अपनी विकलांगता से परे स्वयं को प्रेम करना

कई बार ऎसी स्थिति आती है जब हम स्वयं को आईने में देखते हैं और प्रतिबिंब के रुप में कुछ और चाहते हैं। काश मेरी ऊंचाई अधिक होती, वजन कम होता, रंग गोरा होता, बाल मोटे होते, आंखे बड़ी होती आदि। यह सोच बड़ी सामान्य है और हममें से अधिकांश के साथ जीवन में यह होता है, खासकर हमारी बढती उम्र के साथ। यही सोच, किसी विकलांग व्यक्ति के लिये और भी जटिल हो सकती है क्योंकि वह असामान्य है। स्वयं परिपूर्ण न होने की भावना, विकलांग होने और एक तरीके से सामाजिक सौन्दर्य के ढ़ांचे में फिट न हो पाने का दर्द उन्हे हमेशा होता है। इसके कारण व्यक्ति का आत्मविश्वास और शरीर की छवि के कारण स्वयं के बारे में दृष्टिकोण सीमित हो सकता है।

ऑर्थोपीडिक विकलांगता से ग्रस्त बच्चे के रुप में, मुझे मेरे माता पिता द्वारा इस प्रकार से पालन पोषण दिया गया कि मैं सार्थक हूं, मैं बेहतर हूं और मुझे भी याद है कि मैने कभी किसी बात की चिन्ता नही की। ठीक है यदि मैं अलग हूं, मैने इसे गर्व के रुप में लिया। लेकिन किशोरावस्था के दौरान, मुझे इस अन्तर को समझने की शुरुआत हो चुकी थी। खेलों में मेरा भाग लेना संभव नही था, मेरा वजन बढ़ रहा था, मेरी ऊंचाई कम थी और कहीं से भी सौन्दर्य की परिभाषा में फिट होना मेरे लिये संभव नही था। मेरे दिखाई देने संबंधी कोई भी टिप्पणी मुझे आश्चर्य से भर देती थी। मेरे मन में एक बात घर कर गई थी कि मुझे कोई भी, कभी भी किसी भी तरह से पसंद नही कर सकता। वैसे प्रत्येक अन्य पहलू पर मेरा प्रदर्शन और आत्मविश्वास बेहतर था, लेकिन शरीर की छवि को लेकर हमेशा ही समस्या रही। यह स्थिति बहुत ज्यादा देखभाल और बिल्कुल देखभाल नही की परिस्थिति के मध्य झूलती सी रही। मेरी किशोरावस्था का एक दौर था जब निरंतर आहार नियंत्रण, भूखे रहना और व्यायाम करना ही मेरे जीवन का लक्ष्य था। फिर अचानक मुझे बहुत भूख लगती और आहार नियंत्रण धरा का धरा रह जाता। फिर वजन बढ़ता और मेरा अवसाद भी, और स्वयं पर ही दोषारोपण होता कि यह मेरे साथ कैसे हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में ही यह संभव हो पाया है जबसे मैने स्वयं से यह कहना प्रारंभ किया है कि मेरा दिखाई देना ठीक है, इससे कोई समस्या नही है और अब मैने इसे सामान्य रुप में स्वीकार किया है। मुझे नही लगता कि यह सोच पूरी तरह से खत्म हो चुकी है लेकिन पहले की तुलना में, प्रगति तो है। आजकल ज्यादा शांति मिलती है, सहज ही ज्यादा आत्मविश्वास भी मिलता है। यह वाकई एक कठिन यात्रा है – स्वयं को अपनी त्रुटियों के साथ स्वीकार कर लेना वाकई कठिन है। विकलांगता के कारण यह सोच भी पक्की हो जाती है कि आप कितनी भी मेहनत कर लें, आपका वजन कम नही हो सकता। और हमें आश्चर्य होता है कि कोई और इस दर्द से गुज़रना चाहता है। मुझे आखिर किसे और क्या सिद्ध करना है?

