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प्रसवोत्तर अवसाद। हाँ, मैं इसी बारे में बात कर रही हूँ। और नहीं, मैं शर्मिंदा नहीं हूं।

यदि आपने फेसबुक पर मेरी और मेरे बच्चे की तस्वीरें देखी हैं, और आपको लगता है कि मेरा प्रसव परिपूर्ण होने के साथ ही गर्भावस्था खुशनुमा थी, तो यह लगभग एक सच होने वाले सपने जैसा होता।

लेकिन वह तस्वीर सच से दूर है। मैं अपनी अंतिम तिमाही में गंभीर प्रसवपूर्व अवसाद और एक समान रूप से गंभीर प्रसवोत्तर अवसाद (पीपीडी) से पीड़ित थी।

यह मुझे इतना दूर ले गया था, जिससे मुझे सामान्य रुप में लौटने में काफी समय लगा। समान रुप से यह तय करने में भी मुझे उतना ही लंबा समय लगा कि मुझे इसके बारे में लिखना चाहिए। लेकिन मैं पीपीडी के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए अपनी कहानी साझा करना चाहती हूं। नहीं, मैं शर्मिंदा नहीं हूं। पीपीडी इस ग्रह पर किसी भी महिला के साथ हो सकता है। यह बिना किसी चेतावनी के आता है, और हम इसका सामना करने के लिए तैयार नहीं होते हैं।

जब मैं गर्भवती थी, तो मैं दक्षिण अफ्रीका में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम कर रही थी। मुझे किसी प्रकार की समस्या नहीं होने का कोई कारण नहीं था। मेरी गर्भावस्था के आखिरी तिमाही में, मैं हैदराबाद चली गई, ताकि मैं वहां बच्चे को जन्म दे सकूं। रवि, मेरे पति, मेरे साथ हैदराबाद आए, यह एक छोटा अवकाश था और सामान समेटने हम वापस जोहान्सबर्ग चले गए। मैं आराम करने और इस पक्ष का आनंद लेने की उम्मीद में थी, और उत्साहित थी, लेकिन जोहान्सबर्ग से हैदराबाद की यात्रा ने मुझे सूजन भरे पैर और थकान से भर दिया और मैं लगभग एक महीने तक अस्वस्थ रही।

माता-पिता के घर में रहने के दौरान, मुझमें अवसाद की शुरुआत हुई। नींद की कमी ने मुझे निराश कर दिया। मुझे अक्सर आश्चर्य होता था कि मैं सो क्यों नहीं पाती थी। मैं घर पर ऊब गई थी। मैं बाहर यात्रा नहीं कर सकती थी, क्योंकि मुझे नहीं पता था कि कैसे ड्राइव करना है। शहर के यातायात के साथ आबोहवा के बदलाव ने मुझे चिंतित कर दिया था। मेरी भूख कम होने के साथ मेरी सहनशक्ति भी कमजोर पड़ गई थी, लेकिन मुझे लगा कि यह मेरे हार्मोन्स के कारण था, और सामान्य बात थी। मुझे अपने आठवें महीने में एहसास हुआ कि यह हार्मोनल तो था, लेकिन निश्चित रूप से सामान्य नहीं था।

मुझे लगा कि मेरा दिमाग अब मेरे नियंत्रण में नहीं था। मैं एक अलग व्यक्ति की तरह महसूस कर रही थी, एक ऐसा व्यक्ति जो असल में मेरे जैसा नहीं था। मुझे कुछ ऐसा लगने लगा था कि मुझे कुछ हो रहा है, और इसे रोकने में, मैं लाचार थी। मैं न तो सो सकती थी, न खा सकती थी, लगातार बेचैन, चिंतित और दुखी थी-और इसे बिल्कुल समझ नहीं सकती थी। मैं अपने पति से दूर रहने के कारण भी असुरक्षित महसूस कर रही थी। जब स्थिति असहनीय हो गई, तो मैंने अपनी दाई से संपर्क किया और उसे बताया कि मैं किस हालात से गुजर रही हूं। यह सिर्फ मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक नहीं था, यह शारीरिक भी था, मेरे हाथों और पैरों की नसों में कमजोरी का मतलब था कि मैं नियमित कार्यों को पूरा करने के लिए खड़ी रहने या काम करने में सक्षम नहीं थी। मुझमें बिस्तर से बाहर निकलकर अपनी बोरियत को कम करने की भी ताकत नहीं थी।

हम में से ज्यादातर मानते हैं कि गर्भावस्था और प्रसव एक महिला के जीवन में 'सुखद' क्षण होने चाहिए। और यदि कुछ इससे अलग होता है, तो कोई भी इसके बारे में बात नहीं करना चाहता। समाज के डर के कारण कि आपको एक असहाय महिला के रूप में देखा जाता है, जिसे सहानुभूति की आवश्यकता है। हम अपनी भावनाओं को छुपाते हैं।

मैं ऐसा नहीं चाहती थी, इसलिए मैंने अपनी दाई से बात करने का फैसला किया कि मुझ पर क्या गुजर रही थी। वह दयालु थी और मुझे उसके शब्दों से सांत्वना मिली। उसने मेरे आने और उससे बात करने के लिए मेरे साहसी दृष्टिकोण की सराहना की, क्योंकि अधिकांश महिलाएं ऐसा नहीं करती हैं। उसने मुझे बताया कि पीपीडी एक स्पेक्ट्रम है और लगभग 80 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को विभिन्न स्तरों पर इसका अनुभव होता है। मैं यह समझने में असमर्थ थी कि मुझे प्रसवपूर्व अवसाद था, एक अवस्था जिससे कई अन्य महिलाएं भी गुजरती हैं।

