विचार धारा

परवरिश के अनेक रंग

मौल्लिका शर्मा
क्या आपके बच्चे की किशोरावस्था आपके लिए चुनौतीपूर्ण बन रही है?
मौल्लिका शर्मा

मेरी बेटी 17 साल की है और वो मुझे ये याद दिलाना नहीं भूलती कि छह महीने से भी कम वक़्त में वो 18 की हो जाएगी. क्या! ये सच है?! क्या उसकी किशोर उम्र के उस उत्पाती दौर से मैं लगभग उबर आई हूं? मैं अब उसके वयस्क बनने की राह के आखिरी पड़ाव में हूं. मैं समझती हूं कि किशोरावस्था पर नज़र दौड़ाने का ये एक अच्छा समय है और इस बात को समझने का भी कि क्यों कुछ अभिभावक इसे बहुत चुनौतीपूर्ण मानते हैं, इतना कि इससे लगभग ख़ौफ़ खा जाते हैं!

किशोरावस्था कोई बुरा दौर नहीं होता है जिसका आपको मजाक उड़ाना या उसे सहन करता रहना पड़े. ये वो दौर होता है जो आखिरकार बच्चे और मातापिता को बढ़ने में मदद करता है, और अगर इस अवस्था को ठीक से संभाला जाए तो वयस्क के रूप में एक ज़्यादा मजबूत संबंध के रूप में विकसित होता है. लेकिन किशोरावस्था के दूसरे पहलू की ओर सफलतापूर्वक जाना चाहें, तो हमें इस दौर को न सिर्फ़ दैहिक (शारीरिक) और संज्ञानात्मक विकास के रूप में समझना होगा बल्कि पहचान के निर्माण और मातापिता, सहकर्मियों और पार्टनरों के साथ संबंध को पुनर्परिभाषित करने के रूप में भी देखना होगा. शारीरिक बदलाव तो स्पष्ट हैं. और मैं इस बारे मैं बात नहीं करूंगी. संज्ञानात्मक विकास थोड़ा कम समझा गया है. किशोरावस्था व्यक्ति के जीवन में द्रुत मस्तिष्क विकास की दूसरी लहर को चिंहित करता है- और ज़्यादा जटिल विचार प्रक्रियाओं की शुरुआत. भले ही उनका प्रमस्तिष्कखंड (अमिग्डल- दिमाग का वो हिस्सा जो डर, गुस्से और आनंद दैसी भावनाओं को प्रोसेस करता है) किसी वयस्क की तरह विकसित नहीं होता है और भावनाओं को पहचानने और पढ़ने की उनमें पर्याप्त योग्यता नहीं आ पाती है, इसके बावजूद उनके दिमाग के अन्य हिस्सों में ज़बर्दस्त वृद्धि गतिविधियां हो रही होती है.

किशोर उम्र में कदम रखने वाले बच्चे, स्कूल या घर पर व्यक्तिगत निर्णय पर ध्यान देते हैं- वे सत्ता और सामाजिक पैमानो पर सवाल करना शुरू कर देते हैं, वे अपने जीवन से जुड़े अपने नज़रिए या विचारों को बनाना और उन्हें क्रियान्वित करना शुरू करते हैं (मैं कौनसा खेल चुनूंगा, मैं दोस्तों के किस ग्रुप में जाऊंगा, अभिभावकों द्वारा तय कौन सा नियम मैं चाहूंगा कि बदला जाए.)

बीच की अवस्था वाले किशोर अपना फ़ोकस बढ़ा लेते हैं जिसमें ज़्यादा दार्शनिक और भविष्योन्मुखी सरोकार आ जाते हैं- वे ज़्यादा सवाल करते हैं ज़्यादा आकलन करते हैं, वे भविष्य के संभावित लक्ष्यों के बारे में सोचते हैं और लंबी अवधि की योजनाएं बनाना शुरू करते हैं.

किशोरावस्था के आखिरी पड़ाव वाले बच्चे अपनी जटिल विचार प्रक्रिया के ज़रिए फ़ोकस करते हैं कम आत्मकेंद्रित रवैये और ज्यादा वैश्विक नज़रिए पर. इस तरह की अवधारणाओं पर उनका फोकस आ जाता है जैसे न्याय और राजनीति, वे आदर्शवादी विचार विकसित करते हैं, वे बहुत ज़्यादा बहस और बातचीत करते हैं और विरोधी विचारों के प्रति असहिष्णुता दिखाते हैं, वे करियर के फ़ैसलों पर फोकस करते हैं और वयस्क समाज में अपनी उभरती भूमिका के बारे में सोचते रहते हैं. वे आत्मनिरीक्षण करते हैं और खुद के बारे में सचेत रहते हैं जो स्वार्थ के रूप में या खुद में ही डूबे रहने के रूप में भी सामने आ सकता है. वे समस्याओं को बहुत सारे आयामों से भी देखने लगते हैं. वे तथ्यों को परम सत्य के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं लिहाज़ा पैतृक गुणों और सत्ता पर सवाल भी करते हैं. और यही वो समय होता है जब हम अभिभावक अपने लिए चुनौती महसूस करने लगते हैं.

