विचार धारा

परवरिश के अनेक रंग

मौल्लिका शर्मा
क्या अपने बच्चे के व्यवहार से आप परेशान हैं?
मौल्लिका शर्मा

कई मौकों पर अभिभावक अपने बच्चे की काउंसिलिंग के लिए समय तय कर देते हैं. क्योंकि उनका बच्चा कुछ ज़्यादा ही अटपटा और गलत बरताव कर रहा है- उसका मूड खराब हो जाता है, वो भड़क जाता है, उसे मोबाइल फ़ोन (या टेक्नोलजी) की लत लग जाती है, पढ़ाई नहीं करता है, ध्यान भटका रहता है, अच्छे नंबर नहीं लाता है, अपने दोस्तों से घुलता मिलता नहीं, बात नहीं “सुनता” है आदि. मांबाप चाहते हैं कि बच्चे की काउंसिलिंग हो जाए तो उसका व्यवहार ‘ठीक’ किया जा सकता है. मेरा नज़रिया ये है कि व्यवहार को दुरुस्त नहीं किया जा सकते जब तक हम इसमें निहित भावनाओं और विचारों को न समझें जो इसमें निहित होते हैं. भावनाओं, विचारों और व्यवहार के बीच जुड़ावों पर अच्छाखासा शोध किया गया है और ये उस लोकप्रिय विधा की नींव बनाती है जिसे संज्ञानात्मक व्यवहारजन्य थेरेपी (cognitive behavioral therapy- सीबीटी) कहते हैं और ये मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मामलों पर एक थेरेपी की सुस्थापित विधि है. मैं सीबीटी पर विस्तार में नहीं जा रही हूं, लेकिन मैं  उस जुड़ाव को दिखाना चाहती हूं क्योंकि इससे हममें वो समझ बनती है जिसकी बदौलत हम अपने बच्चों के मामलों और अपने मामले भी बिल्कुल अलग ढंग से देख सकते हैं. एक उदाहरण लें एक बच्चे का, जो नये स्कूल में दाखिला ले रहा है और ऐसी स्थिति का सामना कर रहा होता है जहां उसे बिल्कुल ही नए चेहरों नए सहपाठियों के साथ घुलनामिलना और उठना बैठना है. अगर ये बच्चा

  • सोचता है कि वो अच्छा नहीं है और अन्य बच्चे उससे बेहतर हैं, तो वो अपने से सवाल करता है कि क्या वो उस ग्रुप के लिए सही भी है या नहीं, तब वो
  • अनिश्चित महसूस करता है, ख़ुद पर उसे भरोसा नहीं हो पाता है, असुरक्षित और संकोची हो जाता है जिसकी वजह से
  • कमज़ोरी और सुस्ती का व्यवहार करने लगता है, अनिश्चित, और कांपती हुई आवाज़ में अपने


सहपाठियों के ग्रुपों तक संकोच से भरा हुआ जाता है और उनसे अपने ग्रुप में उसे भी शामिल कर लेने की विनती करता है. ऐसी स्थिति में उस ग्रुप से उसे जो प्रतिक्रिया आमतौर पर मिलती है वो उसे खारिज करने वाली ही होती है.
वयस्क के तौर पर हम बच्चे में कमजोरी और दब्बूपन देखते हैं और उसका अलगथलग पड़ जाना भी देखते हैं तो तो हम उसे कहते हैं वो खुद में विश्वास लाए, और अपन दोस्त बनाए. हम उसके व्यवहार की तह में छिपी असुरक्षा की भावना और विश्वास की कमी पर ध्यान नहीं देते हैं जो उसके आत्मसम्मान में गिरावट और खुद को कमतर समझ लेने की भावना से आ जाते हैं. काउंसिलिंग के दौरान जो दिखता है वो दरअसल व्यवहार ही होता है जिसका मांबाप चाहते हैं कोई ‘इलाज’ हो जाए.

“उसे बता दीजिए कि ज़्यादा दोस्त कैसे बनाते हैं” एक अभिभावक ऐसा कह सकता है. या, “उसे बताइये कि आश्वस्त और निश्चयी कैसे बनना है.” होना ये चाहिए कि बेकार, निष्क्रिय और अक्सर अतार्किक विश्वासों पर काम किया जाए जिनसे वैसी ही भावनाएं और व्यवहार पैदा होते हैं. एक समान परिदृश्य को लेते हैं लेकिन इस मामले में बच्चा

  • सोचता है कि वो बहुत अच्छा है और दूसरों जैसा ही सही है, खुद पर शक करने के बजाय वो खुस से ये सवाल करता है कि दूसरे उसके दोस्त बनने लायक हैं कि नहीं, तब वो
  • विश्वस्त और सुरक्षित महसूस करता है जो उसमें
  • विश्वास का व्यवहार लाता है, तब वो आगे बढ़कर अपने सहपाठियों के समूह में जाता है और स्पस्ट और निर्भीक आवाज में अपना परिचय देता है और समूह में शामिल होने के बारे में पूछता है. ऐसी स्थिति में समूह से जो उसे प्रतिक्रिया मिलती है वो मित्रता की और स्वीकार्यता की होती है.


