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भारत में दीर्घकालिक दर्द के लिए सपोर्ट ग्रुप्स की अत्यधिक आवश्यकता है

तीन महीने से अधिक समय तक रहने वाले किसी भी दर्द को दीर्घकालिक दर्द के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। इसकी वजह कोई चोट, चिकित्सकीय कदाचार या बीमारी हो सकती है। जिन मामलों में दर्द का कारण कोई बीमारी या दिखने वाली चोट न हो, उन मामलों को चिकित्सक अक्सर यह कह के बर्खास्त कर देते हैं कि बीमारी 'सिर्फ आपके दिमाग में है'। पुराने दर्द से पीड़ित कई मरीज गलत निदान का लम्बा और तनाह रास्ता तय करते हैं। उन्हें अपनी स्थिति को सही ढंग से पहचानने और इस से उभरने के तरीके को समझने में अक्सर लम्बा समय लग जाता है।

एक अदृश्य बीमारी शारीरिक पीड़ा के अलावा - अलगाव की भावना को जन्म देती है। आपके आसपास के लोग यह नहीं समझ पाते हैं कि आप किस पीड़ा से गुजर रहे हैं। इस दर्द के साथ दु:ख, असहायता और अवसाद की भावनाएं जुड़ी होती है। इससे खुद को दूर करना मुश्किल होता है।

भारत में दीर्घकालिक दर्द से पीड़ित युवाओं की आबादी बढ़ रही है। जब उनके परिवार, दोस्त और डॉक्टर मदद करने में असमर्थ हो जाते हैं, तब इनमें से कई उत्तरजीवी इंटरनेट पर सहायता और एकजुटता की तलाश करते हैं।

 क्रॉनिक पैन इंडिया एक ऐसा समर्थन समूह है जो व्यक्तिगत कहानियों को एकजुट करके पुराने दर्द के साथ जी रहे लोगों के बीच रूचि अनुसार सामान्य मुद्दों पर चर्चा करता है।

यह समूह मार्च 2016 में डॉ अनुभा महाजन के द्वारा एक ट्विटर हैंडल के रूप में शुरू हुआ। डॉ महाजन जो की फरीदाबाद, दिल्ली में एक दंत चिकित्सक हैं, जटिल क्षेत्रीय दर्द सिंड्रोम और केंद्रीकृत दर्द सिंड्रोम से पीड़ित हैं। यह दर्द एक डॉक्टर की गलती के कारण शुरू हुआ था। क्रॉनिक पैन इंडिया वेबसाइट पर प्रकाशित इस पोस्ट में वह बताती हैं कि कैसे पुराने दर्द से पीड़ित एक दूसरी महिला के अपनी यात्रा की कहानी साझा करने से उनके दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण रूप से बदलाव आया।

"इस घटना ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि भारत में मेरे जैसे और कितने लोग होंगे जो अपने व्यक्तिगत संघर्षों से मानसिक और शारीरिक रूप से जूझ रहे हैं" वह कहती हैं। "समझे न जाने का अकेलापन होने के बावजूद जीवन में आगे बढ़ते रहना है।"

एक हालिया अध्ययन में (836 नमूने चुने गए थे) - 19.3 प्रतिशत लोग दीर्घकालिक दर्द से जूझ रहे हैं। यह अंक अन्य एशियाई देशों में दर्द की व्यापकता के अध्ययनों की तुलना में अधिक है।

क्रॉनिक पैन इंडिया समूह ने कई लोगों को सशक्त किया है (इसके फेसबुक ग्रुप में 106 लोग शामिल हैं)। डॉ महाजन कहती हैं, “शुरू में मेरे संपर्क में आने वाले ज्यादातर लोग अपने जीवन से उम्मीद छोड़ चुके थे या अपनी नौकरी छोड़ चुके थे और डॉक्टरों पर बिलकुल भी विश्वास नहीं बचा था। लेकिन समय के साथ जितना अधिक हम एक दूसरे से जुड़ते गए और अपनी कहानियों को साझा करते गए, उतने ज्यादा लोग इस समूह से लाभान्वित हुए और उनके अकेलेपन का एहसास कम होने लगा।"

नम्रता एक 34 वर्षीय लेखिका है जो निवेश बैंकिंग की नौकरी किया करती थी। 2014 में उसका हाशिमोटो, एक ऑटोइम्यून विकार का निदान किया गया था। इस बीमारी में थायरॉयड ग्रंथि की तरफ निर्देशित किये गए एंटीबॉडी से सूजन होता है। वह इस निदान को अपने कैरियर के चरम के दौरान मिले एक 'रूड वेक-अप कॉल' (ऑटोइम्यून बीमारियों के बारे में जागरूकता की कमी के कारण) के रूप में वर्णित करती हैं।

