दास्तान: विमान में चढ़ने के विचार से ही उन्हें अत्यधिक घबराहट होने लगती थी....

फ़ोबिया का इलाज संभव है, उन्हें अपनी ज़िंदगी पर हावी न होने दें

शांता हेगड़े अपनी बहन के साथ मनोचिकित्सक से मिलने गईं. आखिरी मिनट में उन्हें राजस्थान के लिए अपनी छुट्टी को रद्द करना पड़ा था. इसकी वजह ये थी कि शांता ने विमान पकड़ने के लिए हवाई अड्डे जाने से मना कर दिया था.

वह डॉक्टर के कमरे में उदास बैठी थीं और शर्मिंदा महसूस कर रही थीं. उन्हें ये बात बहुत ख़राब लग रही थी कि उनकी बहन की यात्रा उनकी वजह से टल गई थी. शांता ने बताया कि न्यूयार्क की जुड़वां इमारतों में विमान हमले के बाद और उसके बाद भी जब तब हुए विमान हादसों के बाद वह विमान पर चढ़ने से बहुत डर गई थीं. उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने कई और यात्राएँ भी खारिज कर दी थीं, कुछ यात्राओं में परिवार के सदस्यों से मिलने जाना था, कुछ यात्राएँ अपने पति के साथ करने वाली थीं. उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि अपने डर के बारे में उन्होंने अपनी बहन को कभी नहीं बताया था जिसकी वजह से वह विमान से सफ़र नहीं कर पा रही थी.

शांता ने बताया कि वैसे वे उदास और चिंतित नहीं रहती थीं और अपनी ज़िंदगी से संतुष्ट थीं. उनके बच्चे अपनी ज़िन्दगी अच्छे से बिता रहे थे और उनके पति नौकरी से रिटायर हो चुके थे.

उन्होंने बताया कि रिटायर होने के बाद उनके पति और उन्होंने ये तय किया था कि वे ख़ूब घूमेंगे. लेकिन अब, विमान पर चढ़ने का ख़्याल भी उन्हें बुरी तरह व्यग्र कर देता है और वे हर समय पसीने से भीग जाती हैं. पहले, विमान में जाते हुए वो बहुत ज़्यादा आशंकित होने लगती थी और पैनिक करने लगती थी. उन्होंने स्वीकार किया कि पहले की अपेक्षा अब उन्हें ज़्यादा डर लगता है.

मनोचिकित्सक ने उनके साथ और समय बिताया और ये जानने की कोशिश की कि शांता को असल में समस्या क्या है. उसने शांता के विकार की पहचान विशेष डर यानि स्पेसेफ़िक फ़ोबिया के रूप में की. ये फ़ोबिया था, उड़ान का. उसने उन्हें यकीन भी दिलाया कि इसका इलाज संभव है.

क्लिनिक के काउंसलर ने शांता के साथ कई सप्ताह बिताए और उन्हें धीरे धीरे उड़ान के डर से निकलने में मदद की. कुछ महीनों की थेरेपी के बाद वे विमान में सफ़र को लेकर अपेक्षाकृत रूप से आश्वस्त महसूस कर रही थीं. शांता और उनके पति ने दिल्ली यात्रा की योजना बनाई और शांता ने विमान में सफ़र किया. उन्हें हल्कीफुल्की घबराहट ज़रूर हुई अन्यथा उनका सफ़र आरामदायक रहा. एक बार बगैर समस्या के उन्होंने विमान से यात्रा कर ली तो आगे की उड़ानों मे जाते हुए उनका डर और कम होता चला गया.

थेरेपी पूरा करने के छह महीने बाद उन्होंने अपने काउंसलर को बताया कि वे बेहतर हैं और भारत भर में विमान से यात्राएँ कर रही हैं.

ये दास्तान,मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मददसेतैयार किया गया है.बहुत सारे मरीज़ों के लक्षणों और विवरणों के आधार पर इसे तैयार किया गया है.ये दास्तान किसी एक ख़ास व्यक्ति की नहीं है बल्कि ये इस तरह के चिंता रोग से पीड़ित किसी भी व्यक्ति की दास्तान का प्रतिनिधित्व करती है.

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