स्थिति दोनों मामलों में समान है. अंतर उस विश्वास का है जो बच्चे में अपने प्रति और अपने आसपास के प्रति है, जो आगे चलकर विश्वास की या अनिश्चितता की भावनाएं पैदा करता है और बिल्कुल अलग अलग व्यवहार नज़र आते हैं. इसलिए जब कभी हम ऐसी स्थिति से टकराएं जहां हमारा बच्चा ऐसा व्यवहार कर रहा है जो हमें
स्वीकार्य नहीं, तो और गहराई में जाएं न कि सिर्फ सतह को खरोंचे. कोशिश करें और ये जानें कि बच्चा क्या महसूस कर रहा है और उसके विचारों और यकीनों को समझें जिनकी वजह से वे भावनाएं उसमें आ रही हैं. लेकिन गहराई में उतरने की इस प्रक्रिया के दौरान, हमें ये सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि हम इस मामले में जजमेंटल या निर्णय थोपने वाले न बनें और रक्षात्मक न बनकर रह जाएं.

खोज की प्रक्रिया के दौरान कभी हम ये महसूस कर सकते हैं कि बच्चे में ऐसे विश्वास पनप गए हैं जो आप अभिभावक के रूप में नहीं चाहते थे कि वो उन्हें ग्रहण करे. आप अपने बच्चे को आत्मविश्वासी हाई एचीवर के रूप में देखना चाहते थे. लेकिन उसमें आत्मविश्वास की इतनी कमी कैसे आ गई? और फिर इसके चलते आपको कुछ कठिन सवालों के जवाब देने पड़ जाते हैं कि आपने क्या गलत किया था या क्या गलत कहा था. और ये हमेशा आपके लिए कोई खुशगवार बात तो होती नहीं है.

महत्त्वपूर्ण बात ये भी है कि आप गैर-जजमेंटल रहें और अपने बच्चे पर ही नहीं खुद को भी स्वीकार करने वाले बनें. आपको अपनी इस योग्यता पर भरोसा रखना होगा कि आप अच्छे अभिभावक हैं. आपको खुद पर भरोसा रखना होगा, तभी आपका बच्चा भी खुद पर भरोसा रख पाएगा. याद रखिए, आप परफ़ेक्ट नहीं हैं और आपको ऐसा होने की ज़रूरत भी नहीं है. आप बस ठीक हैं. और आपका बच्चा परफ़ेक्ट नहीं है और उसे ऐसा होने की ज़रूरत भी नहीं. आपका बच्चा ठीकठाक है.  

इसलिए अगर आपके बच्चे का मिज़ाज बिगड़ा हुआ रहता है तो आप सिर्फ़ उसके गुस्सैल व्यवहार को रोकने की कोशिश ही मत कीजिए. उसके गुस्से की भावना की मूल वजह यानी उसके स्रोत को समझने की कोशिश कीजिए और उनका निदान कीजिए. अगर आपका बच्चा ध्यान खींचने वाला व्यवहार दिखा रहा है, तो इस व्यवहार को खारिज मत कर दीजिए क्योंकि आप उसकी मांग के आगे झुकना नहीं चाहते हैं. ये समझने की कोशिश कीजिए बच्चा ध्यान क्यों खींचना चाहता है क्योंकि वो शायद उस ध्यान का हकदार है जो उसे यूं मिल नहीं रहा है. अगर आपके बच्चे को तकनीकी चीज़ों की लत पड़ गई है, तो सिर्फ़ उसके हाथ से मोबाइल फोन या कोई दूसरा गैजेट छीन लेने की धमकी मत दीजिए, बल्कि ये समझने की कोशिश कीजिए कि आखिर ऐसी कौनसी चीज़ उस लत से पूरी हो रही है जो अन्यथा नहीं हो पा रही थी. कौनसा विचार या यकीन है जिसके चलते बच्चा वास्तविक दुनिया की अपेक्षा वर्चुअल दुनिया को प्राथमिकता देने लगता है? अगर बच्चा ध्यान केंद्रित कर पाने में लगातार असमर्थ है और उसका ध्यान उचटता रहता है तो ये समझने की कोशिश कीजिए कि कौनसे विचार (डर, चिंताएं और उम्मीदें) उसके ज़ेहन में जगह बना रहे हैं और उन्हें ज़ाहिर करने का उसे अवसर मुहैया करा रहे हैं.

ये आपको अपने से दूर और कठिन लग सकता है. लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. आपको सिर्फ़ करना ये है कि अपने दिल से ‘सुनना’ है और खुद को और अपने बच्चों को समझना और स्वीकार करना है. इसके लिए हो सकता है आपको खुद को फिर से तैयार करना पड़े, खुद को रिस्किल करना पड़े और जैसा करते आए हैं उससे अलग ढंग से रिस्पॉन्ड करना पड़े या प्रतिक्रिया देनी पड़े. लेकिन ये हर हाल में संभव है. और इसका ईनाम भी कमतर नहीं- आपके अपने लिए, आपके बच्चों के लिए और आपका उनसे जो संबंध है उसके लिए.

मौल्लिका शर्मा बंगलौर में कार्यरत एक काउंसलर यानी परामर्शदाता हैं. मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने के लिए वो अपना कॉरपोरेट करियर छोड़ कर आई हैं. मौल्लिका वर्कप्लेस ऑप्शन्स नाम की एक वैश्विक कंपनी में काम करती हैं और बंगलौर के रीच क्लिनिक में अपनी प्रैक्टिस करती हैं. अगर इस कॉलम से संबंधित आपके पास कोई सवाल हैं तो कृपया हमें लिखे इस ईमेल पते परः columns@whiteswanfoundation.org.