मन और त्वचा के संबंध का विश्लेषण
शरीर और मस्तिष्क

मन और त्वचा के संबंध का विश्लेषण

वाइट स्वान फ़ाउंडेशन

हमने शारीरिक स्वास्थ्य पर तनाव के प्रभाव के बारे में सुना है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह न केवल हमारे आंतरिक अंगों को प्रभावित करता है, बल्कि हमारी त्वचा को भी प्रभावित करता है। मन और त्वचा के बीच संबंध को समझने के लिए हमने अमेरिकन अकादमी आफ डर्माटोलॉजी के अंतरराष्ट्रीय अध्येता डॉ अनघ कुमार से बात की।

मस्तिष्क और त्वचा के बीच क्या संबंध है?

मस्तिष्क और त्वचा के बीच एक मजबूत शारीरिक संबंध है। हमारे जीवन की शुरुआत से यह विकसित होता है, जब भ्रूण बढ़ता है। मस्तिष्क और त्वचा मूल रूप से एक ही तरह की कोशिकाओं से बनते हैं – जिसे एक्टोडर्म परत कहा जाता है। इस प्रकार त्वचा और मस्तिष्क के बीच एक मौलिक शारीरिक संबंध स्थापित हो जाता है।

क्या दिमाग के भाव का असर त्वचा पर दिखता है?

जब हम शर्मिंदा होते हैं तो हमारा चहरा लाल हो जाता है। यह एक संकेत है कि मन जो महसूस करता है वह त्वचा पर प्रतिबिंबित होता है। इसी तरह से त्वचा पर मानसिक तनाव का असर भी साफ दिखता है।

वैज्ञानिक रूप से त्वचा पर तनाव का क्या असर होता है?

वैज्ञानिक अनुसंधान से पता चला है कि लम्बे अर्से तक चलने वाला तनाव प्रतिरक्षा प्रणाली में हस्तक्षेप कर सकता है, जो त्वचा के घाव भरने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, त्वचा की प्रतिरक्षा कोशिकाओं को मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र प्रभावित करता है रिसेप्टर्स (प्रापक) और रासायनिक दूतों के माध्यम से, जिन्हें न्यूरोपैप्टाइड कहते हैं। वैज्ञानिक इनका और त्वचा के अन्य पदार्थों का अध्ययन कर रहे हैं, और कैसे वे मनोवैज्ञानिक तनाव से जुझते हैं। काफी सबूत है जिनसे पता चलता है कि लम्बे अर्से तक चलने वाले तनाव से त्वचा की कुछ समस्याएं बढ़ सकती हैं।

जिसका अर्थ यह हुआ कि मानसिक समस्याओं का असर त्वचा पर दिखता है?

त्वचा संबंधी रोगों के मनोवैज्ञानिक लक्षण हो सकते हैं और कुछ मानसिक स्थितियों का असर त्वचा पर दिख सकता है। साथ ही, मुँहासे और छालरोग जैसी कुछ त्वचा की समस्याएं मानसिक तनाव से बढ़ सकती है। वास्तव में त्वचा और मन का संबंध बहुत गहरा है। इन्हें साइकोडर्माटोलॉजीकल विकार (मनोवैज्ञानिकता संबंधी चर्मरोग) कहा जाता है।

क्या आप हमें साइकोडर्माटोलॉजीकल विकार के विषय में संक्षेप में बता सकते हैं?