स्वयं के शरीर को लेकर नकारात्मक छवि रहने का अर्थ है वास्तविकता में जो सौन्दर्य मौजूद है, उसे नकारना। नकारात्मकता मेरी दृष्टि में सकारात्मकता से आगे चली जाती है। कोई विकलांग व्यक्ति को स्वयं को निरंतर अपने सकारात्मक गुणों के बारे में बताते रहना होता है (जहां तक दिखाई देने का प्रश्न है), इसमें प्रतिक्रिया का स्तर ऊंचा होता है और व्यक्ति कई बार इससे लाभ नही प्राप्त कर पाता है। मीडिया द्वारा जिस प्रकार से सौन्दर्य और विकलांगता को सामने रखा जाता है, उससे इस मुद्दे को और बल मिलता है, बहुत ही कम अभिनेता हैं जो स्वयं विकलांग है और सौन्दर्य तथा विकलांगता एक साथ बहुत ही दुर्लभ है। इसके आगे, आप किस लिंग के है यह भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है – यदि आप विकलांग महिला हैं, तब आपको सामाजिक स्तर पर आदर्श शरीर के मापदन्ड पर खरा उतरना मुश्किल हो जाता है, यह मुद्दा आगे चलकर बहुत ज्यादा संवेदनशील हो जाता है। इसी प्रकार से सोच यौन व्यवहार को लेकर भी होता है। विकलांग व्यक्तियों को यौन वस्तु के समान मान लिया जाता है और उनकी स्वयं की अपने शरीर को लेकर इच्छाएं काफी सीमित मानी जाती है। इसके कारण शरीर को एक ऎसा साधन मान लिया जाता है जो सिर्फ सुविधा या कर्म के लिये है और इससे कोई आनंद या जीवन जैसी स्थिति नही बन सकती।

यदि किसी को किसी कारण से विकलांगता आती है, तब इस अचानक होने वाले नुकसान के अनुभव को जीना और शरीर को सकारात्मक बनाकर रखना वास्तव में एक चुनौती होती है। वह समय जब व्यक्ति विकलांगता को स्वीकारता है, काफी जटिल होता है, व्यक्ति को इस दुख से बाहर निकलने में बहुत संघर्ष और समय की जरुरत होती है कि वह यह स्वीकार कर सके कि यह सब सामान्य है।  

अधिकांश स्थितियों में, विकलांग व्यक्ति को उसके शरीर से संबंधित जो टिप्पणियां मिलती हैं, उनमें भरपाई या मुआवजा जैसा स्वरुप अधिक होता है। “तो क्या हुआ कि तुम्हारे हाथ काम नही करते, तुम्हारी मुस्कान कितनी प्यारी है।“ इस प्रकार के विचारों से व्यक्ति का आत्मविश्वास कम होता है और उसे विकलांग होने का दर्द और अधिक सालता है।

शरीर और उसकी छवि को लेकर अक्सर कुछ प्रश्न होते हैं जो कि मुख्य रुप से दृष्टिबाधितों को किये जाते हैं : क्या उन्हे महसूस होता है, क्या उन्हे यह स्बा पता है। व्यक्ति को यह समझना चाहिये कि शरीर की छवि केवल उसके भौतिक स्वरुप में ही नही होती है। शरीर की छवि विविध प्रकार से प्रभावित होती है: प्रत्येक इन्द्री द्वारा हमारे शरीर को कैसे महसूस किया जाता है – स्पर्श, श्रवण, हलचल आदि। इन सभी अनुभूतियों का एक संयुक्त स्वरुप मिलकर हमारे शरीर की छवि को तैयार करता है।

यह सही है कि एक विकलांगता से ग्रस्त व्यक्ति के लिये सकारात्मक शारीरिक छवि को तैयार कर पाना कठिन होता है, लेकिन यह असंभव नही है। इसका हल मौजूद है व्यक्ति के आस पास के मदद करने वाले तंत्र पर और व्यक्ति किस परिवेश में है इसपर भी। परिवार और मित्रों द्वारा यह जोर दिया जाना चाहिये (बिना सहानुभूति और न किसी प्रकार के एहसान आदि के भाव के बिना) कि व्यक्ति वास्तव में जैसा है, बेहतर है। विकलांग बच्चों के लिये यौन स्थिति और सोच को लेकर काम किया जाना चाहिये, अक्सर उनमें से अधिकांश को इस बारे में कोई जानकारी नही दी जाती और विकलांग व्यक्तियों द्वारा यह कहा जाता है कि लोगों का कोई विश्वास ही नही है कि उनका भी सक्रिय यौन जीवन मौजूद है, उनका भी साथी है और वे आगे नकारात्मक शारीरिक छवि से छुटकारा पा सकते हैं। यह सही है कि वास्तव में स्वयं को लेकर गर्व कर पाना, स्वयं व्यक्ति पर निर्भर करता है लेकिन कुछ अन्य बातें भी मदद तो करती है। लेकिन इस संबंध में सकारात्मक शारीरिक छवि को लेकर कौन से ठोस कदम उठाए जाने चाहिये? मुंबई की सायकोलॉजिस्ट श्रेया श्रीधरन म्हात्रे यह बताती है कि शरीर संबंधी छवियां कैसी होती हैं और वह हमें कुछ बिन्दु देती हैं कि कैसे हम इस संबंध में सकारात्मकता के साथ शुरुआत कर सकते हैं।

मधुमिता वेंकटरमन एक मानव संसाधन व्यवसायी हैं साथ ही विविधता संबंधी अभ्यासक हैं।