ओसीड़ी मज़ाक नहीं- मानोरोग को समझना

मनोग्रंथित बाध्यकारी विकार के लक्षण पहचनिए

डॉ.सी.जनार्धन रेड्डी, डॉ. जयसूर्या टीएस

वर्ष 2013 में, मलयालम सिनेमा को नार्थ 24 काथम चलचित्र के जरिए एक नया जीवन मिला।  फाहिद फाज़िल जिसने चतुरता से हरी नामक नायक की भूमिका को निभाया, जो एक सॉफ्टवेयर प्रोग्रामर है और जिसमें ओसीडी के लक्षण होते हैं ।  इस विकार को स्पष्ट रूप से दिखाए बिना, अधिक साफ सुथरे तरीके से, चलचित्र ने ओसीडी के अभिजात लक्षण को मुख्य रूप से समझाने का प्रयास किया।  हरी हर जगह अपने साथ टिश्शू के रूमाल ले जाता है जिससे वह बैठने से पहले अपनी सीट साफ कर सके।  वह शौचालय से बाहर या उसके अंदर तब तक नहीं जाता जब तक उसे कोई अपने हाथों से खोल न दें, क्योंकि मूठ गंदा हो सकता है। उसके प्रातः नित्यकर्म, अनेक चरणों में पूरे होते हैं। निर्देशक ने ओसीडी से पीड़ित लोगों में अन्य मानसिक विकारों के लक्षणों को भी दिखाया है, उदाहरण के लिए, हरी का हवाई यात्रा का अतर्कसंगत डर, जो कि भय से पीडित लोगों में आम तौर पर पाया जाता है।  एक दीर्घानुभवी राजनीतिज्ञ तथा सामाजिक कार्यकर्ता से रेल यात्रा में अचानक हुई भेंट के बाद हरी के सकारात्मक परिवर्तन की ओर आने पर सिनेमा का अंत होता है।

नार्थ 24 काथम जैसे सिनेमा को सफलता, अपरम्परागत मार्ग की ओर बढ़ते देखना रोचक माना गया है, इस युग में, जहाँ आम-तौर पर साधारण रोमान्स या लड़ाई भूखंडों जैसी चलचित्र बॉक्स-आफिस हिट्स मानी जाती हैं।  नार्थ 24 काथम, इस दिशा में सोचने के लिए मजबूर करती है कि मानसिक स्वास्थ्य के मामले में, विशेष रूप से ओसीडी जैसे विकारों के मामले में हम समाज के रखवाले कैसे बतक्कड़ बन जाते हैं।  ओसीडी के बारे में, हमारी समझ, गलतफहमी से भरी और उन रंगों से रंगी है जो हम व्यापक रूप से सुनते और देखते हैं। 

प्रथमत: ओसीडी केवल सफ़ा‌ई या सुव्यवस्थित होना ही नहीं होता, जैसा कि जनसंचार माध्यम चित्रित कराते हैं।  यदि आप अपने वार्डरोब में रंगों के अनुरूप कपड़ों को लगाते हैं तो यह आवश्यक नहीं कि आपको ओसीडी है; आप केवल कपडों को चुनने में लगने वाले समय को सरलता से बचा रहे हैं।  जैसे कि डॉ.सी.जनार्धन रेड्डी, निमहाँस में स्थित पहली ओसीडी क्लीनिक के परामर्शदाता कहते हैं  – “सुव्यवस्थि रहना और ओसीडी होने के बीच की सूक्ष्म रेखा तब सामने आती है जब एक प्रक्रिया या नित्यकर्म परेशानी में बदल जाता है।  हम सब में बुरे विचार आते हैं परंतु यह विचार क्षणिक होते है और कुछ समय बाद चले जाते हैं ।  ओसीडी से पीड़ित रोगियों के साथ ऐसा नहीं होता – उनमें विचार घुसपैठिया बन जाता है।”  दूसरे शब्दों में, ओसीडी आपके वैयक्तिक और व्यावसायिक जीवन को नित्य-प्रति प्रभावित करना शुरु कर देता है। 

ओसीडी मनोग्रंथित विचारों द्वारा चित्रित किया गया विकार है जो बाध्यताओं की ओर ले जाता है।  बाध्यताएं दुहराए गए अर्थरहित कार्य हैं जिसे जानलेने के बावजूद कि वे अर्थहीन, अनावश्यक और अतिरेक हैं।  ओसीडी सौम्य रहने से लेकर तीव्र कमज़ोर स्थिति तक होती है।  ओसीडी के लक्षण पेचीदा होते हैं और कई भिन्न रूपों में दिख सकते हैं। जब कि मैलेपन के भय से घिरना और धुलाई तथा सफाई प्रायिक रूप से दिखने वाले होते हैं,  ओसीडी के अन्य प्रारूपिक लक्षण में, दैनिक गतिविधियों के विषय मे संदेह, चोट और आक्रमणता की मनोग्रंथता, ईशनिंदा, यौन-सम्बंधी विचार, अंधविश्वासी व्यवहार और समरूपता तथा सुव्यवस्थता के प्रति अत्याधिक चिंता करना शामिल है।  कुछ ओसीडी मामलों में गिनती बाध्यताओं को लेकर चरित्र-चित्रण किया गया है – जैसे कि 30 साल का सतीश, बैंक कैशियर, जो इस संदेह से परेशान था कि वह ग्राहकों को करेंसी नोटों को सौंपने से पहले सही नहीं गिन पा रहा था।  इसलिए सतीश आखिरकार नोटों को बार-बार गिने जा रहा था और इसकी धीमी गति पर क्रोधित ग्राहक तुरंत ही चिल्ला उठता था, और बैंक प्रबंधक ने इसकी अकुशलता के लिए एक ज्ञापन देने का निर्णय लिया।  ओसीडी घुसपैठिए विचारों के लिए भी चित्रित किया गया है जो एक विशेष रोग में संकुचित होने के अविवेकपूर्ण भय से लेकर मृत्यु के बाद के विचारों पर अचलता से सोचने-विचारने तक हो सकता है।  प्रभावित व्यक्ति इन विचारों द्वारा अंतहीनता से थोड़ी राहत को तलाशता है और सच्चाई यह है कि इन विचारों को स्वेच्छापूर्वक पैदा नहीं कर पाना ही व्यक्ति को अधिक दु:खप्रद कर देता है।  

