विचार धारा

देखभाल की परवाह

डॉ अनिल पाटिल
हमारे समाज के अदृश्य नायकः देखभाल करने वाले लोग
डॉ अनिल पाटिल

हम लोगों के बीच एक अदृश्य आबादी रहती हैः आपकी गलियों में, कार्यस्थल पर, कॉलेज या आपके परिवार में. ये लोग कई घंटों के लिए काम करते हैं, इन्हें कोई मानदेय यानी पारिश्रमिक नहीं मिलता, बाज़ दफ़ा उनका अपना स्वास्थ्य और जीवनयापन संकट में पड़ जाता है. ये अज्ञात और अनजाने नायक और नायिकाएं कौन हैं? वे देखरेख करने वाले लोग हैं.

देखरेख करने वाला व्यक्ति वो है जो किसी रिश्तेदार, दोस्त या सहयोगी की सेवा सुश्रुषा या देखरेख करता है, यानी उसकी नर्सिंग करता है जिसे शारीरिक या मानसिक बीमारी, विकलांगा, बुढ़ापे, नशे की लत या किसी और कारण से मदद की ज़रूरत है. आमतौर पर देखरेख करने वाले, इस काम की पेशकश नहीं करते हैं.

वे खुद को धीरे धीरे इस स्थिति में पाते हैं जहां उन्हें देखरेख की भूमिका निभानी पड़ती है और ये ज़िम्मेदारी उन पर अचानक भी आ सकती है. ये ऐसी भूमिका नहीं है जिसकी उन्हें ट्रेनिंग हासिल हो या जिसके लिए उन्हें पैसा मिलता हो, लेकिन उनके लिए अपनी ज़िंदगी का ये सबसे बड़ा काम भी बन जाता है. वे दूसरे व्यक्ति की देखरेख करते हैं, ऐसे व्यक्ति जो कई मामलों में उन पर निर्भर रहकर अपनी शारीरिक, चिकित्सीय, भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक ज़रूरतें पूरी करते हैं. इस तरह की निस्वार्थ और संपूर्ण मदद, एनजीओ सेक्टर या सरकार की ओर से नहीं मिल पाती है.

और देखरेख करने वालों के लिए भी कोई विशेष मदद उपलब्ध नहीं है. दुख की बात है कि मेडिकल और सोशल सेक्टर के कई पेशेवर लोग, देखरेख करने वालों के अत्यधिक योगदान और इस बहाने उन पर पड़ने वाले अत्यधिक बोझ को समझने या आंकने में नाकाम रह जाते हैं.

केयरगिविंग यानी देखरेख करने का काम एक पुरस्कार योग्य अनुभव है और कई लोग अपने इस काम के प्रति गर्व महसूस करते हैं. लेकिन ये भी सच है कि देखरेख करने वालों पर इस काम का काफ़ी असर पड़ता है. उन्हें बाज़दफ़ा अपनी पूरी ज़िंदगी इस काम में बदल देनी पड़ती है. अपने ख़ुद के लिए उनके पास समय नहीं रह जाता है, ये नौबत भी आ जाती है.

फलस्वरूप, देखरेख करने वाले कई लोगों में ख़राब सेहत, सामाजिक अलगाव, तनाव और चिंता के निशान पैदा हो जाते हैं. इस काम में कई लोग जीवन में अपने अवसरों और जीवनयापन के मौकों को गंवा देते हैं, अपनी पढ़ाई छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें देखरेख में जुटना पड़ता है.

वे जो शिक्षा में रह पाते हैं, या नौकरी कर पाते हैं उन्हें अपने काम और पढ़ाई और देखरेख की ज़िम्मेदारी के बीच कड़ा संतुलन साधना पड़ता है और इसका ख़ामियाज़ा भी उन्हें अपने कार्यक्षेत्र में भुगतना पड़ता है. उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

ये प्रभाव भारत में ज़्यादा से ज़्यादा देखे जा रहे हैं, क्योंकि फैले हुए पारंपरिक संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवारों ने ले ली है.

