किशोरावस्था

क्या तनावपूर्ण शैशव के कारण अवसाद हो सकता है?

डॉ श्यामला वत्स

मैं जब पहली बार नमन से मिली थी तब वह 12 साल का था और अपने माता पिता के साथ मुझसे मिलने आया था। उनका कहना था कि वह “हमेशा से ही तकलीफ देनेवाला बच्चा था”। दस सालों में उसे चार बार स्कूल बदलना पड़ा था क्योंकि स्कूल प्रबंधन ने उसे "विघटनकारी और अन्य बच्चों पर बुरा प्रभाव" बताया था।

अब वह 19 वर्ष का हो गया था और उसे नशा करने की गम्भीर समस्या थी। वह सारा दिन अपने कमरे में रहता और शाम को गांजा पीने निकल जाता था। उसके माता पिता चाहते थे कि वह यह आदत छोड़ दे और कॉलेज जाना शूरू करे, इसलिए वे उसे अस्पताल मुझसे मिलाने लाये थे।

मैंने उससे अकेले बात की। उसके जीवन के जो पहलू उठकर सामने आये वह थे – उसके माता-पिता के बीच के संबंध अधिकतर समय बिगड़े हुए रहते थे जिसकी वजह से उसे बहुत चिंता होती थी; उसकी मां को गुस्सा बहुत जल्दी आ जाता था और वह छोटी-मोटी गलतियों के लिए भी नमन पर हाथ उठाती थीं; उसके पिता उसपर चिल्लाते थे और उसे नकारा बुलाते थे; हर नये स्कूल में अपने को ढालने में उसे दिक्कतें आईं; स्कूल में किसी ने भी यह समझने की कभी कोशिश नहीं की कि वह ऐसा क्यों करता है; जून 2011 में एक बिजनेस मैनेजमेंट कोर्स में उसे भर्ती करवा दिया गया था, क्योंकि उसके पिता का मानना था कि नमन पारिवारिक सफल व्यवसाय को जारी रखना चाहता है।

नमन को लिखने का शौक था। स्कूल में अंग्रेज़ी और इतिहास उसके पसंदीदा विषय थे और आईजीसीएसई (माध्यमिक शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीय जनरल सर्टिफिकेट) की दसवीं की परिक्षा में उसे अच्छे नम्बर मिले थे। 11वीं और 12वीं के लिए उसके माता पिता ने उसे एक सीबीएसई पाठ्यक्रम वाले स्कूल में भर्ती करवा दिया था और वह इसके लिए किसी तरह से राज़ी हुआ था। यहाँ की पढ़ाई में उसका मन नहीं लगा, और जल्द ही वह भविष्य की ओर बढने वाले मार्ग से भटक गया। उसके बाद उसका दाखिला बिजनेस मैनेजमेंट कोर्स में करवा दिया गया था।

यह किशोर अवसाद से लड़ रहा था लेकिन उसे देखकर इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता था क्योंकि वह खोया हुआ सा लगता था। अपने जीवन की दिशा बदलने की कोई आशा उसमें शेष नहीं थी और वह उम्मीद हार चुका था। अब वह रोता भी नहीं था, बल्कि एक मंद मुस्कुराहट के साथ पुछता “क्या फर्क पड़ता है?”

वह अर्थ खोजने के लिए इंटरनेट पर दर्शन पढ़ रहा था और अल्बर्ट कामु के उस लेखन से उसे कुछ धीरज मिला था जहाँ उन्होंने लिखा था कि जीवन असल में बहुत अद्भुत है और उसके साथ युक्ति को नहीं जोड़ना चाहिए, बस जैसी है वैसी ही चलती रहे। नमन ने भी मान लिया था कि उसका जीवन अद्भुत है और उसके पास और कोई उपाय नहीं है इसे बिना किसी उम्मीद के जीने के।

उसका कहना था कि उसकी प्रवृत्ति “तार्किक और वैज्ञानिक प्रकार की नहीं, बल्कि रचनात्मक और सहज बोध संबंधी है”, लेकिन उसने कुछ समय तक यह जताने की कोशिश की थी कि शैक्षिक उपलब्धियां बहुत महत्वपूर्ण हैं। यह ज्यादा देर नहीं चला। उसने बताया कि बहुत पडनेवाले बच्चों से उसे ईर्षा होती थी जिन्हें विज्ञान बहुत पसंद था और जो इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश परीक्षा की तैयारी में अपनेआप को डुबो लेते थे। कभी कभी वह भी उनकी तरह बनना चाहता था लेकिन उसे पता था कि ऐसा नहीं हो सकता।

कुछ समय के लिए उसने अवसादरोधी दवाओं के सेवन को रोकने का निर्णय लिया क्योंकि वह बात करके इसका हल निकालना चाहता था और अमूर्त भाव से आलोचना करने की क्षमता रखता था।

