कल्याण

मैं लिखती गई, मेरे साथ आवाज़ें जुड़ती गई

वाइट स्वान फ़ाउंडेशन

दवाईयां और मानसिक चिकित्सा के अलावा, अनेक गतिविधियां हैं जो व्यक्ति को मानसिक बीमारी से दूर कर उनकी व्यग्रता को कम कर सकती है। व्हाईट स्वान फाउन्डेशन के संजय पाठक ब्लॉगर शैलजा विश्वनाथन से बातचीत में अपने विचारों को लिखने से प्राप्त शांती के बारे में जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।

हमें उस समय के बारे में बताएं जब आपको इस बीमारी के बारे में पता चला था। आपके परिवार और जीवन साथी ने इसे लेकर कैसा व्यवहार किया?

अवसाद और उन्मादी अवसाद से पीड़ित होने की बात कुछ इस प्रकार की थी जो पहले पहले तो मुझे पता ही नही चली कि मेरे साथ हो रही है। जब यह पता चला कि मुझे काफी गहरी मानसिक बीमारी है, तब तक मेरे साथ अत्यधिक मतिभ्रम, हिंसात्मक आवेग और निरंतर दो घन्टों तक रोते रहने जैसी अनेक घटनाएं कई बार हो चुकी थी। यह वाकई एक अशक्त कर देने वाला अनुभव था और मेरी कल्पनाशक्ति से भी ज्यादा भयावह था।

किसी थैरेपिस्ट को दिखाने के लिये मुझे राज़ी होने में थोड़ा समय लगा था। पहले एक व्यक्ति मेरे घर पर मेरे माता पिता से बात करने आता था, और थोड़ी बहुत बातें मुझसे भी करता था। मेरे तेवर पूरी तरह से विद्रोही थे, गुस्से और नाराज़गी से भरे उन दिनों में मैने अपने आप को लगभग समाप्त करने की हद पा ली थी जिससे इस दर्द को आगे सहना नही पड़े।

किसी व्यावसायिक से मेरा निदान हो पाना वाकई सबसे बेहतर बात थी क्योंकि इसके कारण कुछ महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ पाए। इनमें से एक तथ्य यह था कि यह वास्तव में एक शारीरिक बीमारी थी जिसके कारण रासायनिक संतुलन गड़बड़ाने से मस्तिष्क के हारमोन पर असर हुआ था और यही वास्तव में भौतिक गतिविधियों में भी समस्या पैदा कर रहा था। दूसरी बात, वैसे मुझे यह बहुत अच्छे से समझ में नही आया था, मुझे याद है कि मेरे माता पिता काफी आरामदायक स्थिति में आ गए थे क्योंकि उस समय इससे ज्यादा महत्वपूर्ण कोई और बात थी ही नही। तीसरी बात, मुझे पता था कि दवाईयां मेरे गुस्से से भरे व्यवहार को नियंत्रण में ला रही थी और मैंने उन्हे सभी के कहना मानकर लेना शुरु किया था जिससे मुझे काफी अच्छा लगा।

मेरा परिवार ही वह एकमात्र कारण रहा जिसकी मदद के कारण आज मैं बोल पा रही हूं या मैं ज़िंदा हूं। मेरे जीवन साथी का नाम मैं खास तैर पर लेना चाहूंगी क्योंकि एक नवविवाहित व्यक्ति के लिये अपनी पत्नी का ऎसा व्यवहार देखकर भी सामान्य रहना बड़ा मुश्किल होता है, साथ ही अत्याधिक रुप से गुस्सा और व्यग्रता से भरे मेरे दौरे, रोने और चिल्लाने के दौरे और आस पास एक डर का माहौल। यदि उनके स्थान पर कोई और होता, तो बहुत पहले ही हार जाता लेकिन मैं वाकई बहुत भाग्यशाली हूं कि वो मेरे साथ है।

क्या आपको मानसिक उपचार दिया गया और आपके अनुसार क्या यह जरुरी है? क्या आपको अभी भी दवाई या सलाह की जरुरत पड़ती है?

पहले के तीन महीनों में, जब मेरी बीमारी का निदान नही हुआ था, मुझे बहुत ज्यादा दर्द था, शारीरिक भी और मानसिक भी। यह संवेदनाओं के आवेग का एक मिश्रण था और एक ऎसी स्थिति थी जो आप चाहेंगे कि आपके सबसे खराब दुश्मन के सामने आ सके।

अकेलापन, इन्सोम्निया और आवेगपूर्ण व्यवहार मेरे रोजाना के स्वभाव का हिस्सा रहे, पूरे तीन महीनों तक। मैं आज भी यह सोचकर हैरान रहती हूं कि मेर पति इस व्यग्रता को कैसे सहन कर पाए थे। ईमानदारी से कह सकती हूं कि उनके स्थान पर मैं होती, तो बहुत पहले ही हार मान चुकी होती।