ज्म के रूप में भी दिखती हैं या

पहचान की तलाश में किशोर इस सवाल पर सोचते हैं कि “मैं कौन हूं?”ये इस चरण का एक बड़ा हिस्सा है- एक अनुकूल या सुसंगत पहचान हासिल करना और इसे लेकर किसी दुविधा से बचना उनका प्रमुख लक्ष्य होता है. अभिभावक ये सोचना चाहेंगे कि वे इस प्रक्रिया में अख़्तियार रखने वाले इकलौते लोग हैं. लेकिन पहचान की किशोरों की ये तलाश उनके सहकर्मियों, स्कूल, पड़ोस, समुदाय और मीडिया से भी प्रभावित होती है. इस प्रक्रिया को कामयाबी से पूरा करने के लिए किशोरों को दो चरणों से गुजरना होगा. पहले में शामिल होता है सवाल पूछना और बचपन के उन विश्वासों से दूर होना जो उनसे अभ मेल नहीं खाते हैं और इसके नते में ऐसे विश्वासों के साथ आना जो उनकी विचार प्रक्रिया से मेल खाते हैं. और दूसरे में शामिल होता है उस पहचान से प्रतिबद्धता दिखाना जो वे खुद के लिए चुनते हैं.

ये एक सघन आकलन और खुद को देखने के विभिन्न तरीकों को खंगालने का समय होता है. इसमें कई नाटकीय बदलाव और अनिश्चितताएं शामिल होती हैं, जिसमें अपने अतीत के अनुभवों, मौजूदा चुनौतियों और सामाजिक मांगों और अपेक्षाओं को एक साथ एक स्पस्ट और सुसंगत इकाई में संकलित या एकीकृत करना होता है. किशोर जो पहचान अपने लिए चुनते हैं उसे अन्य लोगों से मान्यता भी मिलनी चाहिए, उसकी पुष्टि होनी चाहिए और वो स्वीकार्य होनी चाहिए जिससे किशोर खुद को सहज, आश्वस्त और समर्थ महसूस करे. इसीलिए ये एक ऐसा चरण है जिसमें वो गहराई से रोल मॉडलों की तलाश करते हैं, सहकर्मियों और दोस्तों के समूहों की ओर आकृष्ट होते हैं और पारपंरिक सत्ता के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं.

व्यक्ति की पहचान का विकास जल्द ही शुरू हो जाता है, बच्चों में ये शुरुआती जागरूकता आ जाती है कि वे अलग और खास व्यक्ति हैं, अपने मातापिता से अलग. जैसे जैसे वे किशोर उम्र में आते हैं, वे ऐसे मोड़ पर पहुंच जाते हैं जहां वे अपने मातापिता से कतई अलग दिखना चाहते हैं. वे अपने मातापिता के साथ दिखना भी नहीं चाहते हैं और जो कुछ मातापिता उनको कहते हैं वो उनके लिए लज्जापूर्ण बन जाता है. अलगाव की ये प्रक्रिया (और संभावित अस्वीकार) अभिभावक के रूप में हमें चोट पहुंचाता है लेकिन हमें खुद को लगातार ये याद दिलाए रखने की जरूरत है कि ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है- हर किशोर और हर मांबाप के बीच, सिर्फ़ हमारे किशोर बच्चे और हमारे बीच नहीं.

अगर हम उन्हें पूर्ण क्रियाशील वयस्कों के रूप में देखना चाहते हैं जो अपनी सामर्थ्य को हासिल करने के लिए उद्यत होते हैं, तो अभिभावक के रूप में ये अत्यन्त ज़रूरी है कि हम उनकी वैयक्तिकता की इस प्रक्रिया उनका सहयोग करें. पहचान का संकट किशोरों के सामने आने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण टकरावों में से एक है जिसका वे अपने विकास के दौरान सामना करते हैं. ये उनमें आत्मसंदेह, एक स्पेस की मांग, बहादुरी और शौर्य का कभीकभार एक नकली बोध, और अक्सर अपराजेयता का बोध भी और इन सब के साथ बिखरी हुई रुखाई, अहंकार और हकदारी का बोध.

जितना हम इस बारे में जागरूक रहेंगे कि ये एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, उतना ही कम हमें इससे डरने और इसका विरोध करते रहने, हमारे लिए ये भी आसान होगा कि हम अपना विवेक और अक्लमंदी बनाए रखें और उनके सफ़र में और सहयोगी रवैया रखें. तो हमें ये स्वीकार करना चाहिए कि चाहे हम कुछ भी करें, तो हम शर्मिंदगी का बायस तो बनेंगे हीं, कि दोस्त हमसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होंगे, कि हमें 24 घंटे दिन रात उपलब्ध तो रहना होगा लेकिन अदृश्य भी रहना होगा, कि उनमे विपरीत सेक्स के लिए एक आकर्षण होगा, कि वे हमेशा जानना चाहेंगे कि इसमें उनके लिए क्या है, और हम जो कोई भी विचार पेश करेंगे उसे वे खारिज कर देंगे. अगर हमें इस ‘नव-सामान्य’- ‘सामान्य’तनाव के दौर के रूप में देखें- इसे स्वीकार करें और प्रवाह के साथ चलें, बजाय इसके कि इसे अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानें, तो हम उनके लिए और अपने खुद के लिए एक बड़ा काम कर रहे हो सकते हैं. जहां तक मेरी बात है मैं कह सकती हूं कि मेरा काम लगभग पूरा हो गया है!