बुजुर्गों को नींद की समस्याओं का सामना क्यों करना पड़ता है?

बुजुर्गों में नींद की समस्याएं असामान्य नहीं हैं। वास्तव में, 60 वर्ष से अधिक उम्र के अधिकांश लोग अलग-अलग दर्जे की नींद की समस्याओं से ग्रस्त हैं। हालांकि यह उम्र बढ़ने की प्रक्रिया का एक स्वाभाविक हिस्सा है, पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण नींद की कमी बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण में गंभीर रूप से हस्तक्षेप कर सकती है। यह समझने के लिए कि नींद आपके कल्याण में क्या भूमिका निभाती है, सबसे पहले नींद को समझते है।

नींद क्या है?

नींद एक व्यवहारिक और शारीरिक स्थिति है जिसमें हमारे आंतरिक अंग काम करते हैं, पर हम सक्रिय रूप से हमारे आस-पास की दुनिया पर परस्पर प्रभाव नहीं डालते हैं। नींद के दौरान, हमारा शरीर प्रोटीन को संश्लेषित करता है, जगे हुए समय के दौरान उत्पादित विषाक्त पदार्थों को निष्कासित करता है, न्यूरोट्रांसमीटर को संश्लेषित करता है, तंत्रिका नेटवर्क बनाता है और मरम्मत करता है। जागते रहने के दौरान हमारे माहौल के साथ कुशल और निरंतर रूप से पारस्परिक जुड़ाव को सुनिश्चित करने में नींद की गुणवत्ता की भूमिका अहम है।

औसत व्यक्ति के लिए 6-8 घंटे की नींद जरूरी होती है ताकि वह फिर से तरोताजा हो जाये और नए दिन के कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर सके। अधिकांश वयस्कों के लिए यह सच है कि एक व्यक्ति की नींद की गुणवत्ता और मात्रा उनके जीवनशैली, नींद से संबंधित विकार और उम्र से प्रभावित हो सकती है।

उम्र का नींद पर क्या प्रभाव पड़ता है?

हमारे शरीर में अधिकांश कार्यों की तरह, नींद की गुणवत्ता और संरचना उम्र के साथ कम कुशल हो जाती है। अगर हम नींद के विज्ञान को देखते हैं, तो हम समझ सकते हैं कि दो अलग-अलग प्रकार की नींद हैं - आरईएम (रैपिड आई मूवमेंट) और एनआरईएम (नॉन-रैपिड आई मूवमेंट) नींद। एनआरईएम पुनर्स्थापनात्मक अवधि है जब हमारे शरीर की मरम्मत होती है। यह कई शारीरिक कार्यों, जैसे हार्मोन के सृजन और निष्कासन के साथ भी जुड़ा हुआ है।

सबसे पहले एनआरईएम नींद उम्र से जुड़े परिवर्तनों के प्रति अतिसंवेदनशील होती है, खासकर पुरुषों में। "60 वर्ष की आयु तक, एनआरईएम नींद, जो पुरुषों में 15% तक होती है, घट कर 3-4% तक आ जाती है। महिलाओं में उच्च एस्ट्रोजन स्तर की उपस्थिति से उनमे यह प्रक्रिया धीमी हो जाती है," ऐसा डॉ बिंदू कुट्टी का कहना है, जो निमहांस में न्यूरोफिजियोलॉजी विभाग में प्रोफेसर है।

एनआरईएम नींद, विशेष रूप से धीमी लहर की नींद (या गहरी नींद), उम्र के साथ-साथ काफी कम हो जाती है। इससे एक व्यक्ति के सन्लग्न नींद लेने की क्षमता प्रभावित होती है। इसी चरण के दौरान हमारी यादें समेकित होती हैं - और एनआरईएम नींद की कमी स्मृति को प्रभावित कर सकती है। उम्र के साथ, सिकार्डियन रिदम में भी एक समग्र परिवर्तन होता है, जिसका अर्थ है सोने के समय की कूल मात्रा कम हो जाती है और लगातार जागने से नींद की निरंतरता प्रभावित होती है। उम्र से जुड़े हार्मोन कार्यों में, विशेष रूप से विकास हार्मोन, मेलाटोनिन और कोर्टिसोल, नींद की गुणवत्ता और कार्य को प्रभावित करते हैं।

