मैं स्वयं एक थेरेपिस्ट हूं और मेरे लिए भी एक थेरेपिस्ट है

अर्चना रामनाथन

वाणी ने जब काउंसेलिंग लेना शुरू किया तो वह घबराई हुई थी। वह सोच रही थी कि अपने काउंसेलर से वह जो कुछ साझा करने जा रही थी, उस तरह की परेशानी के बारे में उसकी काउंसेलर ने क्या पहले कभी सुना होगा। वह अपने थेरेपिस्ट की योग्यता को लेकर भी सशंकित थी कि क्या जो कुछ वह साझा करना चाहती थी उसे काउंसेलर समझ सकेंगी: "मुझे आश्चर्य होता है कि हर दिन लोगों की समस्याएं सुनना एक काउंसेलर को कैसे प्रभावित करता है। मुझे उम्मीद है कि मेरी काउंसेलर एक मजबूत व्यक्ति है और वह मेरी मदद कर सकती हैं। "

कभी-कभी मेरे क्लाइंट्स ने जिज्ञासावश मुझसे पूछा भी है, "लोगों द्वारा जो कुछ आपसे शेयर किया जाता है, क्या आप उससे बोझिल महसूस नहीं करती हो?"

यह ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए परेशानी भरा विचार हो सकता है जो थेरेपिस्ट है या थेरेपी देने के बारे में सोच रहा है।

किसी थेरेपिस्ट का अपने क्लाइंट के साथ गहरा संबंध होता है और वे अपने काम के कारण व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों प्रभावित होते हैं। इस प्रकार, थेरेपिस्ट के लिए उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य महत्वपूर्ण हो जाता है। थेरेपिस्ट चूंकि एक सहायता करने वाले पेशे में हैं, इसलिए उन्हें लगातार अपनी स्वयं की देखभाल पर भी ध्यान देना चाहिए।

किसी थेरेपिस्ट ने काउंसेलिंग पेशे को ही क्यों चुना इसमें कई थेरेपिस्ट्स का अपना व्यक्तिगत सफर शामिल होता है। एक थेरेपिस्ट को पेशेवर के रूप में प्रैक्टिस करने से पहले सैद्धांतिक दृष्टिकोण और कौशल में गहन प्रशिक्षण लेना होता है। उन्हें व्यक्तिगत चिकित्सा में भी होना आवश्यक है, जिसमें अपने पिछले और वर्तमान मुद्दों को जानना, व्यक्तिगत अंतरद्वंद्व के बारे में जागरूक होना और उन पर काम करना, खुद को स्वीकारना, और खुद को लचीला बनाए रखना शामिल हो सकता है। प्रशिक्षु सलाहकारों की क्षमता बढ़ाने के लिए कुछ घंटों का व्यक्तिगत उपचार एवं कई पेशेवर काउंसेलर प्रशिक्षण कार्यक्रम अनिवार्य रूप से जरूरी हैं।

काउंसेलर को थेरेपी की आवश्यकता क्यों होती है?

प्रशिक्षु परामर्शदाता को थेरेपी लेने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि एक क्लाइंट बनना क्या है और इसके लिए अतिसंवेदनशील होना चाहिए। इससे उन्हें यह समझने में भी मदद मिलती है कि भावनात्मक कल्याण की दिशा में काम करने के लिए एक थेरेपिस्ट के रूप में क्या होता है; जिसे वे अपने क्लाइंट की ओर से पाने की उम्मीद करेंगे। यह थेरेपिस्ट को उसकी मान्यताओं, मूल्यों और दुनिया को देखने का नजरिया, कमजोरियों को पहचानने और व्यक्तिगत विकास के क्षेत्रों की पहचान में मदद करता है।

एक थेरेपिस्ट को स्वयं के अनुभवों को लगातार सामने रखने और स्वयं की जागरूकता बनाए रखने की आवश्यकता होती है। इससे उन्हें भावनाओं, सोचने की प्रक्रियाओं और शारीरिक जागरूकता की गहरी समझ मिलती है। खुद को जागरूक रखने की थेरेपिस्ट की क्षमता उन लोगों में महत्वपूर्ण है जो प्रामाणिकता और वास्तविकता के साथ अपने क्लाइंट्स की जिंदगी में झांकने में सक्षम होना चाहते हैं।

उदाहरण के लिए, जब एक थेरेपिस्ट ने पर्सनल थेरेपी में क्रोध और अतिसंवेदनशीलता के अपने व्यक्तिगत अनुभवों को जाना और पहचाना, तो उसकी यही जागरूकता काउंसेलिंग में उसके क्लाइंट्स के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण बन गई। जब विक्रम परामर्श के लिए आया, तो वह इस अपने गुस्से से संघर्ष कर रहा था कि क्योंकि गुस्सा उसके जीवन और रिश्तों को प्रभावित कर रहा था। इसने थेरेपिस्ट को विक्रम के अनुभव से जुड़ने में मदद की, उसने विक्रम के साथ सहानुभूति व्यक्त की और उसने अपने स्वयं के संघर्षों से इसे ट्यून किया। इसने थेरेपिस्ट को अपने क्रोध के मुद्दों की मदद से विक्रम के मामले को सुलझाने में सक्षम बनाया।

