विचार धारा

किशोरावस्था की विस्मय दुनिया

डॉ श्यामला वत्स
किशोरावस्था के लक्षण क्या हैं
डॉ श्यामला वत्स

ये शब्दावली मैंने उन्हीं अभिभावकों के मुंह से सुनी है जिनके किशोर बच्चे कष्टदायी हैं. वे मांबाप देर तक घर से बाहर रहने, ज़्यादा अल्कोहल का सेवन करने वाले, लंच के समय तक बिस्तर पर पड़े रहने और जीवन में ‘विद्यार्थी’ का तमगा बने रहने लायक ग्रेड लाने वाले अपने बेटों या बेटियों के बारे में चिंतित रहते हैं.

वे कहते हैं कि उनके बच्चे घर का इस्तेमाल तो बस सोने और कपड़े धुलवाने के लिए करते हैं और अपने मातापिता को एटीएम की तरह देखते हैं. यहां मैं सिर्फ़ उद्धरण ही दे रही हूं. ऐसे मातापिता अपने बच्चों के गुस्से और अभद्र भाषा को उनके उद्दंड होने के रूप में स्वीकार करते हैं. और वे एक शर्मीली मुस्कान के साथ ऐसा कहते हैं जिससे मेरे सामने रखी मेज के पार कुर्सी पर आगे झुककर अनाड़ियों की तरह बैठे उनके बदमिज़ाज और उदासीन बच्चे को बुरा न लगे.

ये बात भले ही कितनी चौंकाने वाली लगे, मातापिता बताते हैं कि उनके बच्चे के अच्छे अंक आए हैं, उसके पास दोस्त हैं जिनके बारे में उन्हें भी पता है और वे उनकी ये चिंता करें कि कहां रह गए, खासकर अगर बेटी है तो, उनकी इस चिंता से पहले ही वे घर आ जाते हैं.

अगर वो रात देर तक किसी पार्टी में हैं तो वे अपने मातापिता को अपने ठिकाने के बारे में सूचित करते रहते हैं और दावत के बाद ऐसे व्यक्ति को घर छोड़ने के लिए कहते हैं जो शराबी न हो. जब मातापिता या अभिभावक ये सब कहते हैं, तो मुझे लगता है अपने बच्चे के बारे में वो यही कहते हैं, “वो एक अच्छी लड़की है, उद्दंड किशोर नहीं.”

बड़ी संख्या में जो किशोर मुझसे मिलने आते हैं, वे निश्चित रूप से अपने ग्रेड और अच्छी कॉलेज शिक्षा को लेकर चिंतित रहते हैं. सही है, वे संपूर्णता के प्रतीमान या साक्षात उदाहरण नहीं हैं. उन्हें ऐसा होने की ज़रूरत भी नहीं है. वे आए दिन गल्तियां करते हैं, कभी इम्तहान या टेस्ट में फेल भी हो जाते हैं, और दोस्तों से मिलने के चक्कर में कक्षाओं से गैरहाजिर भी हो जाते हैं.

वे ‘हर चीज़’ अपने मातापिता को नहीं बताते हैं, जो कि सामान्य बात है. बड़े होने का यही अर्थ हैः अपनी कार्रवाइयों का यानी जो कुछ भी आप कर रहे हैं उसकी ज़िम्मेदारी ले सकने लायक आज़ाद व्यक्ति का निर्माण. उनसे ये अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे भी हूबहू उन्हीं मूल्यों को अपनाएं जो उनके मातापिता के हैं. वे ऐसा करते भी नहीं है. लेकिन वे अपने परिवारों की फ़िक्र करते हैं, और अपने मातापिता और भाईबहन के साथ सौहार्दपूर्वक रहना चाहते हैं.

‘टिपीकल टीनएजर’ या बेढंगे किशोर या उद्दंड किशोर या कहें बिल्कुल लड़कपन जैसी कोई चीज़ नहीं होती है. और अगर ऐसा है तो उनसे ज़्यादा तो ‘टिपीकल सीनियर सिटीज़न’ हैं. कोई एक चीज़ जो किशोर को अलग या टिपीकल बनाती है वो है आज़ाद वयस्क व्यक्ति के रूप में बढ़ने की उनकी न्यायसंगत ज़रूरत. और ये उस कुदरती प्रक्रिया का एक हिस्सा है जिसे हम जीवन कहते हैं.

