कार्यस्थल मानसिक स्वास्थ्य: मिथक और तथ्य

मिथक: मुझे अपने मनोरोगी होने का पता चला है। अब मैं कभी काम पर नहीं जा सकता।

तथ्य: उपचार या थेरेपी के बाद, अपने मनोचिकित्सक या थेरेपिस्ट से इस बारे में पूछना जरूरी है कि आपकी स्थिति में कितना सुधार आया है। वह आपको बताएंगे कि आपकी स्थिति काम पर वापस जाने लायक है या नहीं। ब्रेक के बाद काम पर लौट रहे व्यक्तियों को सलाह दी जाती है कि आप सक्रिय रूप से उन संगठनों में नौकरी तलाशें जिन्हें समावेशी माना जाता है। कार्यस्थल आपके लिए सही है या नहीं, इस बारे में जानना महत्वपूर्ण है।

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मिथक: मैं अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में अपने मैनेजर या सहकर्मियों को कभी नहीं बता सकता।

तथ्य: आज के दौर में, कई कार्यस्थल मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए सहायता प्रदान करते हैं। इस बात की जांच कर लें कि क्या आपका संगठन में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर जागरूकता, विश्वास, सुरक्षा और आराम का ध्यान रखा जाता है? हालांकि, नियोक्ता को अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बताने की बाध्यता नहीं है, इस स्थिति के बारे में उन्हें बताने से उन्हें आपकी स्थिति समझने में, सहानुभूति से पेश आने में और आपको सहारा देने में मदद मिल सकती है। संगठन के तौर-तरीके समझने के बाद आप खुद तय कर सकते हैं कि उन्हें क्या जानकारी दी जाए और क्या नहीं। अपने प्रबंधक से बात करें और आपको सही लगने वाले कार्यभार को लेकर चर्चा करें। कार्यकाल के लचीलेपन (फ्लेक्सिबल टाइमिंग) के विषय में पूछें ताकि आप अपनी कार्ययोजना इस तरह से तैयार कर सकें कि यह आपकी उत्पादकता को प्रभावित न करे।

मिथक: मानसिक बीमारी से ग्रस्त कर्मचारी कार्यस्थल पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करते हैं और अक्सर अक्षम कर्मी साबित होते हैं।

तथ्य:मानसिक बीमारी वाले लोगों को थेरपी और दवा के साथ ही कुछ निश्चित सुविधाओं की आवश्यकता हो सकती है। एक सहायक वातावरण मिलने पर वे किसी भी ऐसे कर्मी के समान उत्पादक साबित हो सकते हैं जिसे मानसिक बीमारी नहीं है। वास्तव में, वे इससे भी अधिक कर सकते हैं, सिर्फ इसलिए कि वे खुद को साबित करना चाहते हैं। जिन गंभीर मानसिक बीमारियों का इलाज नहीं कराया जा रहा है, उनमें समझौता करने की स्थिति बन सकती है।

मिथक: सिर्फ नीतिगत बदलावों से ही कार्यस्थलों को समावेशी बनाने में मदद मिल सकती है।

तथ्य: हर कार्यस्थल के लिए जरूरी है कि ऐसी नीतियाँ तैयार की जाएं और उन पर अमल किया जाए, जो सभी को समान रूप से बढ़ावा देने वाली हों। समावेशी कार्यस्थलों पर इसकी जरूरत अन्य कार्यस्थलों के मुकाबले बहुत ज्यादा होती है। यह एक दो-तरफ़ा सड़क है जहाँ आपसी फायदे के लिए आप और प्रबंधन समान रूप से योगदान करते हैं। कभी-कभी, यहां तक ​​कि एक समावेशी नीति की मौजूदगी में भी, एक कर्मचारी के रूप में आपसे एक निश्चित आचार संहिता का पालन करने की अपेक्षा की जा सकती है, क्योंकि संगठन यही चाहता है। और जहां यह नीति नहीं है, वहां एक कर्मचारी के रूप में आप खुद सहायक, सहानुभूतिपूर्ण एवं समावेशी रहकर एक फर्क पैदा कर सकते हैं। इसलिए समावेशिता का माहौल न केवल सही नीतियों से बनता है, बल्कि संगठन की सामूहिक संस्कृति और मानसिकता को भी दर्शाता है।

मिथक: किसी भी कार्यस्थल में स्वस्थ माहौल नहीं हैं।

तथ्य: भले ही कोई भी कार्यस्थल आदर्श कार्यस्थल नहीं होता है, फिर भी कई ऐसे संगठन हैं, जिन्हें स्वस्थ कार्यस्थल माना जाता है। यहां नेतृत्व से प्रोत्साहन, कर्मचारी हितों और सुरक्षा मानकों की बैठक, वास्तव में समावेशी माहौल, मतभेदों को स्वीकृति, स्पष्ट और खुली चर्चा, एक सकारात्मक और सहायक संस्कृति का माहौल और आपका काम अच्छा होने पर आपकी सराहना के अवसर उपलब्ध करवाएं जाते हैं।

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मिथक: डराना-धमकाना, असभ्यता और उत्पीड़न कार्य संस्कृति का हिस्सा होते हैं।

तथ्य: डराना-धमकाना, असभ्यता और नीचा दिखाना ऐसे व्यवहार हैं जो कार्यस्थलों में पूरी तरह से अस्वीकार्य हैं, और ये आपके मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकते हैं। इस तरह के व्यवहार को सहन नहीं किया जाना चाहिए। यदि आप इस तरह के व्यवहार का सामना करते हैं, तो आपको जल्द से जल्द प्रबंधन को इस बारे में रिपोर्ट करना होगा। इससे धौंस को लेकर संगठन के रुख का पता लगाने की कोशिश की जा सकती है, क्योंकि आपको पता चल जाएगा कि आपके पास क्या विकल्प हैं और आप क्या कदम उठा सकते हैं।

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वर्कप्लेस ऑप्शन्स की निदेशक मल्लिका शर्मा से मिले इनपुट्स के साथ लिखा गया है।