तीसरे सत्र तक नमन की उदासीनता का मुखौटा फिसल गया और वह यह स्वीकार करने लगा कि कैसे उसकी अपनी निष्क्रियता की वजह से समस्या आगे बढ़ गयी थी। इससे उसके अंदर दबी अवसाद का पता चला। मैंने एक हल्के एंटीडप्रेसेंट की मानक खुराक उसे देना शुरू किया जो कि उसकी इस अंतर्दृष्टि के साथ आनेवाली चिंता को नियंत्रित करने के लिए।

पांचवें सत्र में उसने मुझे बताया कि उसने बिजनेस मैनेजमेंट कोर्स को छोड़ने और एक लिबरल आर्ट्स कॉलेज में अंग्रेजी पढने का मन बना लिया है। कुछ समय बाद ही वह यह शहर छोड़कर चला गया और मैं उससे फिर नहीं मिली। योजना यह थी कि थेरपी के लिए उसे एक नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास भेजूँगी ताकि बचपन के प्रतिकूल अनुभवों से उत्पन्न दीर्घकालिक भेद्यता को दूर करने, दुर्भावनापूर्ण मुकाबला नीतियों को उजागर करने और बेहतर तरीकों को उनकी जगह स्थापित करने में उसे मदद मिले।  

नमन जैसे युवाओं की कमी नहीं है। उनकी समस्याओं का आधार बचपन में अनुभव की गई व्यग्रता का लगातार क्रम होता है।

बढती उम्र में कुछ चिंताओं या तनाव का होना स्वाभाविक होता है। इससे बच्चे सहनशील बनते हैं और व्यस्क काल में चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का बेहतर ढग से मुकाबला कर पाते हैं। लेकिन लगातार होनेवाले तनाव से मस्तिष्क के हिप्पोकेम्पस और अमिग्डाला क्षेत्रों के परिपथों में स्थायी परिवर्तन आ जाता है, जिसके कारण आगे चलकर वे हमेशा तनाव से प्रभावित रहते हैं। एक बच्चे को देखकर हो सकता है यह लगे कि वह तनाव को झेलना सिख गया है लेकिन जीवन के तनावपूर्ण स्थितियों में उसे अवसाद के दौरे पड़ सकते हैं।

अवसाद का अन्य बड़ा कारक अनुवांशिक दुर्बलता है। कुछ प्रकार के आनुवंशिक तत्वों के कारण तनावपूर्ण परिस्थितियों में अवसाद होने की संभावना बढ जाती है, वही कुछ अन्य आनुवंशिक तत्वों के कारण कुछ लोग तनाव को बेहतर तरीके से झेल पाते हैं।

अवसाद प्रकृति और पोषण का सम्मिलित उत्पाद है। आनुवंशिक रूप से कमज़ोर बच्चा भी मज़बूत और सहनशील बन सकता है अगर उसका बचपन तनावमुक्त रहें। वहीं दूसरी तरफ, एक स्वस्थ्य बच्चे में अवसाद पनप सकता है अगर उसे बचपन में निरंतर तनाव का सामना करना पड़े। नमन के साथ भी यही हुआ था।

एंटीडप्रेसेंट दवाओं से अवसाद के लक्षण और व्यग्रता को कम किया जा सकता है। कुछ हद तक, दवाएँ लम्बे अर्से से चल रहे तनाव से क्षतिग्रस्त तंत्रिका कोशिकाओं की मरम्मत भी करते हैं। संक्षिप्त समय के लिए दवाओं के सेवन के साथ साइकोथेरपी से नमन की तरह खोए हुए और अवसाद से जुझ रहे युवाओं को मदद मिलती है अपने जीवन सही दिशा देने में, जिससे अवसादग्रस्तता के प्रकरण का सिलसिला भी कम होता है।

इस श्रृंखला में डॉ श्यामला वत्स ने इस तथ्य पर प्रकाश डाला है कि किशोरावस्था के परिवर्तन प्रारंभिक मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को ढककर रख सकते हैंयह लेख दर्शाते हैं कि किशोरों का सामान्य व्यवहार मानसिक विकार के शुरुआती लक्षणों से कितना मिलता जुलता है। जैसा कि अनावश्यक रूप से पीड़ित युवा लोगों की कहानियों से स्पष्ट है, मित्रों और परिवार के लिए यह महत्वपूर्ण है कि सामान्य सीमा के बाहर जानेवाले व्यवहार की पहचान करें, और नियंत्रण से बाहर जाने के पहले मदद की तलाश करें।

डॉ श्यामला वत्स बेंगलुरू स्थित बीस वर्षों की अभिज्ञता सम्पन्न मनोचिकित्सक है यदि आपके पास कोई टिप्पणी या प्रश्न है जिसे आप साझा करना चाहते हैं, तो कृपया columns@whiteswanfoundation.org पर उन्हें ईमेल लिखें। 

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