नींद के आठ घंटो में, दो घंटे आरईएम (रैपिड आई मूवमेंट) नींद के लिए होते हैं। यह 70 साल की उम्र तक बहुत प्रभावित नहीं होती है, लेकिन इस उम्र के बाद ज्यादातर लोग खंडित आरईएम नींद का अनुभव करते है।

बार-बार टूटती नींद मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को कैसे जन्म देती है?

"लगभग 15% वृद्ध लोग अनिद्रा से पीड़ित है," डॉ बिन्दु कुट्टी समझाते हुए कहती हैं कि अनिद्रा में नींद आने और नींद के बने रहने, दोनों समस्या शामिल है। औसत नींद विलंबता (नींद आने के लिए आवश्यक समय) आमतौर पर 15 मिनट होती है, लेकिन अनिद्रा से पीड़ित व्यक्तियों के लिए, यह समय लम्बा होता है। इसके परिणामस्वरूप मिजाज में परिवर्तन हो सकता है, जो उनके परिवार के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

अक्सर, अनिद्रा वाले लोग अपनी नींद के बारे में चिंता करना शुरू करते हैं, जिससे यह स्तिथि और खराब हो जाती है। स्थायी अनिद्रा अवसाद, उत्कंठा और चिंता, भय और अशांत मनोदशा का कारण बन सकती है।

लेकिन यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि नींद के मुद्दे युवा पीढ़ी को भी पीड़ित करते हैं जो एक 24/7 जीवनशैली जीते है जिसमें वे लगातार सक्रिय रहते हैं। गैर-संक्रमणीय बीमारियां, जो निरंतर वृद्धि पर हैं, नींद की कमी के साथ-साथ उत्पन्न होती हैं। वास्तव में, दुनिया की 10%-30% आबादी नींद से वंचित मानी जाती है।

समाधान क्या है?

जबकि बुजुर्गों में नींद के मुद्दे बड़े पैमाने पर जैविक कारणों से होते हैं, कुछ ऐसे अभ्यास होते हैं जो नींद की गुणवत्ता में सुधार कर सकते हैं।

व्यायाम और योग: उम्र बढ़ने के दौरान कोर्टिसोल की वृद्धि और मेलाटोनिन की कमी योग, व्यायाम और ध्यान द्वारा नियंत्रित की जा सकती है। ध्यान नींद की गुणवत्ता में वृद्धि कर सकता है और नींद के जीवतत्व का भी ख्याल रख सकता है।

नींद आरोग्यशास्र:

• मानव जाती की दिवाचर प्रकृति है और इन्हे आदर्श रूप से दिन में जगे रहना चाहिए।

• दिन में झपकी से बचें और रात के दौरान अपने नींद के समय का सम्मान करें। अपने दिमाग को प्रशिक्षित करें कि आपका बिस्तर केवल रात में सोने के लिए है। इसका मतलब यह भी है कि आपको सभी गैजेट अपने बेडरूम के बाहर छोड़ देने चाहिए। उचित नींद और जागने का समय बनाए रखना जरुरी है जो और इससे सिस्टम को ठीक से काम करने में मदद मिलती है।

• शाम को शराब और कैफीन से बचें क्योंकि ये नींद में हस्तक्षेप करते हैं।

• शाम में सुस्ताने की कोशिश करें और दिन ख़त्म होने के साथ खुद को आराम देना सीखें।

इस लेख को निमहांस में न्यूरोफिजियोलॉजी विभाग की प्रोफेसर डॉ बिंदु कुट्टी से प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखा गया है।