इस प्रक्रिया का सबसे खराब हिस्सा है कि आपको यह समझ में ही नही आता है कि मस्तिष्क काम कैसे करता है। हम पात्र मानसिक स्वास्थ्य जानकार नही है, इसलिये हमारे पास यह जानने का वास्तव में कोई तरीका नही है कि जब लोगों को व्यग्रता महसूस होती है या बिना किसी कारण के ड़र लगता है, तब वास्तव में उनके साथ क्या हो रहा होता है। मेरे माता पिता भी यह समझ नही पाए कि क्या हो रहा है और उन्होंने मनोरोग चिकित्सक से सलाह करने की ठानी। मेरे विचार में, यह मेरे साथ होने वाली सबसे बेहतर बातों में से एक रहा।

जब मनोरोग चिकित्सक द्वारा मेरे मानसिक स्वास्थ्य का आकलन किया गया, तब सबसे कठिन स्थिति थी, ठीक होने की प्रक्रिया। उनके द्वारा परिस्थिति का अभ्यास करना और उनका अनुभव ही मेरे लिये उस स्थिति में, सबसे अलग व्यक्तित्व के रुप में मेरी मदद करने वाला व्यक्ति का स्वरुप लेकर मेरे सामने था।

आपके प्रश्न का उत्तर मैं हां में दूंगी, कि हां मैने मनोरोग चिकित्सक से सलाह ली और मैं पूरे नौं महीनों तक दवाईयों पर रही हूं। यह दवाई डॉक्टर द्वारा दी गई थी और इसका असर होने तक मेरा पूरा ध्यान रखा गया था। समय के साथ इसकी मात्रा कम होती गई और अन्त में, नौ महीनों के पश्चात यह बन्द हुई।

आज, पिछले तेरह वर्षों से मैं दवाई से दूर हूं और मुझे किसी सलाह की आगे जरुरत नही पडी। आज भी मेरे सामने स्थितियां आती हैं जब मुझे अपने लक्षणों की चेतावनी स्थितियां दिखाई दे जाती हैं और इस तरीके से मुझपर परिस्थिति हावी हो, इससे पहले मैं सचेत हो जाती हूं। यह कहना एकदम से सही है कि यदि आप अपने कहे हुए और करने वाले कामों में सामंजस्य नही रख पा रहे हैं, तब मानसिक चिकित्सा सही और आदर्श है।

आपको यह कैसे महसूस हुआ कि लेखन आपके लिये चिकित्सा के समान है?

लेखन मेरे लिये हमेशा से ही चिकित्सा के समान रहा है। यहां तक कि इस भयानक अवसाद संबंधी बीमारी और बायपोलर डिसऑर्डर का ग्रास बनने से पहले भी, मुझे अपने विचारों को कागज पर उतारकर बड़ा सुकून मिलता था। अपने उपचार के मध्य में ही मुझे अपने विचारों को कागज और कलम से अभिव्यक्त करने के बारे में कहा गया था, मुझे याद है यह सब। लेकिन मेरे मन में दुख इतना भरा हुआ था कि उसे कागज पर उतारना बड़ा मुश्किल था। यह अनुमान करना भी कठिन है कि वर्ष 2002 के समय कोई कंप्यूटर का उपयोग करते हुए अपने विचारों को अभिव्यक्त कर रहा हो। इसलिये लिखना तो पारंपरिक तरीके से ही होता था और कलम पकड़कर अपने विचारों को व्यक्त करना और उस भयंकर सोच को शब्दों में ढ़ालना सरल नही था, बावजूर इसके, मैने गुस्से से संबंधित अपनी अभिव्यक्ति को इन्ही स्वरुपों में बाहर निकाला।

मेरी बेटी के जन्म के पूरे एक वर्ष बाद मैने लेखन शुरु किया और ब्लॉग भी शुरु किया। प्रारंभिक रुप से इसमें केवल डायरी लिखने जैसी प्रविष्टियां थी और खासकर एक नई मां के रुप में मुझे मातृत्व का कैसा अनुभव मिल रहा है, यह सब लिखा गया और धीरे धीरे मैने इस लिखने की प्रक्रिया को अपने काम का हिस्सा बना लिया। वर्ष 2013 के मध्य में मैने पाया कि मैं व्यक्तिगत विषयों पर अपने ब्लॉग पर लिख रही हूं और आश्चर्य की बात थी कि अनेक व्यक्ति इस संबंध में अपने आप को इन विचारों के करीब पा रहे थे।

लेकिन मुझे वाकई वर्ष 2015 तक प्रतीक्षा करनी पड़ी जब वास्तव में मैने सार्वजनिक रुप से अपने अवसाद और बायपोलर डिसऑर्डर से लड़ाई को लेकर लिखा। अचानक मुझे लगा कि अनेक आवाजें मेरे साथ चल रही हैं। मुझे सभी ने सलाह दी कि उन्हे मानसिक बीमारी संबंधी संघर्ष को लेकर काफी कुछ अपना सा लगता है और वे अपनी बातें भी बताने लगे जिनमें स्वयं रोगी, संघर्ष कर रहे या ठीक हो चुके व्यक्ति और देखभाल करने वाले व्यक्ति शामिल थे।

