विचार धारा

देखभाल की परवाह

डॉ अनिल पाटिल
देखभाल करने वालों के लिए सावधानी
डॉ अनिल पाटिल

अपने पिछले लेख में, मैंने समाज में वेतन या मानदेय के बगैर देखरेख का काम करने वाले परिजनों पर उसके विभिन्न प्रभावों की चर्चा की थी. ये लेख ज़्यादा विस्तार से एक महत्त्वपूर्ण और कुछ हद तक विडम्बनापूर्ण प्रभाव पर केंद्रित हैः देखरेख करने वाली की शारीरिक सेहत पर इस काम का असर.

ये लेख एक महत्त्वपूर्ण और कुछ हद तक विडम्बनापूर्ण प्रभाव पर ज़्यादा विस्तार से केंद्रित हैः देखरेख करते हुए व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर. ये बात इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि देखरेख करने वाले लोगों को बड़ी संख्या में ख़राब स्वास्थ्य का अनुभव करना पड़ता है और विडम्बनापूर्ण इसलिए कि शारीरिक या मानसिक रोग से पीड़ित अपने किसी प्रियजन की देखरेख करते हुए ऐसे लोग ख़ुद बीमार पड़ जाते हैं.

केरर्स वर्ल्डवाइड के एक हालिया सर्वे में, देखरेख करने वाले 69 फ़ीसदी लोग (मनोरोग से पीड़ित अपने परिजन की देखभाल करने वाले लोग) जिनके साथ हम काम करते हैं हमें बताते थे कि वे नियमित रूप से शारीरित स्वास्थ्य की समस्याओं का सामना करते हैं जैसे पीठ दर्द, शरीर में दर्द, सिरदर्द, खांसी, सर्दी और थकान.

लेकिन अपने पड़ोसियों और सहकर्मियों से अलग, देखरेख करने वाले लोग अपने शरीर को आराम देने के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं ताकि वे ताज़गी महसूस कर सकें. उन्हें चौबीसों घंटे देखरेख करनी होती है, अपने अन्य रोज़मर्रा के काम भी पूरे करने होते हैं और वे कभी पर्याप्त ब्रेक लेने का अवसर नहीं निकाल पाते हैं.

देखरेख करने वाले कई लोग अपनी स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों पर डॉक्टर से सलाह नहीं लेते हैं. ऐसा क्यों, तो उनका जवाब अलग अलग होता है- “मेरे पास जाने का समय नहीं है,” “अगर मैं अस्पताल गया या गयी तो मेरे परिजन को कौन देखेगा?” “मैं और दवाएं नहीं ख़रीद सकता या सकती हूं,” “अगर मुझे कुछ रातों की अच्छी नींद मिल जाए तो मैं ठीक हो जाऊंगा या जाऊंगी.” बतौर संगठन, हम स्थानीय डॉक्टरों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं ताकि वे भी देखरेख करने वालों के अस्तित्व के और उन कठोर वास्तविकताओं के प्रति अपनी समझ बढ़ा सकें जिनका सामना ये लोग दिनबदिन करते हैं.

आख़िरकार जब देखरेख करने वाला व्यक्ति अपने पीड़ित बच्चे को क्लिनिक पर लेकर आता है, तो डॉक्टर को देखरेख करने वाले के स्वास्थ्य के बारे में भी पूछने में ज़्यादा समय नहीं लगना चाहिए. ज़्यादातर समय ये सिर्फ एक जागरूकता और सकारात्मक रवैये की बात होती है जिसकी ज़रूरत है.

हालांकि देखरेख करने वाले सभी लोगों तक इस ढंग से नहीं पहुंचा जा सकता है. देखरेख करने वाले को जागरूक करने और उसका ध्यान रखने का काम स्थानीय समुदाय से शुरू होना चाहिए.

हालांकि देखरेख करने वाले सभी लोगों तक इस ज़रिए से नहीं पहुंचा जा सकता है. उनके प्रति जागरूकता और सावधानी की शुरुआत स्थानीय समुदाय से शुरू होनी चाहिए. अपने पिछले लेख में, मैंने आपसे पूछा था कि आप उन लोगों के बारे में सोचें जिन्हें आप जानते हैं: शायद आपको इसका मौका मिला होगा और अपने रोज़ाना के सर्किल में आपको कमसेकम एक व्यक्ति ऐसा मिला होगा जो देखरेख के काम में लगा हो.

