इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी (ईसीटी): मिथक और तथ्य

ईसीटी पर वैज्ञानिक सूचना की कमी से लोग उपचार के बारे में गलत धारणाएं बना लेते हैं

मिथक: ईसीटी इसलिए दी जाती है कि लोग सबकुछ भूल जाएं.
तथ्य: अस्थायी स्मृतिविलोप ईसीटी का एक साइड अफ़ेक्ट है जो ज़्यादातर हल्का, रिवर्सबल और तात्कालिक घटनाओं तक ही सीमित होता है. ईसीटी का कोर्स होने के बाद याद रखने की क्षमता पहले जैसी बनी रहती है.

मिथक: अगर कोई मनोरोग से पीढ़ित व्यक्ति अस्पताल में भर्ती किया जाता है, तो उसे बिना उसकी जानकारी के ईसीटी दी जाती है.
तथ्य:
  ईसीटी हमेशा व्यक्ति और उसके परिजनों से डॉक्टर की बात हो जाने के बाद ही दी जाती है. अगर वे इसके लिए सहमत होते हैं तो ईसीटी देते हैं.

मिथक: ईसीटी का अनुभव दर्दभरा और डरावना होता है.
तथ्य: ईसीटी ऐनिस्थीशया के बाद ही दिया जाता है और इसलिए मरीज़ को कोई दर्द या बिजली का झटका महसूस नहीं होता है.

मिथक: ईसीटी से मस्तिष्क को नुकसान पहुंचता है और इससे बुद्धिमता में कमी आ सकती है या व्यक्तित्व में बदलाव आ सकता है.
तथ्य: ईसीटी से दिमाग को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है. ईसीटी थेरेपी के दौरान अस्थायी तौर पर याददाश्त गुम रह सकती है. ईसीटी व्यक्तित्व को या बुद्धिमता को प्रभावित नहीं करती है.

मिथक: ईसीटी बतौर सज़ा दी जाती है.
तथ्य: ईसीटी सज़ा नहीं है. मनोरोग की दशा के उपचार के तहत दी जाने वाली ये एक चिकित्सा प्रविधि है. दूसरी बात ये कि ये कोई दर्दभरी प्रक्रिया नहीं होती है.

मिथक: अगर डॉक्टर ने ईसीटी का सुझाव दिया है, तो इसका अर्थ ये है कि दूसरे उपचार प्रभावी नहीं है और स्थिति निराशाजनक है.
तथ्य: ईसीटी की सलाह आमतौर पर डॉक्टर तमाम उपलब्ध विकल्पों में से एक विकल्प के रूप में ही देते हैं. और तात्कालिक रूप से मरीज़ को उसी विकल्प की ज़रूरत हो सकती है. अगर कोई ईसीटी नहीं कराना चाहता है तो डॉक्टर अन्य उपलब्ध विकल्पों की सलाह दे सकते हैं.

बंगलौर स्थित नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोसाइंसेस (निम्हान्स) में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ प्रीति सिन्हा द्वारा संकलित

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