वह बताती हैं कि कैसे क्रॉनिक पैन इंडिया का एक हिस्सा होने के कारण उसे बीमारी से जन्मी सीमाओं को स्वीकार करने में मदद मिली, “टीम के सदस्यों के साथ मेरी बातचीत से मुझे एहसास हुआ कि ठीक न होना ठीक है। हम रोजमर्रा की जिंदगी में एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहे हैं। हमारा संघर्ष इन सब के बावजूद आगे बढ़ते रहना है और मेरा कहा मानें, यह संघर्ष वास्तविक है।” वह अब अपने घर से एक स्वतंत्र संपादक और लेखिका के रूप में काम करती है।

डॉ दीपाली एस अजिंक्य - चिकित्सक, मनोचिकित्सक, नैदानिक ​​सम्मोहन चिकित्सक - का कहना है कि दीर्घकालिक दर्द के रोगी आमतौर पर शारीरिक और मनोवैज्ञानिक मुद्दों की संयुक्त शिकायतों के साथ आते हैं।

"ज्यादातर रोगियों में दर्द और बढ़ जाता है और लंबे समय तक बना रहता है जिससे दर्द दीर्घकालीन हो जाता है" वह साझा करती है। “तीव्र से पुराने होने की इस बिगड़ती प्रक्रिया के दौरान उनका आत्मविश्वास काफी गिर जाता है। उनका काम प्रभावित होता है और उनके लिए अपनी दैनिक गतिविधियों में शामिल होना भी मुश्किल हो जाता है। यह उनके आत्म-सम्मान के लिए गंभीर रूप से हानिकारक होता है। अगर उन्हें ऐसे समय में परिवार या अन्य सामाजिक समर्थनों से कोई सहारा नहीं मिलता है तो उनकी स्थिति और खराब हो जाती है जिससे अवसाद और उत्कंठा पैदा होती है।”

मुंबई में दर्द निवारक चिकित्सक, डॉ महेश मेनन बताते हैं, कभी-कभी एक विशिष्ट घटना - जैसे बीमारी, चोट या सर्जरी - दीर्घकालिक दर्द की शुरुआत करता है। लेकिन वे कहते हैं, "(...) ऐसे लोग हैं जो अपने दर्द के लिए एक विशिष्ट संचालक को याद नहीं कर पाते हैं। दीर्घकालिक दर्द हमारे न्यूरोलॉजिकल हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का एक उपोत्पाद है। इसे आंतरिक और बाहरी कारकों द्वारा संशोधित किया जाता है जिससे दर्द की एक गंभीर अनुभूति होती है जिसका इलाज या उन्मूलन करना मुश्किल होता है।”

अरुण दहिया - क्रॉनिक पैन इंडिया ग्रुप के सदस्य - एक प्राथमिक स्कूल शिक्षक हैं, जिनका इंटरस्टीशियल सिस्टिटिस, फाइब्रोमायल्गिया और मायलजिक एन्सेफलॉयमाईलिटिस का निदान किया गया था। वह कहते हैं, "मुझे उम्मीद है कि भविष्य में इस तरह के और भी सहायता समूह बनेंगें ताकि हम अदृश्य बीमारियों से जुड़े कलंक से लड़ सकें जिससे इन बीमारियों के प्रति आवाज और जागरूकता आ सके। अभी बहुत से पीड़ित लोग इससे अनजान हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि किससे संपर्क किया जाए और कैसे मदद ली जाए।”

दीर्घकालीन दर्द के साथ जी रहे व्यक्तियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है: अपनी बीमारी के बारे में खुल कर बात करने का डर, जिससे नौकरी छूट सकती है या बहिष्करण हो सकता है, बीमारी के इलाज के खर्चे के मौद्रिक मुद्दे..."

क्रॉनिक पैन इंडिया का लक्ष्य नंगी आँखों को दिखाई न देने वाली प्रत्येक दीर्घकालीन बीमारी के लिए जागरूकता बढ़ाना है। वे सामान्य डॉक्टरों को इन स्थितियों से अवगत कराने के लिए अस्पतालों में व्याख्यान और सत्र आयोजित करने की भी उम्मीद करते हैं ताकि वे उन्हें दर्द विशेषज्ञों जैसे चिकित्सकों के पास भेज सकें।

कोशिश यह है कि भारत में एक बार में एक शहर में एक सहायता समूह प्रणाली का निर्माण करना और इनके फायदों को साबित करने के लिए सर्वेक्षण करना। पिछले साल के अंत में पहली बार क्रॉनिक पैन इंडिया की बैठक हुई जिसमें डॉ महाजन ने कई खुशहाल चेहरों की रिपोर्ट दर्ज की।