किशोरावस्था

गहन उत्कंठा से क्या हो सकता है?

डॉ श्यामला वत्स

राजस्थानी संयुक्त परिवार की 22 वर्षीय गृहिणी, पायल को उसका पति परामर्श के लिए लाया। वह लगभग एक महीने से उदास और चिंतित थी। डेढ़ साल पहले, शादी के तुरंत बाद, वह परेशान रहने लगी, और अक्सर रोती थी। वह तब पांच दिनों के लिए "अंधी हो गयी" थी। उस समय नेत्र रोग विशेषज्ञ ने उसे एक मनोचिकित्सक का परमर्श लेने का सुझाव दिया और मनोवैज्ञानिक उपचार से उसे मदद भी मिली। उसकी दृष्टि दो दिनों में वापस आ गयी। इस डर से कि कहीं उसकी आँखों की रोशनी फिर से ना चली जाये, निवारक उपाय के तौर पर, उसका पति उसे परामर्श के लिए ले लाया।

उस संयुक्त परिवार से अलगाव जिसमे वो पली बड़ी थी और बचपन के घर की बिक्री उसकी उदासी और उत्कंठा का कारण थी। मैंने उसे संक्षेप में सलाह दी और एक सप्ताह के लिए कुछ दवाएं निर्धारित कीं, जिनके पूरा होने पर उसे मेरे पास वापस आना था।

पांच सप्ताह के बाद वह समीक्षा के लिए व्हीलचेयर पर लौटी। एक हफ्ते पहले से उसे दोनों जांघों और पैरों में सनसनी और संचालन क्षमता महसूस होना बंद हो गया था। उसके पिछली निरीक्षण के बाद दो घटनाएं हुईं: एक, वह अपने परिवार से मिलने राजस्थान गई थी और उनकी स्थिति से परेशान थीं। उसकी मां, जो पहले स्वस्थ थी, अब दोनों घुटनों में गंभीर दर्द से परेशान थी और बिस्तर पर थी, जिसके लिए प्रतिस्थापन सर्जरी की सलाह दी गई थी। दूसरा, फोन पर उसके पति के साथ बहस हो गयी थी, जिसने यह कह कर वार्तालाप समाप्त कर दिया था कि "अपने माता-पिता के साथ रहो, वापस मत आना!"

गंभीर तनाव की स्थिति में वह तुरंत राजस्थान से लौट आईं। दो दिन बाद, उसे पता चला कि वह बिस्तर से उठ नहीं पा रही थी क्योंकि न तो वह खड़ी हो पा रही थी, और न ही अपने पैरों को महसूस कर पा रही थी।

जब मैंने अकेले में उससे बात की तो उसने अपने माता-पिता के घर के बारे में अपनी सारी भावनाओं और चिंताओं को रोते हुए जाहिर कर दिया। उसे डर था कि उसका पति धैर्य खोने लगा है और अपने ससुराल वालों की उदारता का अनुचित लाभ उठाने का अपराधबोध उसे खाये जा रहा था।

उसने कहा कि वह बात करने के बाद बेहतर महसूस कर रही है और अगले सप्ताह फिर  मुलाकात का अनुरोध किया। मैंने एक उत्कंठा को कम करने वाली दवाई लिख दी क्योंकि उसने पहले की दवाओं को लेना बंद कर दिया था। उसके पति को मैंने अंदर बुलाया और कहा कि दवाएं सिर्फ एक हफ्ते तक के लिए थीं, जब तक की उसे फिर से अपने पैरों में हलचल महसूस न हो। दोनों पति और पत्नी हंस पड़े, और पति ने कहा, "क्या उसी तरह जिस तरह उसे उसकी दृष्टि वापस मिली?"

