विचार धारा

देखभाल की परवाह

डॉ अनिल पाटिल
देखभाल करते बच्चेः अदृश्य और समर्थनहीन
डॉ अनिल पाटिल

भारत में बहुत से बच्चे देखभाल का काम भी करते हैं और हममें से बहुत लोग ये तक महसूस नहीं करते हैं बंद दरवाजों के पीछे वे क्या भूमिका निभा रहे हैं. अक्सर बच्चे खुद को इस स्थिति में तब पाते हैं जब उनके माता पिता बीमार पड़ जाते हैं और उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता है. ये बच्चे अपने कंधों पर अविश्वसनीय दबाव झेलते हुए रातोंरात सयाने बन जाते हैं. लेकिन उन्हें भी सहायता की ज़रूरत होती है, क्योंकि देखभाल का काम न सिर्फ भावनात्मक रूप से थका देने वाला होता है बल्कि इसका बच्चे पर शारीरिकि, सामाजिक और शैक्षिक रूप से एक निर्णायक असर पड़ता है.

बाल देखभालकर्ता का कठिन जीवन

प्रिया* के उस समय सहायता की ज़रूरत थी जब उसके पिता को एक दुखद हादसे में लकवा हो गया. उसकी मां एक रात चली गई और पिता की देखभाल करने के लिए प्रिया ही अकेली रह गई. वो अपने पिता की निजी केयरगिवर बन गई और इसके लिए उसे अपनी पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी. वो तनावग्रस्त और गुस्सैल हो गई और ऐसा महसूस करने लगी कि वो भी भाग जाए. ख़ुशकिस्मती से, एक स्थानीय एनजीओ ने इस स्थिति के बारे में सुना. प्रिया को और उसके पिता को मदद मुहैया कराई गई. घर के पिछवाड़े एक टॉयलेट बनाने के लिए भी पैसे की व्यवस्था की गई और महिला स्टाफ प्रिया को भावनात्मक सहायता और सुझाव देने के लिए नियमित रूप से मिलने आता रहा. जीवन यूं तो आसान नहीं है लेकिन प्रिया को अब एक बेहतर भविष्य की उम्मीद होने लगी है.

प्रिया जैसे बच्चों पर पड़ा दबाव अविश्वसनीय है. उन्हें घरेलू काम करने होते हैं जैसे सफाई, खाना पकाना, नर्सिंग की ड्यूटी निभाना जैसे चलने फिरने में मदद करना, कपड़े बदलना, पहनाना और टॉयलेट ले जाने, नहलाने धुलाने जैसी देखभा भी करना. इन सबके अलावा उन्हें अस्वस्थ व्यक्ति को भावनात्मक सहयोग भी देना होता है, घर चलाने के लिए वित्तीय बोझ भी उठाना होता है और अपने से छोटे भाई बहनों का ख़्याल भी रखना पड़ता है.

बाल देखभालकर्ताओं का ध्यान रखने की ज़रूरत

ब्रिटेन में चिल्ड्रन्स सोसायची के कराए एक आकलन में पता चला है कि देखरेख करने वाले युवाओं में, यानी 17 साल या उससे छोटी उम्र के बच्चों में अपने साथ के अन्य बच्चों के मुकाबले एक दीर्घकालीन अक्षमता या बीमारी आ जाती है, उन्हें विशेष शैक्षिक जरूरत पड़ने लगती है. ऐसे बच्चे अपने बचपन को गंवा रहे होते हैं, अन्य लोगों से किसी तरह के सामाजिक इंटरेक्शन का उन्हें अनुभव नहीं मिल पाता है, वे अलगथलग रह जाते हैं, अकेलेपन और अवसाद में घिर जाते हैं. वे संचार कौशल में पीछे रह जाते हैं और इससे वयस्क जीवन की उनकी राह कठिन हो जाती है.स्कूल में भी वे पिछड़ जाते हैं, और बहुत हताश कर देने वाले मामलों में तो उन्हें स्कूल छोड़ना भी पड़ जाता है. देखभाल के काम से बच्चा टूट जाता है और बीमार पड़ जाता है, खासकर ऐसी स्थितियों में जैसी प्रिया की रही है, जिसमें जीने के हालात चुनौतीपूर्ण होते हैं. इसीलिए हमें देखरेख करने वाले बच्चों की मदद करनी चाहिए. इसकी शुरुआत समुदाय में उनकी शिनाख्त से होगी, क्योंकि ऐसे बच्चे अदृश्य होते हैं और अकेले ही हालात से जूझने की कोशिश करते रहते हैं. एक बार स्थिति की पहचान हो जाए, तो कई तरीके हैं जिनसे हम बच्चों की मदद कर सकते हैं. हम लोग परिवार के साथ काम करते हुए इस बात का पता लगा सकते हैं कि क्या परिवार में या समुदाय में देखरेख के काम के लिए कोई वैकल्पिक व्यक्ति है या नहीं जो बच्चों के कंधों पर पड़े भार को कुछ हल्का कर सके. स्कूल में अध्यापकों को भी ऐसे बच्चों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होना होगा और उन्हें वापस स्कूल या कॉलेज में शामिल करना होगा. ये भी जरूरी है कि बच्चे की एक सोशल लाइफ हो और इसका एक तरीका ये भी हो सकता है कि देखरेख करने वाले बच्चों को एकदूसरे से मिलने बैठने का मौका मिल पाए. इस तरह वे एक दूसरे से मिल पाएंगें और हंसीखुशी में समय बिता पाएंगे, और ये भी समझना शुरू करेंगें कि वे अकेले नहीं है और समान हालात में अन्य बच्चों से एक रिश्ता बना पाएंगें. हम इन बच्चों की मदद कर सकते हैं कि वे अपना जीवन जी पाएं और वे सुरंग के आखिर में कुछ रोशनी देख पाएं. जैसा कि प्रिया अब कहती है, “ज़िंदगी अब भी बहुत मुश्किल है, लेकिन मैं अब स्कूल लौट गई हूं और अपने लिए एक चमकदार भविष्य देख सकती हूं.”

 * निजता का सम्मान करते हुए नाम बदला गया है.