सबको पता था कि मैं कसरत नहीं करती, पर इसका कारण वे नहीं जानते थे

अदिशी गुप्ता

कितनी दिलचस्प बात है कि जीवन की तमाम बीती घटनाओं के आधार पर हमारी दिमागी संरचना आकार ले लेती है। कुछ बातें दशकों पहले की हो सकती है, तो कुछ हाल ही में हुई हो, मानों कल-परसों ही। कितनी भी अजीब क्यों न लगे, लेकिन यह बात सच है कि एक बार अगर अतीत की घटनाओ पर  गौर करें , उन्हें स्वीकार कर लें और वर्तमान जीवन पर उनके प्रभाव होने की बात को तव्वजो दें तो यह तय है कि वाकई बीते हुए कल की  बातों का आज पर असर जरूर होता है। यह बात उजागर हुई 'साइकोथेरेपी' में। जीवन में, बीते हुए दिनों में लगी उन चोटों को कुरेद कर देखने कि मैंने कोशिश की।  मैंने पाया कि कुछ घटनाएं बेहद ज़िंदा जान पडती है। अब मैं उनमें स्वयं को कैसे देखती हूं, और उनके आधार पर अपने आप से क्या कहती हूं? मुझे आभास हुआ कि जो घटनाएं  मानस पटल पर  प्रमुख रूप से  गहराई से अंकित हो गई हो, वह दैहिक रूप से भी जीवन में करीबी से जुड जाती है । 

जहां तक मेरी याददाश्त जाती है, मेरा अपने शरीर से रिश्ता बड़ा अटपटा सा रहा है, जो आज तक बरकरार है। दुबली सी लड़की होने के कारण बड़े ही 'निर्दोष' से लगने वाले शब्दों के बाणों की बौछार अक्सर मुझ पर की जाती थी - ' हड्डी', 'हेंगर', 'कंकाल', 'चिपकली' इत्यादि । अलग-अलग तरह के तबीबों के पास अनेकों बार मुझे ले जाया गया, पेट में से कीडे निकालने की दवाइयां भी दी गई थी। पर कुछ भी नहीं बदला था। लिहाज़ा मेरा शरीर जिस तरह का दिखता था, मैं हमेशा से मज़ाक का पात्र बनी रही। खास कर तब, जब मैं उन चीज़ों को करने की कोशिश करती, जिसमें शरीर को स्फ़ूर्ति से हिलाना या मोडना हो। एक बार मैं अपने चचेरे भाई की शादी के दौरान  तैयारियों में लगी थी, तब वहां मौजूद सभी  मेरे शरीर के गठन को लेकर मेरी खिल्ली उडा रहे थे। मुझे 'ह्ड्डियों का पुलिंदा' कह कर हंसते रहे क्योंकि मैं सुडौल नहीं थी। उन दिनों का दस्तूर बन गया था कि मेरे सारे कज़िन्स मिल कर मेरे डान्स वाले विडियो देखते, और जी भर कर हंसतें। जब मैं रोने लगती, तो मुझे 'क्राई बेबी' (रोतलू) बुलाते। यह बात मुझे चुभती। बाकी कई बार मुझसे यह कहा जाता था कि मेरे कपड़े मेरे शरीर पर महज़ लटकाए गए लगते है, क्योंकि मुझमें लोच या लचक नहीं थी। मेरा बदन घुमावदार नहीं था। 

नतीजा यह हुआ कि मुझमें आत्मविश्वास नहीं रहा कि मैं शरीर को फ़ुर्ति से हिलाकर कोई भी काम कर सकूं । मसलन डान्स करना, मैदान में खेल-कूद में भाग लेना, कसरत करना आदि। मुझे तेज़ी से चलना बहुत पसंद था, लेकिन मैं इतमिनान के साथ, अपनी ही रफ़्तार से चलती। 

अपने शरीर को लेकर मुझे तरह तरह की आलोचनाएं सुनने को मिलती रही। यहां तक कि कुछ तो यह भी पूछ लेते कि क्या मेरी मां मुझे खाना देती भी है या नहीं । कुछ इस बात को लेकर मुझे छेडते  (उस वक्त मैं जवान थी) कि मेरे पति को बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा क्यों कि मेरा सीना 'सपाट' था - उभरे हुए स्तन जो नहीं थे। अनेक बार तो बिन मांगी सलाह भी दी जाती। एक तो बडी ही दिलचस्प थी ,''अदिशी, तुम वैसे तो अच्छी लगती हो। अब पेडेड ब्रा पहनना शुरु कर दो, तो सेक्सी भी लगोगी.''

