विचार धारा

परवरिश के अनेक रंग

मौल्लिका शर्मा
बतौर मातापिता क्या आपको याद है कि कभी आपने अच्छाई देखी भी थी?
मौल्लिका शर्मा

ज़्यादा समय नहीं हुआ जब मैंने किसी को कहते हुए सुना, “हमेशा अच्छाई को खोजो, बुराई को नहीं.”क्या सीधी सी बात है! लेकिन अमल करने में उतनी ही मुश्किल. ये विचार मेरे ज़ेहन में गूंजता रहा और कई ऐसी घटनाएं याद आती चली गईं जब इस मूल्य की हिफ़ाज़त नहीं की गई थी जिसके नतीजे विनाशकारी थे.

ये बताता बिल्कुल भी अनुपयुक्त नहीं होगा कि काउंसिलिंग के लिए आने वाले तीन चौथाई बच्चे और किशोर आत्मसम्मान में कमी जैसे मुद्दों से जूझते हैं, उससे होने वाली समस्याओं से भले ही उनकी प्रकट समस्या अलग हो. वे खुद से यही कहते रहते हैं: “मैं अच्छा नहीं हूं,” “मैं स्मार्ट नहीं हूं, मैं अच्छा नहीं दिखता हूं,”“मैंने टेस्ट में अच्छा नहीं किया तो कोई क्यों मेरा दोस्त बनेगा,”“कोई मुझसे बात नहीं करता,”“मुझे सवाल नहीं पूछना क्योंकि टीचर से डांट पड़ेगी”और फिर दूसरे मुझ पर हंसेंगे,“मुझे स्टेज पर जाने से डर लगता है, हर कोई मुझ पर हंसेगा”और इस तरह की बहुत सी बातें.

आत्मविश्वास अपने अस्तित्व और अपनी सामर्थ्य के एक कुल सबजेक्टिव भावनात्मक आकलन को प्रदर्शित करता है. ये खुद का एक आकलना है, और खुद के प्रति एक रवैया भी. इस तरह के बयान निचले आत्मसम्मान का प्रकटीकरण है और ये समझने की ज़रूरत है कि बच्चे ऐसे नहीं बने हैं. उनकी ज़िंदगियों में उपस्थित हम, माता पिता और वयस्को ने उन्हें ऐसा बना दिया है, अपनी कैज़ुअल, चोट देने वाली टिप्पणियों से और व्यर्थ के फ़ैसलों से. उन्हें प्रेरित करने की अपनी बढ़िया से बढ़िया कोशिश पर हम खुद ही पानी फेर देते हैं.

हमें ये बात याद रखनी चाहिए कि हम क्या कहते हैं और कैसे कहते हैं इस बारे में अत्यधिक सावधान रहें. हम हो सकता है लापरवाह होकर, बिना सोचे अपने बच्चे को गधा, मूर्ख, सुस्त या असक्षम कह दें. कभी कभी पराजित या लूज़र भी कह सकते हैं. लेकिन क्या वास्तव में हम चाहते हैं कि वो ये मानता हुआ बड़ा हो कि वो बेकार, मूर्ख, सुस्त और लूज़र है?

प्राइमेरी में पढ़ने वाले एक बच्चे के मातापिता कुछ समय पहले अपने बच्चे के लिए मदद मांगने मेरे पास आए थे. उन्हें इस बात की बड़ी चिंता सता रही थी कि टीचर ने हाल की पैरेंट टीचर मीटिंग में बच्चे को लेकर बहुत सी समस्याएं गिना दी थीं और उन्हें स्कूल काउंसलर से मिलने की सलाह भी दे डाली थी. मेरे साथ मुलाकात में उन्होंने कहा कि वे असहाय हैं और नहीं जानते हैं कि अपने बच्चे से कैसे निपटें. उनके शब्दों के चयन ने मेरे भीतर झुरझुरी पैदा कर दी क्योंकि मेरे शब्दकोष में सिर्फ़ “समस्या” से ही “निपटा”जाता है! और बच्चा कोई “समस्या” नहीं होता. अगर आप अपने बच्चे को समस्या की तरह देखते हैं तो वो नज़रिया हर उस चीज़ में दिखेगा जो आप करते हैं या कहते हैं. और आपका बच्चा भी जल्द ही ये मानने लगेगा कि वो वास्तव में एक “समस्या”ही है.

