कानूनी सवाल: मानसिक बीमारी और शादी से जुड़ा कानून

अगर मुझे कोई मानसिक रोग है और मुझे अस्थिर दिमाग का घोषित किया गया है तब क्या मैं वैध विवाह के लिये योग्य हूँ ?

  • भारत में हर धर्म के अपने अपने निजी कानून हैं जिनसे विवाह की संस्था को नियमित किया जाता है। कुछ धर्मों में किसी विवाह को तब वैध नहीं माना जाता है जब दो में से एक व्यक्ति को मानसिक रोग हो या अस्थिर दिमाग का हो। कुछ धर्मों में ऐसी शादी रद्द घोषित कर दी जाती है जिसमें एक व्यक्ति मानसिक रोगी या अस्थिर दिमाग का हो। इन मामलों में प्रभाव रूप में ऐसी परिस्थिति बन जाती है मानो वह विवाह हुआ ही न हो। कुछ दूसरे मामलों में ये तलाक का आधार भी बन जाता है। विभिन्न व्यक्तिगत कानून और विभिन्न धर्मों में मानसिक रोग और शादी के बारे में क्या प्रावधान हैं इसका ब्योरा निम्नलिखित है I

हिंदुओं के लिये

  • हिंदू मैरिज ऐक्ट के सेक्शन 5 में उन प्रावधानों का जिक्र है जिसके तहत उन परिस्थितियों का जिक्र है जिसमें किसी शादी की वैधता स्थापित होती है।

    • इस सेक्शन का द्वितीय अनुच्छेद मानसिक रोग के बारे में निम्न तरह से उपबंध करता है-
    • विवाह के समय , किसी भी पक्ष को नहीं
    • अस्थिर दिमाग के कारण शादी के लिये वैध सहमति देने की स्थिति में नहीं था
    • ऐसे और इस तरह से मानसिक रोग से पीड़ित हो कि वह शादी और उससे जुडी शारीरिक जिम्ममेदारी के लिये अक्षम हो, उसे पागलपन के नियमित दौरे आते हों।
    • इस अधिनियम के सेक्शन 12 के अनुसार, अगर इनमें से कोई एक शर्त भी पूरी हो तो शादी रद्द घोषित की जा सकती है औऱ अगर पीड़ित पक्ष अदालत पहुँचता है तो इसे रद्द किया जा सकता है।

मुसलमानों के लिये

  • मुस्लिम लॉ के तहत अपने अभिभावकों की निगरानी में अस्थिर दिमाग वाले और नाबालिग लोग भी शादी का अनुबंध कर सकते हैं। इस तरह की शादियाँ कानून की निगाह में वैध हैं।

पारसियों के लिये

  • पारसी कानून के तहत, किसी एक पक्ष के मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद शादी को अवैध नहीं करार दिया जा सकता है और ऐसी शादियाँ वैध होती हैं।

ईसाइयों के लिये

  • ईसाइयों के शादी-ब्याह के कानून में मानसिक बीमारी या मानसिक अस्थिरता का कोई जिक्र ही नहीं है। अगर एक पक्ष शादी के समय अस्थिर दिमाग का है तो शादी को रद्द नहीं किया जा सकता है।

स्पेशल मैरिज ऐक्ट के तहत धर्मनिरपेक्ष शादियों के लिये प्रावधान

  • इस कानून के तहत, अस्थिर दिमाग या पागलपन एक ऐसी स्थिति है जिसकी वजह से शादी को अवैध करार दिया जा सकता है। इसके अनुसार अगर विवाह के समय कोई भी एक पक्ष – मानसिक अस्थिरता के कारण वैध सहमति देने में अक्षम हो तो शादी रद्द हो जाएगी।

    -वैध सहमति देने में सक्षम हों लेकिन ऐसे मानसिक रोग के शिकार हों और इतनी गंभीर स्थिति हो कि वह शादी और उससे जुड़ी शारीरिक जिम्मेदारियों के लिये अनुकूल नहीं हों-जैसे कि उन्हें पागलपन के नियमित दौरे पड़ते हों।

मेरे जीवनसाथी को मानसिक बीमारी है और स्थिति इतनी गंभीर है कि मेरे लिये ये असंभव हो गया है कि इस संबंध को बनाए रखा जा सके। क्या ऐसी स्थिति तलाक का आधार बनती है ?

  • जैसा कि पहले बताया जा चुका है, कई मामलों में गंभीर मानसिक रोग या दिमागी अस्थिरता किसी शादी को अवैध घोषित करने के लिये एक आधार है। हांलाकि,विवाह से जुड़े निजी कानून हमारे देश में अलग-अलग हैं और ये भी संभव है कि विवाह के समय आपका जीवनसाथी मानसिक रोग का शिकार न हो। इन मामलों में आपके पास अलग-अलग धर्मों में और उसके अनुसार निम्न उपचार हैं 

हिंदुओं के लिये

  • हिंदू मैरिज ऐक्ट के सेक्शन 13 के तहत ,आप तलाक के लिये अर्ज़ी दे सकते हैं अगर आपका जीवनसाथी लगातार या अक्सर मानसिक रोग से ग्रस्त है, जिसकी वजह से आपका उसके साथ रहना कठिन हो गया है और आपसे ये अपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिये कि आप मानसिक रूप से बीमार जीवनसाथी के साथ रहेंगे ही।

मुसलमानों के लिये

  • अगर आप एक महिला हैं और आपके पति दो वर्ष की अवधि से मानसिक रूप से बीमार हैं तो आप मुस्लिम मैरिज ऐक्ट के तहत तलाक या शादी को भंग करने की अर्ज़ी दे सकती हैं।

पारसियों के लिये

  • अगर आपका जीवनसाथी शादी के समय अस्थिर दिमागवाला हो और तलाक के लिये आपके अदालत का दरवाजा खटखटाने तक वैसा ही बना रहता है तो, तब तलाक की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि आपको ये प्रमाणित करना होगा कि शादी के समय आप इस तथ्य से अनजान थे। साथ ही तलाक की अर्ज़ी विवाह के तीन वर्ष के भीतर ही दाखिल की जा सकती है।

    आप तब भी तलाक के लिये आवेदन कर सकते हैं अगर आपका जीवनसाथी दो वर्षों से अस्थिर दिमाग का हो, गंभीर रूप से मानसिक बीमारी का शिकार हो, तार्किक रूप से आपसे अपेक्षा नहीं की जा सकती कि आप इस हाल में उसके रह सकें।

ईसाइयों के लिये

  • भारतीय तलाक कानून के तहत, अगर निम्नलिखित शर्तें पूरी होती हैं तो आप तलाक के लिये आवेदन कर सकते हैं:-

    आपके जीवनसाथी के मानसिक रोग का उपचार नहीं हो सकता। आपके जीवनसाथी की इस स्थिति को प्रमाणित करने के लिये चिकित्सीय दस्तावेज होने चाहिये।

    तलाक की याचिका दाखिल करने के कम से कम दो साल पहले से जीवनसाथी की मानसिक स्थिति खराब होनी चाहिये।

विशेष विवाह कानून के तहत धर्मनिरपेक्ष शादियों के लिये

  • मानसिक बीमारी तलाक के लिये आधार बनती है अगर आपका जीवनसाथी एक बड़ी अवधि से मानसिक रोग से ग्रस्त हो जो कि इतनी गंभीर हो कि आपका उसके संग जीवन बिताना कठिन हो गया हो और आपसे ऐसी अपेक्षा भी नहीं की जाती है।