पार्श्वीकरण का मनोवैज्ञानिक मोल

दिव्या कन्नन

पार्श्वीकरण पीड़ित व्यक्तियों या समूहों को अक्सर समाज में अधिक ओहदे, शक्ति, विशेषाधिकार, और सुविधा प्राप्त व्यक्तियों से कम महत्व, विशेषाधिकार, और सम्मान महसूस होता है या महसूस कराया जाता है. संभवतः उन्हें 'मुख्यधारा' की सोच और व्यवहारिक तरीकों के बाहर माना जाता है. पार्श्वीकरण के उपादान जाति, धर्म, मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति, शारीरिक क्षमता, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, यौन अभिविन्यास, लिंग, लैंगिक पहचान, वजन, आयु और जाति तक सीमित नहीं है. अगर एक व्यक्ति को किसी मायने में कम समझा जाये या उसके लगे कि वह बहिष्कृत है, तो ऐसे नज़रिए और व्यवहार का दीर्घकालिक प्रभाव उसके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है. इस मुद्दे के बारे में लिखने के दौरान मुझे ये ज्ञात है कि, मुझे प्राप्त कुछ विशेषाधिकारों के कारण मैं पार्श्वीकरण के कई पहलुओं से सुरक्षित दूरी पर हूँ.

पार्श्वीकरण का सामना करने वाले लोग तनाव के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं. ऐसे लोगों में मानसिक आघात का प्रसार अधिक होता है और ऐसे तनाव से उबरना, शोषण और/या बहिष्कार के संभावित जोखिम के कारण एक कठिन कार्य बन जाता है. भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर, ऐसे व्यक्ति अपने बड़े समुदायों के सामाजिक संयोजन से अलग महसूस करते हैं और परावर्तक की भावना महसूस कर सकते हैं, जो की इस बात का फलन है कि दूसरे लोग आपको क्या समझते हैं और आपसे कैसा बर्ताव करतें हैं. वे अदृश्य महसूस कर सकते हैं, मानों उनकी चिंताएं इतनी महत्वपूर्ण ही ना हो की उन्हें सुना जाये. ऐसे में अपनेआप पर संदेह करना और निराशा सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाएं हैं. कुछ पार्श्वीकरण के शिकार समूहों में आत्महत्या और आत्म-नुकसान का अधिक जोखिम रहता है.

दुर्भाग्यवश, पार्श्वीकरण की इस प्रक्रिया की शुरुआत युवावस्था में ही हो सकती है. कभी-कभी मेरे लिए ये भयावह हो जाता है जब मेरे कार्यालय में 9 वर्षीय लड़का, जो औरों से अत्यअधिक वजन के कारण धमकाया जाता है, अपने हमउम्र साथियों द्वारा बुलाये गए कई नाम तुरंत बतला देता है. वह यह समझने के लिए बहुत छोटा है कि उसके मित्र उसके साथ ऐसा तुझ व्यवहार क्यों करते हैं, लेकिन इतना भी छोटा नहीं की वह अपने आत्म-मूल्य पर सवाल न उठा सके और अपने फिजिकल एजुकेशन कक्षा के दौरान अयोग्य महसूस न करे क्योंकि उसे प्रतिदिन सामाजिक तौर पर अनुपयुक्त समझा जाता है. अच्छी खबर यह है कि वह मेरे कार्यालय में बैठा है, और इसलिए उसे उस समय सहायता प्राप्त हो रही है जब उसे उसकी जरूरत है. ऐसा बहुतों के साथ नहीं होता, जो वर्षों तक पार्श्वीकरण के शर्म के पीछे छिपे रहते हैं, क्योंकि इसे नजरअंदाज और अनदेखा कर दिया जाता है.

तो, क्या करने की जरूरत है?

जैसा कि आप कल्पना कर सकते हैं, बहुत कुछ करने की जरूरत है, और उन कार्यों को सूचीबद्ध करना इस लेख के दायरे से बाहर है. आरंभ कर सकते है व्यक्तियों, परिवारों, स्कूलों, कार्यालयों, कानून और शासन जैसी व्यवस्थाओं से, जो बच्चों, छात्रों, कर्मचारियों और नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए काम करते हैं। इन तत्वों पर मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कठिनाइयों का सामना करने वाले लोगों के संवेदशील समूहों को पहचानने के लिए स्वयं को शिक्षित करने की ज़िम्मेदारी है। इस पहचान से अलगाववाद और अदृश्यता की भावना को कम करने में मदद मिलती है, और व्यक्तिगत मतभेद वाले लोग अपने अस्वीकृति के अनुभवों को इस उम्मीद और आशावाद के द्वारा नियंत्रित कर सकते हैं कि उनके तात्कालिक वातावरण में कोई है जो उन पर ध्यान दे रहा है, और शायद उनकी बात सुन भी रहा हो.

सबसे बुरा यह हो सकता है कि हम ध्यान ही न दे, या ध्यान देकर भी कुछ न करें. यह महत्वपूर्ण है की  हम अंतःक्रियात्मकता को आदर्श बनाने का प्रयास करें, और यह समझे की किसी व्यक्ति की पहचान के कई पहलु जैसे उसक्के स्वास्थ्य की स्तिथि, जाति, आयु, कामुकता इत्यादि एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि वह एक साथ मिलकर एक जटिल पहचान बनाते हैं. इन कड़ियों की समझ से विकास, बेहतर स्वास्थ्य और अवसर की बाधाओं की पहचान की जा सकती है, जिससे हम ऐसे समाधानों को विकसित करना शुरू कर सकते हैं जो लौकिक नहीं हैं.

दिव्या कन्नन,पीएचडी,संयुक्त राज्य अमेरिका के नैशविल में वेंडरबिल्ट विश्वविद्यालय की नैदानिक मनोवैज्ञानिक हैं,जहां उन्होंने पिछले कई सालों में हिंसा के वयस्क उत्तरजीवियों के साथ काम किया है. वह वर्तमान में बैंगलोर में अभ्यास कर रही हैं.

 

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