निदान के लिए मेरी मां पूरी तरह से तैयार नहीं थी। वह मेरे व्यवहार में इन परिवर्तनों को समझने के लिए संघर्ष कर रही थी, क्योंकि यह ऐसा कुछ था, जिसे उसने अपने जीवन में न कभी देखा या सुना था। समझ की कमी का सामना करने के कारण, मैं और अधिक निराश हो गई थी।

मैं खुश रहना चाहती थी और अपने छोटे बच्चे का स्वागत करना चाहती थी। मैं इस बारे में डर गई थी कि मैं जिस अवस्था में हूं, उसमें मैं अपने बच्चे की देखभाल कैसे करूंगी। यह शुद्ध नर्क था। रवि ने अपनी यात्रा को समय से पहले पूरा किया और जल्दी लौट आया। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि मेरे पास कौन है और उसने मुझसे क्या कहा, मैं अत्यंत दुखी महसूस कर रही थी। मुझे मूर्खतापूर्ण चीजों पर तर्कहीन डर था। मेरे साथ लगातार ऐसे वाकिए हुए जहां मैं कुछ मिनट के लिए शून्य हो गई थी।

मेरा प्रसव एक पूर्ण अनुभव की तरह प्रतीत हो रहा था। मुझे कोई दवा नहीं दी गई थी। लेकिन मानसिक रूप से, मैं कहीं और थी। यह तब था जब मेरी दाई ने सुझाव दिया कि मैं नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास जाऊं। दुर्भाग्यवश, उसने जिसकी सिफारिश की वह शहर से बाहर थी, इसलिए उसने मुझे शहर की एक और बुजुर्ग व्यक्ति का सुझाव दिया।

मैं उस समय स्तनपान करा रही थी और मेरा शरीर उपचार की प्रक्रिया में था। लेकिन मुझे उनसे परामर्श करना पड़ा। उन्होंने मुझे सुना और मुझे मनोवैज्ञानिक परीक्षण कराने के लिए कहा। मुझे अपने बच्चे को कार में अपनी मां के साथ छोड़कर परीक्षण कराना पड़ता था और कभी-कभी उसे दूध पिलाने के लिए वापस आना पड़ता था।

मुझे इलाज के बारे में पता नहीं है, लेकिन डॉक्टर के पास जाना अक्सर आपको कमतर महसूस करा सकता है। मुझमें प्रसवोत्तर अवसाद के लक्षण पाए गए थे। उन्होंने मांसपेशी के विश्राम के लिए दो सत्रों की सिफारिश की- कुछ प्रकार की पुर्नस्थापनात्मक योग तकनीक। मैंने उनसे विनती की कि मुझे शांत होने के लिए दवा दी जाए, लेकिन उन्होंने स्तनपान कराने के आधार पर इनकार कर दिया। उन्होंने मुझे इसे भगवान से प्राप्त दंड के रूप में सोचने और छह महीने तक सहन करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि एक मां के रूप में मेरा कर्तव्य मुझे होने वाले दर्द के मुकाबले ज्यादा महत्वपूर्ण है और कोई सुधार नहीं होने की दशा में मुझे छः महीनों के बाद वापस आने के लिए कहा।

मैं निराश थी, मैं बहुत दर्द में थी और उससे दूर जाना चाहता थी, लेकिन मैं दवा से डर गई थी और सोच रही थी कि अगर मैंने इसे लेना शुरू किया, तो मुझे इसे जीवनभर लेना होगा। मैं चिंतित थी कि दवाएं मुझे सुस्त बना देंगी और मैं अपनी बेटी की देखभाल नहीं कर पाऊंगी। मैंने कठिन मार्ग लेने और स्वाभाविक रूप से बेहतर होने का फैसला किया। दक्षिण अफ्रीका लौटने के बाद ही मैंने स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए सुरक्षित दवा के अस्तित्व के बारे में सीखा। जब मैं इसके बारे में सोचती हूं, तो यह मेरे लिए आसान होता, अगर मैंने दवा ले ली होती।

हम एक समाज के रूप में मानते हैं कि गर्भावस्था बहुत खुशी का समय है। हम यह स्वीकार नहीं करते हैं कि गर्भावस्था हमें परेशान भी कर सकती है क्योंकि हम जो जिम्मेदारी लेते हैं उसके बारे में सोचते हैं। कभी-कभी, तनाव बहुत अधिक हो जाता है। कई महिलाएं प्रसवपूर्व और प्रसवोत्तर अवसाद से गुजरती हैं। लेकिन हर कोई कलंक लगने के डर की वजह से डॉक्टर के पास जाने का विकल्प नहीं चुनता है। मैंने पहुंचने का फैसला किया, और फिर भी, यह एक बहुत भ्रमित अनुभव था। मैं असहाय थी और मुझे कोई मार्गदर्शन नहीं मिल पाया था।

बेहतर होने के लिए मुझे डिलीवरी के बाद डेढ़ साल लग गए। यह एक लंबी, कठिन और चुनौतीपूर्ण यात्रा थी। इसके अंत में, हालांकि, मैं थोड़ी देर के लिए अपने अनुभव को साझा करने के बारे में अनिश्चित थी, और आखिरकार इसे शब्दों में रखने के लिए साहस जताया, ताकि यह दूसरों की मदद कर सके।

पूर्णा कौमुदी वोगेती एक सॉफ्टवेयर पेशेवर है और जोहान्सबर्ग,दक्षिण अफ्रीका में रहती हैं। उनके शौक में कला,संगीत और ब्लोगिंग शामिल हैं।