ओसीडी स्किज़ोफ्रेनिया या द्विध्रुवि विकार से अधिक व्यापक है और 1-3% आबादी1 को प्रभावित करता है।  अधिक पीडितों में ओसीडी का हल्का रूप देखने को मिलता है,  उनकी स्थिति और जीने की रीति के कारण वह अनिदानित रहता है। तथापि, 1% लोगों को तीव्र ओसीडी होता है, जो उनमें असमर्थता की भावना जगा सकता है।लोकप्रिय धारणा के प्रतिकूल, ओसीडी बच्चों में सामान्य रूप से होता है, और डॉ. रेड्डी के अनुसार, यह चार साल जितने छोटे बच्चों को प्रभावित कर सकता है।  निमहांस के डॉ. जयसूर्या टीएस2 द्वारा ओसीडी से पीडित किशोरों पर आधारित एक अध्ययन में पाया गया है कि 100 में से 1 बच्चे में ओसीडी के लक्षण होते हैं।  बच्चों में यह स्थिति विशिष्ट रूप से कठिन हो सकती है क्योंकि यह जाने बिना कि वह असत्य है, उनमें विचार निर्धारित हो सकता है और इस कारण वह विचार-विमर्श नहीं करते।  यह अच्छी खबर है कि ओसीडी का इलाज हो सकता है. डॉ. रेड्डी कहते है कि निमहांस में इलाज किए गए 70% मामलों में महत्वपूर्ण सुधार दिखा है, और इलाज के बाद आधों में थोड़े से लक्षण रह गए या लक्षणरहित हो गए और अब सामान्य स्थिति में जीवन बिता रहे हैं। कोग्निटिव बिहेवोरल थेरिपि (सीबीटी), जो कि सामान्य रूप से चिकित्सा में उपयोग होती है, मनोग्रंथता को समझने की रीति को बदलने का लक्ष्य रखती है और व्यवहार में बदलाव लाने हेतु सरलता प्रदान करती है।  तीव्रता के मामलों में, दवा का उपयोग होता है, और यदि ये चिकित्सा उपचार समय-पूर्व समाप्त कर दिए गए तो स्थिति खराब होने की आशंका अधिक हो सकती है और रोगी को कई वर्षों तक दवा-दारू जारी रखना पड़ सकता है।

तथापि, समाज में अधिक भयप्रद कर देने वाली बात यह है कि, हमारे प्रतिदिन के वार्तालापों में हमने ओसीडी को बतक्कड़ से इस हद तक ले गए है कि रोग अपना असली अर्थ खो देने के कगार पर है।  हम अपने बारे में कहते है कि ‘थोडी सी ओसीडी है’ यदि हम अपने कार्य स्थान को स्वच्छ रखते हैं।  वास्तव में, हम अपने मेज़ों को स्वच्छता से व्यवस्थित रखना चाहते है क्योंकि हम ऐसा ही पसंद करते है ।  जब हम अपने कार्य स्थान को स्वच्छ रखते हैं तो हमें संतुष्टि होती है, यह हमारे जीवन को किसी भी तरीके से क्षति नहीं पहुंचाती ।  तथापि, ओसीडी से पीडित व्यक्ति का जीवन मनोग्रंथित विचारों से प्रभावित होता है और इन विचारों को प्रबल आवेग देता है।  इसलिए, चाहे वह लगाए हुए ताले को जांचना हो या चीज़ों को निश्चित रूप से व्यवस्थित रखना, ओसीडी से पीडित एक व्यक्ति अपनी कार्यकलापों को दुहरा सकता है, लेकिन इससे कोई सुख या संतुष्टि प्राप्त नहीं कर पाता।

ओसीडी की दशा इतनी गंभीर है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे रुपए के घाटे और जीवन की घटी गुणवत्ता के मामले में विश्व के पहले दस अधिकतम रोगों की श्रेणी3 में रखा है। वास्तव में, ओसीडी से पीडित रहना इतना हतोत्साहित कर सकता है कि कुछ पीडितों के बारे में कहा गया है कि वे आत्महत्या का प्रयत्न या चिंतन भी करते हैं।

अब समय आ गया है कि हम यह सोचना बंद कर दें कि ओसीडी केवल एक व्यक्तित्व का विचित्र व्यवहार है।  ओसीडी एक मानसिक विकार है जो तीव्रता से कमजोर बनाता है, चाहे हम अपनी समझ या सहानुभूति प्रदान नहीं कर सकते, पर कम से कम उन लोगों का मज़ाक ना उड़ाएं जिनका जीवन इससे वास्तव में प्रभावित हुआ है।

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