साइकोडर्माटोलॉजीकल विकार ऐसी समस्याएं हैं जिनका संबंध मन और त्वचा से होता है। ये तीन प्रकार के होते हैं –

1) साइकोफिज़ियोलिक विकार:  ये त्वचा की समस्याएं हैं जिनका शारीरिक आधार हैं लेकिन जो तनाव और अन्य भावनात्मक कारकों से बढ़ सकती हैं। उदाहरण: एक्जिमा और छालरोग

2) त्वचाविज्ञान संबंधी लक्षणों के साथ मनोवैज्ञानिक विकार:

उदाहरण:

त्रिकोटिलोमेनिया: बाल खींचने की बहुकालीन समस्या

पैरासिस्टोसिस का भ्रम: जहां व्यक्ति को लगता है कि उसके शरीर में कीड़े और परजीवी प्रत्यक्ष हैं, हालांकि ऐसा नहीं है।

बॉडी डिस्मोर्फ़िया: जहां व्यक्ति एक काल्पनिक शारीरिक दोष को लेकर परेशान रहता है।

3) मनोवैज्ञानिक लक्षणों के साथ चर्मरोग: जहां त्वचा की कुछ विशेष स्थितियां होने के कारण भावनात्मक समस्याएं प्रकट होती हैं। कलंक अक्सर इन स्थितियों में तनाव का कारण होता है।

उदाहरण: विटिलिगो (सफ़ेद दाग), छालरोग, ऐल्बिनिज़म (रंगहीनता), एक्जिमा

4) विविध: इस श्रेणी के अंतर्गत मानसिक और चर्म रोग की दवाओं से संबंधित प्रतिकूल प्रभाव आते हैं।

क्या आप कभी-कभी महसूस करते हैं कि लोग आम, हानिरहित त्वचा की समस्याओं को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित रहते हैं?

किशोरों में मुँहासों को लेकर काफी तनाव रहता है। वे जितनी जल्दी हो सके इससे छुटकारा पाना चाहते हैं। वे चेहरे पर होने वाले दाग़ को लेकर चिंतित रहते हैं और चाहते है कि उनका चेहरा जल्द से जल्द मुँहासों से मुक्त हो जाएं।  क्या हो रहा है यह जानकारी न होने के कारण अनावश्यक तनाव और चिंता में डूबे रहते है। दरअसल, मुँहासे शरीर के हार्मोन में आने वाले बदलाव की अभिव्यक्तियों में से एक है और अधिकांश व्यक्तियों को उनके जीवनकाल में इसका अनुभव एक बार होता है। यह समस्या 25-30 वर्ष की उम्र तक समाप्त हो जाती है। इसके बारे में बहुत अधिक चिंता करने से और मुँहासों को नोचने से समस्या केवल बढ़ती है।

क्या त्वचा की कुछ समस्याओं में चिंता और व्यग्रता से तनाव में वृद्धि होती हैं, और यह एक दुष्चक्र बन जाता है?

हाँ, कई लोग मुँहासे, सफ़ेद बाल, निशान या विटिलिगो के साथ आते हैं, और इन परिवर्तनों के कारण अपने बाहरी स्वरूप में होने वाले बदलाव को लेकर उनमें आत्मसम्मान की कमी होने लगती है। कुछ त्वचा की स्थिति के निदान को लेकर दुखी हो जाते हैं या भड़क जाते हैं। उनकी चिंता यह होती है कि समाज उनके साथ कैसे व्यवहार करेगा। इस स्थिति में उनके साथ समय बिताना बहुत महत्वपूर्ण है। यह चिकित्सक का कर्तव्य है कि उन्हें परिस्थिति, इलाज के विकल्प और रोग के क्रम के बारे में शिक्षित किया जाए। इससे भी महत्वपूर्ण बात, डॉक्टर उन्हें सलाह दें, शिक्षित करें और दूसरों का समर्थन प्राप्त करने में मदद करें।

जो लोग बिना वजह चिंता कर रहे हैं उन्हें आप क्या सलाह देंगे?

इन समस्याओं के विषय में सही जानकारी उनकी मदद करेगा अपनी देखभाल करने में। समस्या का पूरा विवरण और ज्ञान उनके साथ अवश्य साझा करें। जैसे दूनियाभर में 90% लोगों को अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार मुँहासे होते हैं। ऐसी जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है, और बिना वजह तनाव न लें।

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