लेकिन हो सकता है कि आप उस तक पहुंचे न हों या कोई ऐसा व्यवहारिक तरीका न तलाश कर पाएं हो जिससे आप उनकी मदद कर सकें. इस विषय पर चर्चा छेड़ना कठिन हो सकता है- आपको हो सकता है ये न पता हो कि क्या कहें या आपकी बात पर सामने वाला व्यक्ति क्या प्रतिक्रिया करेगा. इसलिए पहला कदम तो यही हो सकता है कि आप उन्हें अपना कुछ समय दें. शायद आप उनकी जगह मरीज़ के पास बैठ जाएं जिससे उन्हें कुछ समय अपने लिए भी मिल जाए.

कौन जानता है, इससे उन्हें मौका मिल जाए डॉक्टर के पास जाने का जिसकी उन्हें बहुत ज़रुरत हो सकती है कि अपनी बार बार उठती खांसी के बारे में पूछ सकें या फ़िजियोथेरेपिस्ट के पास जा सकें अपनी पीठ के दर्द के उपचार के लिए. आप अपनी ओर से ये पेशकश कर सकते हैं कि उनके बदले की भारी खरीददारी आप कर लगें या शरीर में दर्द या बुखार के लिए आप उन्हें कोई विश्वसनीय उपचार बता सकते हैं.

इस तरह की कोई भी बात हो सकती है, लेकिन इस व्यवहार से वे जान जाएंगें कि आप उनका ख्याल रखना चाहते हैं, और आप उनके लिए उपस्थित हैं. एक मुस्कान और एक आत्मीय शब्द थकान को दूर कर सकता है और ये व्यवहार कि “मैं कैसे मदद करूं”, बोझ को हल्का करना शुरू कर सकता है.

बिना सहायता और बिना इलाज के, देखरेख करने वालों को जो स्वास्थ्य समस्याएं आती हैं वे दीर्घकालिक हो सकती हैं. देखरेख के चलते उनके शरीर पर बोझ पड़ने लगता है, वे लगातार “ऑन ड्यूटी” रहते हैं, कई बार उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती, तो इन सब चीज़ों को चलते वे अपने प्रियजन को उस स्तर या गुणवत्ता की देखरेख करने में असमर्थ होते जाते हैं जैसा वे पहले करते थे.

थकान, बोझ, और उनींदापन उन्हें भी घेरने लगता है. इस तरह एक दुष्चक्र सा शुरू हो जाता है जिसमें देखरेख करने वाला भी और मरीज़ भी निरंतर गिरावट महसूस करने लगते हैं और अगर कोई हस्तक्षेप न करें तो संकट का बिंदु आ खड़ा होता है. इस बिंदु के आने से पहले, अगर आप अपने किसी परिचित को जानते हैं जो देखरेख का जिम्मा संभाल रहा है तो कृपया पहला कदम उठाएं और ऐसा संपर्क बनाएं जिससे ये चक्र उल्टा जा सके.

अपने अगले लेख में, अवैतनिक रूप से देखरेख का काम करने वाले परिजनों की मानसिक सेहत पर इस काम के असर की चर्चा करूंगा. मैं इस बारे में भी सुझाव दूंगा कि कैसे संगठन, अधिकारी और समाज उनके लिए मददगार हो सकते हैं.

डॉ अनिल पाटिल केरर्स वर्ल्डवाइड नाम की संस्था के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक हैं. ये संस्था परिवार में ही देखरेख करने वाले उन लोगों की मुश्किलों से निपटती और उन्हें सामने लाती है जो अनपेड हैं यानी जिन्हें देखरेख का कोई मानदेय नहीं मिलता है. 2012 में स्थापित और यूके(ब्रिटेन) में रजिस्टर्ड ये संस्था, विकासशील देशों में देखरेख करने वालों के साथ ही एक्स्क्लूसिव तौर पर काम डरती है. डॉ पाटिल इस स्तंभ को लिख रहे हैं रूथ पाटिल के साथ जो केरर्स वर्ल्डवाइड में वॉलंटियर हैं.

ज़्यादा जानकारी के लिए आप संस्था की वेबसाइट Carers Worldwide को देख सकते हैं. आप लेखकों को ईमेल भी भेज सकते हैं इस पते परः columns@whiteswanfoundation.org

इस लेखन में ज़ाहिर की गई राय लेखक की है और आवश्यक रूप से व्हाइट स्वान फ़ाउंडेशन के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है.