अगले हफ्ते वह अपने पति के समर्थन से मेरे कार्यालय में आयी, होंठों पर एक छोटी सी मुस्कुराहट लिए। उसका रोना बंद हो चूका था और वह शांत हो गई थी। उसने अपने घर के बारे में इस तरह से बात की जिससे संकेत मिला कि उसने नए बदलावों को स्वीकार करना शुरू कर दिया था।

अगले सप्ताह वह मेरे पास समीक्षा के लिए बिना लड़खड़ाए या किसी का सहारा लिए अपनेआप चली आयी। उसके पति के साथ एक संयुक्त सत्र ने उनके बीच के हालात को सुचारू कर दिया क्योंकि अब उसे समझ में आ गया था कि गंभीर मानसिक आघात शारीरिक लक्षण पैदा कर सकता है।

छह साल पहले मैंने दार्जिलिंग की एक युवा लड़की देवश्री को देखा था, जो अस्पताल में एक रोगी थी। जब पूरी तरह से जांच पड़ताल और प्रयोगशाला के अनुसंधान के बाद कोई शारीरिक असामान्यता दिखाई नहीं दी तब न्यूरोलॉजिस्ट ने उसे मेरे पास भेज दिया। उसके दायीं तरफ के दोनों अंगों में सनसनी और हलचल बंद हो चुकी थी। उसकी उम्र और पारिवारिक स्थिति पायल के सामान थी, और उसके ससुराल वालों की अपेक्षाओं से जबरदस्त तनाव में थी। इस मामले में भी, दवाइयों और सहायक मनोचिकित्सा से, एक सप्ताह में ही प्रभावित अंगों में सनसनी और हलचल लौट आयी, हालांकि उसे एक और सप्ताह के लिए पहियेदार कुर्सी की आवश्यकता रही। उसके परिवार के सदस्यों के साथ कई सत्र आयोजित किए गए थे जिनमे उन्हें शारीरिक लक्षणों और उसकी परिस्थितियों से उत्पन्न गंभीर उत्कंठा के बीच के संबंध को समझने में मदद मिली।

ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम या स्वचालित तंत्रिका तंत्र (एएनएस) नामक एक पूरी तरह से अलग तंत्रिका तंत्र है जो, मस्तिष्क में भावनाओं को नियंत्रित करने वाली अंगों की प्रणाली को एड्रेनल ग्रंथि, एक अंतःस्रावीय अंग, से जोड़ता है। यह तर्कसंगत विचार के आधार, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (सीएनएस) से स्वतंत्र होकर काम करता है। इसलिए, इन दोनो मामलों में लोगों की विकलांगता या अंधापन किसी सचेत इरादे का नतीजा नहीं है। वे किसी रोग का बहाना नहीं कर रहे। उनकी विकलांगता असली हैं। जब असहनीय तनाव इकट्ठा हो जाता है तो एएनएस उत्पन्न हुए गंभीर उत्कंठा से निपटने का प्रयास करता है। एएनएस आमतौर पर बहुत सफल होता है, अन्यथा पायल और देवश्री जैसे कई लोग होंगे। कभी-कभी, एएनएस अभिभूत हो जाता है, जिससे एक व्यक्ति अचल और गतिहीन हो जाता है, जैसा की इन दो लड़कियों के साथ हुआ था। 'पेट्रीफाइड' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'पत्थर में बदल जाना'!

जो उपचार दिया गया था वह केवल घटना-विशिष्ट था। एक बार उनके लक्षण विलीन होने के बाद लोग दोबारा जांच करवाने के लिए वापस नहीं आते हैं। पायल और देवश्री जैसे संवेदनशील लोगों को चिकित्सा से लाभ हो सकता है ताकि वे खुद को समझ सकें और जीवन के विचलन का बेहतर तरीके से सामना कर सकें। लेकिन फिर, शायद वो न कर पाएं। हम सिर्फ उम्मीद कर सकते है कि पायल के मामले में उसके पति के साथ सत्र, और देवश्री के मामले में उसके परिवार ने उन्हें भविष्य में ऐसी घटनाओं से अपने संवेदशील रिश्तेदारों की रक्षा करने में मदद करने के लिए पर्याप्त अंतर्दृष्टि दी।

डॉ श्यामला वत्स एक बैंगलोर स्थित मनोचिकित्सक हैं जो बीस साल से अधिक समय से अभ्यास कर रही हैं। अगर आपके पास कोई टिप्पणी या प्रश्न हैं जो आप साझा करना चाहते हैं, तो कृपया उन्हें columns@whiteswanfoundationorg पर लिखें।

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