जो कुछ भी वे करते हैं वो इसी स्वाभाविक या जन्मजात आवश्यकता के तहत ही करते हैं. मैं किशोर दिनों के झंझटों और कष्टों को कमतर नहीं कर रही हूं क्योंकि कोई भी किशोर आपको बता सकता है कि ये मुश्किल भरा समय होता है, खासकर अपनी पहचान, शारीरिक रूपरंग, पढ़ाई लिखाई, दोस्तों के सथ रिश्तों और कॉलेज जाने की योजनाओं से जुड़े मामलों में. मैं सिर्फ़ इस मामले को आतंक की हद तक बढ़ाचढ़ाकर पेश करने से परहेज कर रही हूं जो यूं तो इस अवस्था को लेकर बना ही दिया जाता है लेकिन ये बहुत सारे किशोरों को प्रभावित नहीं करता है.

ये रूढ़ियां या स्टीरियोटाइप कहां से पैदा हुए हैं? जिन्हें टिपीकल टीनएजर कहा जाता है वे अक्सर मुश्किलों में पड़े बच्चे होते हैं. वे असुरक्षित महसूस करते हैं और अपने बारे में अच्छा नहीं सोच पाते हैं. वो अपने अटपटेपन को या तो अपनी विरक्ति या उकताहट या फिर अपने आक्रामक रवैये से ढांपने की कोशिश करते रहते हैं. उनकी समस्याएं कुदरत और हालात की मिलीजुली वजहों से निकली हैं.

परेशान और हक्केबक्के किशोर का मन उचट जाता है, वो गुस्सैल और उदास हो सकता है. वो बुरी तरह अवसादग्रस्त हो सकता है और हमेशा के लिए कहीं चले जाना चाहता है. वो अकेला और भ्रमित हो सकता है. हर किसी को जीवन के किसी न किसी मोड़ पर मदद की ज़रूरत होती है और मदद लेना सही बात है.

मैं जानती हूं कि पहला कदम कठिन होता है- किसी अजनबी को मुलाकात का समय लेने के लिए फ़ोन करना. बच्चों ने ही मुझे ऐसा बताया है. वो पहली बार में फोन पर या तो आतंकित लगते हैं या फिर ऐसे चुप लहजे में बात करते हैं कि उनकी परेशानियां पूरी तरह ज़ाहिर नहीं हो पाती हैं.

पहले सत्र में, किशोर अक्सर संदेह से भरे होते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि उन्हें समझा नहीं जाएगा. कई युवाओं ने मुझे बताया है कि वे पहले सेशन के बाद आगे के सत्रों में पहुंचने का भी इंतज़ार करते हैं. क्योंकि पहली ही मुलाकात में उनके दिमाग से बहुत सारे उलझनों, आशंकाओं को निकाल फेंकने से उन पर अच्छा असर पड़ता है. वे ज़्यादा साफ़ तरीके से देख सकते हैं और उनमें उम्मीद की भावना लौट आती है.

कई बार, उन्हें निरीक्षण में कुछ महीनों के लिए अवसादनिरोधी दवाओं से फायदा हुआ. लंबे समय तक रहने वाले तनाव और अचानक लगे सदमे या झटके, दोनों का ही लोगों के ज़ेहन पर बुरा असर पड़ता है और अवसाद निरोधी दवाएं उल्लेखनीय रूप से काम करती हैं. उनकी लत नहीं पड़ती है और वे लोगों को पिशाच नहीं बना देती जैसी कि भ्रामक धारणा है. चिंता और अवसाद में कटौती के लिए दवाओं की सहायता के साथ थेरेपी भी कामयाब रहती है.

डॉ श्यामला वत्स बंगलौर में कार्यरत मनोचिकित्सक हैं. वो बीस साल से ज़्यादा समय से प्रैक्टिस करती रही हैं. किशोरों और युवाओं पर ये कॉलम पाक्षिक होगा यानी आप इसे हर पंद्रह दिन में पढ़ पाएंगें. अगर आपके पास कोई कमेंट या सवाल हैं जो आप शेयर करना चाहते हैं तो कृपया आप डॉ वत्स को लिखें इस ईमेल पते परः columns@whiteswanfoundation.org