विकार

इंटरमीटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर

वाइट स्वान फ़ाउंडेशन

26 वर्षीय स्कूल शिक्षका काजल को इस्तीफा देने के लिए कह दिया गया, क्योंकि स्कूल को काजल के बारे में कई शिकायतें मिली थीं कि वह बच्चों के साथ हिंसक व्यवहार करती हैं।

घर पर, काजल उदास, अपराधबोध से ग्रस्त और खिन्न महसूस करती थी। उसके मन में लगातार  खुद को नुकसान पहुंचाने के विचार आते थे, जिनमें से कुछ को उसने अंजाम भी दे दिया था। कभी कलाई काट कर तो कभी दीवार पर सिर मारकर। इस तरह की घटना सप्ताह में कम से कम एक बार तो हो ही जाती थी। कभी-कभी, वह इतनी गुस्से में आ जाती कि चीजों को तोड़ देती या आस-पास के किसी अन्य पर फेंक कर मार देती। अगर कोई उसे बताता कि उसे अपने गुस्से पर काबू करने की ज़रूरत है तो वह और अधिक क्रोधित हो जाती। काजल को एक सामान्य चिकित्सक के पास ले जाया गया, जिसने उसे तुरंत एक मनोचिकित्सक के पास भेज दिया। उसे इंटरमीटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर का निदान किया गया था। इलाज के कुछ महीनों के बाद, काजल अपने क्रोध को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में सक्षम थी और उसके भड़कने की आवृत्ति भी कम हो गई थी।

इंटरमीटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर (आईईडी) क्या है?

आईईडी एक आवेग नियंत्रण विकार है, जिसमें एक व्यक्ति  बिना किसी कारण या उत्तेजना के अचानक क्रोध में भड़क उठता है। वे अपनी भावनाओं पर से नियंत्रण खो देते हैं, और उनका क्रोध स्थिति की गंभीरता के अनुपात में नहीं होता है।

सामान्य क्रोध के मामले और आईईडी एक से प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन वे होते कई तरीकों से भिन्ना हैं। क्रोध धीरे-धीरे बढ़ता है, जबकि आईईडी के मामले में, क्रोध तुरंत उस बिंदु पर पहुंच जाता है, जहां व्यक्ति  बेहद हिंसक हो जाता है। आईईडी वाले लोग शायद ही कभी अपने फट पड़ने के पीछे का कारण समझने और समझाने में सक्षम हो पाते हैं।

आईईडी आमतौर पर किशोरावस्था के दौरान शुरू होता है और व्यक्ति  को चिंता और अवसाद जैसे कई अन्य मनोवैज्ञानिक विकारों के प्रति संवेदनशील बना देता है। आईईडी वाले व्यक्ति  घटना के बाद शांत महसूस करते हैं, लेकिन अपने व्यवहार के बारे में अफसोस, उदास, पछतावा और शर्मिंदगी महसूस करते हैं।

आईईडी के लक्षण केवल शारीरिक नहीं हैं, बल्कि संज्ञानात्मक और व्यावहारिक रूपों में भी देखे जाते हैं। यद्यपि यह विकार प्रकृति में दीर्घकालिक है, चिकित्सा और दवा लोगों को इसके लक्षणों का प्रबंधन करने में मदद कर सकती है। आमतौर पर उम्र के साथ-साथ फट पड़ने की प्रवृत्ति को घटते देखा गया है। अनुमान बताते हैं कि आबादी के लगभग 3.9 प्रतिशत लोगों में यह विकार पाया गया है।

इंटरमीटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर के लक्षण क्या हैं?

आईईडी से पीड़ित व्यक्ति  मौखिक और गैर-मौखिक तरीकों से लक्षणों को प्रदर्शित कर सकते हैं। एक व्यक्ति  को आईईडी से पीड़ित नहीं बताया जाता है जब तक कि अनचाहे फट पड़ने की कम से कम तीन घटनाएं नहीं होती हैं। ये घटना आमतौर पर लगभग आधे घंटे या उससे कम तक चल सकते हैं और अचानक होते हैं।

आईईडी के लक्षण

 

व्यावहारिक                 

 

शारीरिक

संज्ञानात्मक

मनोसामाजिक

शारीरिक आक्रामकता                  

 

कंपकंपी

निराशा में सहनशीलता की कमी

संक्षिप्त अवधि का भावनात्मक अलगाव

मौखिक आक्रामकता                  

 

मांसपेशीय तनाव

किसी के विचारों पर नियंत्रण में कमी की भावना

चिड़चिड़ापन

संपत्ति या मूल्यवान वस्तुओं को नुकसान पहुंचाना                 

 

सिरदर्द 

विचारों की दौड़

क्रोध की भावनाएं

सड़क पर हिंसक क्रोध                      

सिहरन

 

 

लोगों/वस्तुओं पर शारीरिक हमला

थरथराहट

 

 

इंटरमीटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर के कारक क्या हैं?

आईईडी का सटीक कारण अज्ञात है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह जैविक और पर्यावरणीय कारकों के संयोजन से हो सकता है। साक्ष्य बताते हैं कि इस विकार से ग्रस्त अधिकांश लोग ऐसे परिवारों में पले-बढ़े जहां मौखिक और शारीरिक दुर्व्यवहार आम था। वयस्कों द्वारा हिंसा का प्रदर्शन, बच्चों को ऐसा व्यवहार सीखने और इसे सामान्य समझने का कारण बन सकता है। इसमें जीन्स भी एक भूमिका निभा सकते हैं। कुछ सबूत न्यूरोट्रांसमीटर की भूमिका की ओर भी इंगित करते हैं - मुख्य रूप से सेरोटोनिन - जो इसमें एक भूमिका निभा सकता है।

इंटरमीटेंट एक्सप्लोसिव डिसऑर्डर का इलाज कैसे किया जाता है?

आईईडी का इलाज व्यक्ति से व्यक्ति में भिन्न तरीके से इलाज है और इसमें मनोचिकित्सा और दवा दोनों का संयोजन शामिल होता है।

  • दवा: आईईडी वाले लोगों के लिए आमतौर पर एंटीडिप्रेसेंट्स, एंटी-एंक्सीयोलाईटिक्स और मूड स्टेबिलाइजर्स जैसी दवाएं निर्धारित की जाती हैं।
  • थेरेपी: व्यावहारिक संशोधन तकनीक, समूह परामर्श और क्रोध प्रबंधन सत्रों से अच्छे नतीजे मिले हैं। क्रोध को बेअसर करने के लिए रिलेक्सेशन तकनीकों का भी उपयोग किया जाता है।

संदर्भ:

केसलर आर.सी., कोकरो ई.एफ., फवा एम., जेगर एस., जिन आर. और वाल्टर्स ई. (2006)। नेशनल कॉमोरबिडिटी सर्वे रीप्लिकेशन में द प्रीवेलेन्स एंड कोरीलेट्स ऑफ डीएसएम -4। आर्काइव्स ऑफ जनरल साइकियेट्री, 63 (6), 669-678।  

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