इस बात का अभी कोई आंकड़ा नहीं है कि भारत, उसके पड़ोसी देशों, एशिया और अफ़्रीका के देशों में पारिवारिक देखरेख करने वाले, गैर मानदेय वाले व्यक्तियों की संख्या कितनी है. ब्रिटेन के आकलनों के मुताबिक वहां हर आठ वयस्क पर एक व्यक्ति देखरेख करने वाला है (करीब साठ लाख लोग). इस संख्या को एक इशारा मानते हुए हम कह सकते हैं कि भारत में देखरेख करने वाले 15 करोड़ लोग होंगे. ये उन 15 करोड़ वयस्कों और बच्चों का समूह है जो अज्ञात हैं और जिन्हें इस काम का कुछ हासिल नहीं मिलता है. और जिनकी सेहत, भलाई और भविष्य दूसरे व्यक्ति के जीवन को संवारने यानी उसकी देखरेख के काम में खर्च भी होती है और प्रभावित भी होती है.

कर्नाटक के होस्पेट में कार्यरत एक मनोचिकित्सक, डॉ अजय कुमार के शब्दों में, “केयरगिवर यानी देखरेख करने वाले लोग एक अदृश्य समुदाय हैं, बाज़दफ़ा ख़ुद के लिए भी वे अदृश्य हैं. इस अदृश्यता को समझना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यही पहली चीज़ है जिसे बदलना होगा.”

इसलिए उन लोगों के बारे में सोचे जिन्हें आप जानते हैं: आपके रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त और सहपाठी. क्या उनमें से कोई देखरेख करने वाला व्यक्ति है? संभावना ये है कि आप ऐसे किसी एक व्यक्ति को ज़रूर जानते होंगे- वे ख़ुद को केयरगिवर या देखरेख करने वाला न कहते होंगे और आपको उनकी ज़िम्मेदारियों का अहसास नहीं होगा, लेकिन वे हमारे चारों ओर हैं, समाज में हर स्तर पर मौजूद हैं.

उन्हें अदृश्य या अज्ञात रहने की ज़रूरत नहीं है. मिसाल के लिए शिज़ोफ़्रेनिया से पीड़ित अपने पति गुणेशवर्णा की देखरेख कर रहीं उनकी पत्नी आशादेवी कहती हैं, “सिर्फ़ ‘एक अदद नमस्ते. कैसी हैं आप?’ मुझे अच्छा लगेगा.” ऐसे दयालु शब्द, जो देखरेख करने वाले और पीड़ित व्यक्ति दोनों के लिए हमदर्दी दिखाते हैं और उन्हें समझते हैं, उन्हें मान्यता और मदद देने की दिशा में पहला क़दम हैं. ये साधारण सा क़दम देखरेख करने वाले के लिए बहुत उत्साहवर्धक साबित होगा. अगर हम सब ये पहला क़दम उठाने का समय निकालें तो कौन जानका है ये सफ़र कहां पर ख़त्म हो?

इस श्रृंखला के अगले लेख देखरेख के विभिन्न प्रभावों, देखरेख करने वालों के विशिष्ट समूहों, नीति में बदलाव की कोशिशों और हमारे समाज में जनसांख्यिकीय बदलावों के बीच देखरेख की आसन्न कमी पर केंद्रित होंगे.  

डॉ अनिल पाटिल केरर्स वर्ल्डवाइड नाम की संस्था के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक हैं. ये संस्था परिवार में ही देखरेख करने वाले उन लोगों की मुश्किलों से निपटती और उन्हें सामने लाती है जो अनपेड हैं यानी जिन्हें देखरेख का कोई मानदेय नहीं मिलता है. 2012 में स्थापित और यूके(ब्रिटेन) में रजिस्टर्ड ये संस्था, विकासशील देशों में देखरेख करने वालों के साथ ही एक्स्क्लूसिव तौर पर काम डरती है. डॉ पाटिल इस स्तंभ को लिख रहे हैं रूथ पाटिल के साथ जो केरर्स वर्ल्डवाइड में वॉलंटियर हैं.

ज़्यादा जानकारी के लिए आप संस्था की वेबसाइट Carers Worldwide को देख सकते हैं. आप लेखकों को ईमेल भी भेज सकते हैं इस पते परः columns@whiteswanfoundation.org

इस लेखन में ज़ाहिर की गई राय लेखक की है और आवश्यक रूप से व्हाइट स्वान फ़ाउंडेशन के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है.