कई मनोचिकित्सकों ने थेरेपिस्ट के लिए खुद भी थेरेपी लिए जाने की उपयोगिता के बारे में बात की है। वैश्विक रूप से, कई नियामक संस्थाओं ने काउंसेलिंग प्रैक्टिस के लिए थेरेपिस्ट को लाइसेंसिंग या मान्यता देने के लिए व्यक्तिगत थेरेपी लेने के निर्देश दिए हैं। गुड प्रैक्टिस के फ्रेमवर्क ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ काउंसेलिंग एंड साइकोथेरेपी (बीएसीपी) ने प्रैक्टिस के नैतिक ढांचे की जिम्मेदारी के रूप में थेरेपिस्ट की स्वयं की देखभाल को सिफारिश की है।

आशा, पेरेंटिंग मामले में कुछ समस्याओं को लेकर थेरेपी ले रही थी। जैसे ही उसने अपने भावनात्मक अनुभवों को जानना शुरू किया, उसे अपने बचपन के दौरान अपनी मां की मृत्यु के बारे में गहरी दुखद भावना महसूस होनी शुरू हो गई। आशा के दुःख ने थेरेपिस्ट को भी गहराई से प्रेरित किया था, और वह भी उसके दर्द का अनुभव करने में सक्षम था - फिर भी, वे भावनात्मक रूप से साथ और आशा को पर्याप्त सहारा देने में सक्षम थे। अन्य क्लाइंट्स के लिए भी ऐसा करने के लिए थेरेपिस्ट को स्वयं की देखभाल करना बहुत महत्वपूर्ण है।

थेरेपिस्ट्स भी इंसान हैं, और, किसी अन्य व्यक्ति की तरह, वे भी जिंदगी के संघर्षों से गुज़रते हैं। एक काउंसेलर को व्यक्तिगत इमरजेंसी और संकट, जीवन बदलने वाली महत्वपूर्ण घटनाओं, नुकसान, दुःख, बीमारियों, असफलताओं और चुनौतियों से निपटने की आवश्यकता हो सकती है। थेरेपिस्ट को भी जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उनकी ज़िम्मेदारी है कि उन्होंने अपने काम से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया है।

जब थेरेपिस्ट खुद थेरेपी ले रहे होते हैं, तो उन्हें अपने संसाधनों को फिर से मजबूत करने के लिए सहारा और देखभाल मिलती है, उन्हें लचीला बनने में मजबूती मिलती है, और उनकी थकान और अक्रियाशीलता का प्रबंधन होता है। इन सबसे ऊपर, इससे अक्सर थेरेपिस्ट की भलाई के साथ उनकी जीवन शक्ति में वृद्धि होती है, ताकि वे अर्थपूर्ण तरीके से क्लाइंट्स के साथ काम कर सकें।

कोई भी थेरेपिस्ट दर्द या संघर्ष से अप्रभावित नहीं रहता है। वास्तव में, उसमें प्रभावित होने की गुणवत्ता होती है जो अपने क्लाइंट्स के साथ भावनात्मक संपर्क स्थापित करने में उसकी मदद करता है। ऐसा करने में चिकित्सक को अपनी स्वयं की थेरेपी का लंबा रास्ता तय करना होता है। एक क्लाइंट को यह आश्वासन दिया जा सकता है कि प्रैक्टिस करने वाले थेरेपिस्ट ने अपने समर्थन तंत्र विकसित करने के लिए पर्सनल थेरेपी ली है, ताकि वे अपने परामर्श सत्र के दौरान क्लाइंट के लिए भावनात्मक और मानसिक रूप से तैयार रह सकें।

 

**यहां दिए गए उदाहरणों का प्रयोग सिर्फ लोगों को समझाने के लिए किया गया है। ये उदाहरण वास्तविक ग्राहकों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

**नीचे दी गई टर्म का उपयोग एक-दूसरे के लिए किया जाता है-काउंसेलर और थेरेपिस्ट,काउंसेलिंग और मनोचिकित्सक।

अर्चना रामनाथन, परिवर्तन काउंसेलिंग ट्रेनिंग एंड रिसर्च सेंटर की काउंसेलर और प्रशिक्षक हैं।

संदर्भ: ब्रिटिश एसोसिएशन फॉर काउंसेलिंग एंड साइकोथेरेपी (बीएसीपी) - नैतिक फ्रेमवर्क के लिए दिशानिर्देश - https://www.bacp.co.uk/ethical_framework/

 

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