अपनी बीमारी के बारे में लिखने से मुझे अनेक तरीकों से फायदा मिला: स्वयं को मैने उस स्थिति में देखा जो स्वस्थ थी और एक ऎसे योद्धा के रुप में थी जिसने सारी परेशानियों में से बाहर निकलकर अब यह साहस दिखाया है कि वह इनका सामना कर चुकी है। और इसके कारण मुझे अनेक ऎसे व्यक्तियों का साथ मिला जिन्हे यह सब कहना बड़ा मुश्किल लग रहा था। मुझे लगता है कि लेखन एक दोतरफा रास्ता है: हम लिखते हैं अपने लिये और हम लिखते हैं पढ़े जाने के लिये। जब ये दोनो बातें एक साथ होती है, तब यह हमारे सामने एक पूर्णता के साथ आता है।

आप अपने ही समान स्थिति से संघर्ष कर रहे व्यक्तियों को क्या सन्देश देना चाहेंगी?

ओह, कहने के लिये तो बहुत कुछ है मेरे पास, लेकिन मैं संक्षेप में ही कहूंगी।

सबसे पहले, यह समझ लीजिये कि आप अकेले नही है। हम वास्तव में कभी भी पूरी तरह से अकेले नही होते। अपनी बीमारी के दौरान आपकी मदद कर सके इस प्रकार का एक सपोर्ट सिस्टम खोज लीजिये। एक आदर्श समूह होता है आपके परिवार और प्रियजनों की उपस्थिति। यदि यह संभव नही हो तब कुछ विश्वसनीय मित्र हो सकते हैं जो इस स्थिति में आपकी मदद कर सके।

दूसरी बात यह है, स्वयं को दोष मत दीजिये। कोई भी मानसिक रुप से बीमार होना नही चाहता है, जैसे कि कोई भी मधुमेह या कैंसर से पीडित होना नही चाहता है। किसी को भी यह मत बताने दीजिये कि आप किसी परिस्थिति को लेकर कल्पना कर रहे हैं या फिर आप चुटकी बजाते ही इस स्थिति से बाहर हो जाएंगे। इसी प्रकार की बीमारी से ठीक हो चुके व्यक्तियोंको खोजिये और अपनी कहानी उनके साथ बांटिये। एक सहायता समूह ऑनलाईन या ऑफलाईन भी खोजा जा सकता है जो आपको इस कठिन समय से बाहर निकाल सके।

तीसरी बात यह है कि, बहुत से लोग हैं जो थैरेपिस्ट से मिलने में झिझकते हैं क्योंकि हमारा सामाजिक वातावरण उसके पक्ष में नही होता है। उन्हे यह लगता है कि उन्हे लोग पागल समझने लगेंगे यदि वे किसी सलाहकार या मानसिक स्वास्थ्य चिकित्सक से मिलने की बात को स्वीकार करेंगे। इस बात पर मेरा कहना है कि आपको समान विचार करने वाले व्यक्ति या परिवार के किसी सदस्य के साथ अपने थैरेपिस्ट के पास जाना चाहिये। आपका समाज तो आपने कुछ भी किया हो, बातें बनाएगा ही। लेकिन बात यह है कि आपको व्यग्रता के दौरे पढ़ रहे हैं, भय से आपके प्राण निकल रहे हैं, इस बीमारी के साथ आपके मन पर गहरे घाव बन रहे हैं, यह आपके अकेले के साथ हो रहा है, समाज के साथ नही। इसलिये किसी के द्वारा ऊंगली उठाए जाने के स्थान पर बेहतर स्वास्थ्य की ओर कदम उठाईये।

अन्त में, यह कहना महत्वपूर्ण है कि उन सभी के लिये, जो मानसिक बीमारी से ग्रस्त है, अनेक विकल्प उपलब्ध है। अनेक डॉक्टर्स जो इस संबंध में सेवाएं देने के लिये उपलब्ध है, इसकी जानकारी जुटाईये और किसी विश्वसनीय स्रोत से दूसरी बार भी राय लेने के बारे में जरुर सोचिये, बिल्कुल वैसे ही, जैसे आप किसी प्राणघातक बीमारी के दौरान करते। लेकिन किसी भी प्रकार से चेतावनी या लक्षणों की उपेक्षा मत कीजिये। मेरा विश्वास कीजिये, आप जितनी जल्दी उपचार करेंगे, आप उतना ही बेहतर हो पाएंगे, देर मत कीजिये।

शैलजा विश्वनाथ एक मुक्त लेखिका, पूर्णकालिक संपादक और जुनूनी ब्लॉगर हैं। वे बेहतर मातृत्व, पठन, लेखन, तैराकी और सोशल नेटवर्किंग को अपने कुछ प्रमुख प्राथमिकताओं में से मानती हैं।

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