हैरानी की बात नहीं है कि, जब मैंने इस दंपत्ति से पूछा कि उन्हें अपने बच्चे में क्या सामर्थ्य नज़र आती हैं तो माता पिता में से कोई भी कुछ नहीं बता सका. जबकि उनके साथ अपने सेशन के दौरान मैंने कई अलग अलग तरीकों से ये बात पूछने की कोशिश की थी.

अब मेरे लिए “समस्या” यह है जिससे “निपटने” की ज़रूरत है, न कि बच्चा.

इस बात पर कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए कि कई बच्चे ये मानते हुए बड़े होते हैं कि उनमें कुछ भी ख़ास और अलग नहीं है, क्योंकि उनके माता पिता अपने व्यवहार और रवैया में अलग तो थे ही नहीं. किसी भी पैमाने पर वे असाधारण तो थे ही नहीं! बच्चे क माता पिता, शिक्षक, और अन्य वयस्कों की नज़रों में ‘विज़िबल’बनाए रखना बहुत महत्त्वपूर्ण है. लेकिन उन्हें उस समय नज़रों में रखना जब वे अच्छे बने रहते हैं या कोई अच्छा काम करते हैं, बजाय कि तब जब वे बुरे बने रहते हैं या बुरा काम करते हैं, तो इस चीज़ का बच्चे के मानसिक विकास पर महत्त्वपूर्ण असर पड़ सकता है. हर माता पिता और हर वयस्क को बच्चे की ज़िंदगी में ये एक शक्तिशाली औजार है जो मुफ़्त में उपलब्ध है. अपनी आंख और कान खुले रखकर वयस्क बच्चों में भरोसा पैदा कर सकते हैं- उनकी दयालु बातें सुनते हुए, उनका साफ काम देखते हुए, उनके अच्छा व्यवहार पर नज़र रखते हुए और उनकी कोशिशों को मान्यता देते हुए.

तो अगर आप ये नहीं करते रहे हैं तो आप कैसे शुरुआत करेंगे? सही दिशा में प्रयत्न में ये सुनिश्चित करना भी शामिल होना चाहिए कि आपने हर रोज़ ये नोट किया है और माना है कि आपके बच्चे में कम से कम कुछ तो अच्छा है ही. और अगर आपके लिए रोज़ाना ऐसा करना मुश्किल लगता है तो तो सप्ताह के हिसाब से शुरू कीजिए.

आप जब ये महसूस करेंगे तो हैरान रह जाएंगे कि आप अपने बच्चों की उनकी कोशिशों के लिए कितनी कम तारीफ करते है. वास्तव में कुछ बच्चों को तो अपने मातापिता से कभी भी प्रशंसा नहीं मिलती है. फिर भी ये उपेक्षा हमेशा अनदेखी ही रह जाती है. हम लोग गलत चीज़ों पर तो अतिरिक्त रूप से सतर्क रहते हैं लेकिन सही चीज़ों को नज़रअंदाज कर देते हैं. अच्छाई को बाहर निकालिए, ये ध्यान रखिए. और ऐसा हर रोज़ करते रहिए जब तक कि ये आदत न बन जाए. पर किसी का ध्यान नहीं जाता और फिर अच्छाई के इस सोनो को चमकाइये, सिर्फ़ गंदगी को झाड़ कर किनारे कर देने की और उससे पैदा होने वाली मुश्किलों से “निपटने” की कोशिश ही मत करते रहिए.