इन सब चीज़ों के साथ-साथ आत्मसम्मान की कमी ने मेरे आत्मविश्वास को और भी ज़्यादा घटा दिया। फिर यौन शोषण की घटनाएं की होने लगी और स्थिति और भी बद्दतर हो गई। अपने शरीर को समझने में नाकामी और इसकी सीमाओं को जान पाने में असमर्थता के कारण मैं उत्पीडन का शिकार हो गई। समय के साथ यह बात मुझे खलने लगी। 

स्कूल के बाद मेरा वज़न अचानक से बढने लगा। काफ़ी हद तक मुझे लगता है कि इस परिवर्तन का कारण था कि मैं अत्यंत बोझल और दुखद ( कुछ छेड-खानी के मामले सहित ) स्कूली जीवन से मुक्त हो गई थी। एकदम से मानों मेरी सेहद को सताने वाले सारे दर्द, देह में हरदम रहने वाली तपन, कमज़ोरी, कंपन जैसी शिकायतें गायब सी हो गई। 

तनाव से भरे उन सालों के दरम्यान मैंने पाया कि मेरा मानसिक स्वास्थ्य अस्थिर हो गया था। वर्ष २०१५ का वक्त सबसे ज़्यादा खराब रहा। काफ़ी लोगों ने सलाह दी कि रोज़ाना कम से कम एक घंटे के लिए मेरे शरीर को कसरत की जरूरत है। उन्हें पता था कि मैं कसरत नहीं करती, पर क्यों नहीं करती, इसका कारण वे नहीं जानते थे। मैं हर रोज़ वॉक पर जाने की कोशिश करती, पर कुछ दिन ऐसे होते जब यह प्रयास भी मुश्किल लगता। इसे सुधारने में मैं ज़्यादा कुछ नहीं कर सकी। 

आते हैं वर्ष २०१७ में। अब मुझे ज़्यादा वज़न की बाबत चिढाया जाता है। अब सलाह दी जाती है कि कसरत करूं वरना बहुत देर हो जाएगी। अब फिर से बड़ी रोचक बातें कही जाने लगी है, जैसे कि 'अचानक किसी ने तुम्हारे शरीर में हवा भर दी है।' कसरत करने की सलाह तो निरंतर आती रहती है। शुक्र है कि अब मेरे परिवारजनों को इस बात को लेकर मेरी असहजता का पता है, इसलिए वे इस बात को टालते है (शुक्र है)। लिहाज़ा मुझे अपनी मानसिक स्थिति के लिए कसरत की अहमियत का पता है। लोगों के नज़रिए से 'सुडौल शरीर ' की वकालत के मैं खिलाफ़ हूं, पर अपने स्वास्थ्य के लिए इसकी ज़रूरत को समझती हूं। इस कारण सदैव ही इस दुविधा में  रहना पड़ता है।

यह सतत संघर्ष है और मेरा मानना है कि यह लगा रहेगा। फ़िर भी जिस तरह से कुछ चीज़ें हमें तोडती है, कुछ है जो हमारी मदद भी करती है। आपका मरहम बनती है। उसे गले लगाइए। उसे साथ ले कर चलिए। नारीत्व पर गौरव, हमदर्द बनकर साथ निभाने वाले ओनलाइन दोस्त और साइकोथेरेपी मेरे लिए मेरे जीने का साधन बन गए हैं। ये सब मुझे सदा याद दिलाते हैं कि खुद की देखभाल बाकी तमाम बातों से ऊपर है। 

यह अभिव्यक्ति 'शारीरिक छवि  और मानसिक स्वास्थ्य ' की श्रंखला का एक हिस्सा है।   #ReclaimOurselves आप इस वार्तालाप को ट्विटर और फेसबुक पर फ़ोलो कर सकते है।

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