काम पर वापस: संस्थाएं मानसिक रोगियों को कैसे सहारा दे सकती हैं

काम पर बने रहने या काम पर लौटना मानसिक बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति के स्वास्थ्य लाभ में एक बड़ी भूमिका निभाता है। काम करने के लिए जाना, एक दिनचर्या होना और उत्पादक बने रहना व्यक्ति में उपयोगी होने की भावना देने में मदद करता है, उनका आत्मविश्वास और आत्मसम्मान बढ़ाता है। यह उनके आसपास के लोगों के मानसिक बीमारी के बारे में और अधिक जागरूक होकर समर्थन करने से अधिक समावेशी माहौल बनाने का अतिरिक्त लाभ भी करता है।

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यह कहा जाता है, ज़्यादातर संस्थान मानसिक रोगियों के प्रति बहुत समावेशी नहीं हैं। कई संस्थानों में मानसिक बीमारी से ग्रस्त कर्मचारियों के मामले को देखकर समर्थन पर फैसला करते हैं, और वहाँ किसी भी नीतियां या नियम शायद ही हों जो व्यापक स्तर पर मुद्दे का समाधान करती हैं। यह मानसिक रोगी और संगठन के प्रबंधन दोनों के लिए चुनौती है। मानसिक रोगी के लिए इसका अर्थ, यह उनकी नौकरी की सुरक्षा और काम पर भावनात्मक हित के बारे में अनिश्चितता है; प्रबंधन और मानव संसाधन के लिए एक नीति की अनुपस्थिति का मतलब है कि उनके पास इस तरह के कर्मचारी को सहारा देने के लिए बहुत कम या कोई सिस्टम नहीं है।

मानसिक बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति के लिए, काम पर वापस जाने से निम्नलिखित मुद्दे कुछ व्यग्रताएं ला सकते हैं:

  • क्या मेरा आंकलन होगा या कलंकित हो जाऊंगा?

  • क्या मैं अपनी नौकरी खो दूंगा या पदावनत हो जाऊंगा?

  • क्या मेरे साथी मुझे और जिन चुनौतियों का मुझे सामना करना पड़ता है उन्हें समझ पाएँगे?

  • क्या मैं काम के तनाव से निपटने में सक्षम हो पाऊंगा?

  • क्या मैं अन्य पर्यावरणीय और काम के तनाव का सामना करने में सक्षम हो सकूंगा?

इन चिंताओं को दूर करने और मानसिक बीमारी से ग्रस्त लोगों को अधिक शामिल करने के लिए संगठन क्या कर सकते हैं?

हमने कुछ लोगों के एक समूह से बात की - जिसमें मानसिक रोगों से उबरे लोग, मानव संसाधनकर्मी और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ शामिल थे - और मानसिक बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए सहायक कार्य वातावरण बनाने के लिए संगठनों के पास कैसे सिस्टम हो सकते हैं पर उनके सुझाव यहां हैं:

  • अधिकतर संगठनों में कर्मचारी सहायता कार्यक्रम (ईएपीएस) है। ईएपी कार्यक्रम में मानसिक स्वास्थ्य होने से कलंक की धारणा तोड़ने और मानसिक स्वास्थ्य पर बातचीत में मदद करता है।

  • जिन लोगों को आवश्यकता हो सकती है उनके लिए मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर को कॉल करने की व्यवस्था रखें। आपातकालीन मानसिक स्वास्थ्य समस्या पर सहारे के लिए दिए गए फोन नम्बर को परिसर भर में प्रमुखता से प्रदर्शित करें। गोपनीयता सुनिश्चित करें।

  • कंपनी की नीतियों को बनाने वाले वरिष्ठ प्रबंधन और अधिकारियों सहित सभी कर्मचारियों को मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा और संवेदीकरण प्रदान करें।

  • यह सुनिश्चित करें कि कर्मचारियों की विकलांगता या बीमारी के कारण उनके साथ कोई भेदभाव या उत्पीड़न नहीं हो रहा है।

  • मानसिक बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों के साथ व्यवहार करने में, लचीला विकल्प तलाशें और समाधान ऐसा हो जो कि उनके लिए अतिरिक्त तनाव का कारण न बनें।

  • प्रबंधकों के लिए इतने संसाधन उपलब्ध होने चाहिए कि यदि मानसिक रोगी उनके साथ काम कर रहा हैं और कोई मुश्किल स्थिति आने पर वे विशेषज्ञ तक पहुँचा सकते हैं।

बेंगलूर स्थित परामर्शदाता मौल्लिका शर्मा का मानना ​​है कि अगर कंपनी की नीतियों में कर्मचारियों की मानसिक भलाई पर जोर दिया जाए तो यह सभी चीजें हासिल की जा सकती हैं। "प्रबंधक और सहकर्मियों को तब, बीमारी के लक्षण की पहचान करने, गैर आलोचनात्मक तरीके से व्यवहार करने और सामान्य कार्यप्रणाली से परे हटकर व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। इससे वहाँ मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर नज़र रहेगी, और ग्रस्त लोग कलंकित महसूस नहीं करेंगे। किसी सहयोगी को समर्थन की जरूरत पड़ने पर सहकर्मी और प्रबंधक को किसी भी स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त सशक्त भी हो सकेंगे।"