने वाला व्यक्ति हैरान-परेशान हो सकता है. ऐसे मामलों में, एक सहायता समूह देखरेख करने वालों और मरीज़ की मदद कर सकता हैः

    • समान समस्या से जूझ रहे अन्य लोगों से मुलाकात कराने में. उनकी दास्तानें सुनकर मरीज़ और उसकी देखरेख करने वालों को राहत मिलती है कि वे अकेले नहीं हैं.
    • दूसरे लोगों के अनुभवों से सीखने में कि क्या करें और क्या नहीं.
    • उन्हें मनोरोग के बारे में बेहतर समझ मुहैया कराने और ये बताने में कि लक्षणों से निपटने के लिए खुद को कैसे तैयार किया जा सकता है.
    • देखरेख करने वालों को इस बारे में बताने में कि मरीज़ की स्वतंत्रता बढ़ाने के लिए क्या किया जा सकता है.
    • उन्हें उन मुद्दों के बारे में बोलने देना जो परिवार को बेवकूफ़ी भरे लगते हैं या ऐसे प्रश्न जिन्हें डॉक्टर से पूछने पर शर्मिन्दगी महसूस हो.

मैं स्किज़ोफ़्रेनिया के बारे में अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से कैसे बात कर सकता हूं? हमारे समाज में मनोरोग से जुड़ी इतनी ग़लत धारणाएं हैं....

  • विकार के बारे में दूसरों से बात करने में समर्थ होने के लिए सबसे पहला क़दम तो इस तथ्य को स्वीकार करने में है कि मरीज़ का बीमारी पर कोई नियंत्रण नहीं है लिहाज़ा वो इसके लिए ज़िम्मेदार भी नहीं है. ये स्वीकार कर लेने के बाद आप रिश्तेदारों और दोस्तों से इस बारे में बात कर सकने में समर्थ हो पाएँगें.

    अगर कोई टिप्पणी करता है या सवाल पूछता है तो एकदम से भड़क न उठें यानि ओवररिएक्ट न करें. ऐसे सवालों का सामना भी उसी सहजता से करें जैसे बुखार या किसी अन्य बीमारी से जुड़े सवालों का जवाब देने में करते हैं. ये बताएँ कि ये एक जैविक समस्या है और दिमाग में रासायनिक असंतुलन की वजह से व्यवहार में परिवर्तन आ जाते हैं, आप या मरीज़ इसे नियंत्रित नहीं कर सकते हैं और ये किसी को भी हो सकता है. इस संदेश के ज़रिए आप अपनी, मरीज़ की और अपने आसपास अन्य लोगों की मदद ही करते हैं.