डॉ एडवर्ड हॉफमैन

सकारात्मक जीवन

स्वयं के प्रति उदार बनें - डॉ एडवर्ड हॉफमैन

क्या आप बाकी लोगों के साथ उदारता से पेश आते हैं – और क्या स्वयं के साथ भी? या फिर, क्या आप अक्सर स्वयं की आलोचना या स्वयं को लेकर नकारात्मक चर्चा करते हैं? ये सारे प्रश्न उस स्थिति के लिये जाने जाते हैं जिसे आत्म दया कहते हैं, सकारात्मक मानसशास्त्र में इस विषय को लेकर काफी चर्चा हो रही है। किसी भी व्यक्ति को पूरी देखभाल के साथ, ध्यान से और उदारता से व्यवहार देना वास्तविक अनुसंधानों में पिछले बारह वर्षों से जारी है। शोध निरंतर यह बताते हैं कि आत्म दया का सीधा अर्थ जीवन की संतुष्टि, आशावादिता, प्रियता और जीवन के सौन्दर्य से है। यह व्यग्रता को कम करने और अवसाद के इलाज के रुप में भी है और यह आपको किसी भी तनाव भरी स्थिति में, जो कि दैनिक जीवन में आ सकती है, एक बेहतर सहायक के रुप में मदद करता है।

आत्म दया संबंधी विश्व की सबसे प्रमुख अनुसंधानकर्ता डॉ. क्रिस्टीना नेफ है जो कि ऑस्टिन के युनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास में कार्यरत है। वे सबसे पहले इस विषय को लेकर वर्ष 1990 के आस पास गंभीर हुई थी, जब वे स्नातक विद्यार्थी के रुप में ;इनसाइट मेडिटेशन’ के सत्रों में शामिल हुई और उस समय विवादास्पद विवाह विच्छेद के दौर से गुज़र रही थी। ’मेरे जीवन में बहुत ज्यादा तनाव था’ वे याद करते हुए एक साक्षात्कार में बताती हैं। ’मुझे वाकई आत्मदया की जरुरत थी जिससे मैं इस संवेदनात्मक बवंडर में से बाहर निकल सकूं. मैं एक बौद्ध समूह में थी और वे एक सचेत और करुणामय स्थिति के बारे में बात करते थे। आत्म दया की स्थिति ने मुझे तुरंत अपनी ओर आकर्षित किया। मुझे लगा कि अरे वाह, कितना अच्छा है, मेरे पास भी अन्य सभी के समान स्वयं पर करुणा करने का अधिकार है।” अनेक वर्षों बाद, नेफ को जीवन की ओर से एक और झटका लगा, जब उन्हे और उनके पति को यह पता लगा कि उनके बेटे को ऑटिज्म है। ’एक बार फिर,’ वे याद करती हैं, ’इसने फिर से मेरी रक्षा की, मुझे स्वयं को लेकर गंभीर होने का समय दिया... अब मैं स्वयं को बेहतर तरीके से करुणा अक सन्देश दे सकती हूं। इसने मुझे बचाया है, इसलिये मुझे पता है कि यह काम करता है।“

वर्ष 2003 से, नेफ और उनके सहकर्मियों ने आत्म दया संबंधी शास्त्रगत वैधता और महत्व तथा व्यक्तित्व के अभिन्न अंग के रुप में दर्जनो अध्ययन किये हैं और इस तथ्य को स्थापित किया है। उनके विचार में, आत्म दया तीन विशिष्ट परंतु आपस में जुड़े हुए कारकों से बनती है: 1) आत्म करुणा; 2) सामान्य मानवीयता की संवेदना; और 3) मस्तिष्क की संपूर्णता या एक क्षमता जिसमें अत्यंत दुखद परिस्थितियों और विचारों को भी अतिवाद किये बिना, नाटक या आत्म दया के बिना अभिव्यक्त किया जा सकता है।

आत्म दया में शामिल है स्वयं को लेकर देखभाल और समझ – यह स्वयं को निरंतर दोष देने और आरोपों के घेरे में रखने से बिल्कुल विपरीत है, साथ ही स्वयं को आनंद देने वाला। और इसका परिणाम? बेहतर संतुलन। मानवता के साथ चलने का भाव (प्रत्येक व्यक्ति जीवन में गलतियां करता है, हम सभी यहां पर सीखने के लिये ही हैं जिससे हम आत्मतत्व को पा सके) और इसकी मदद से हम स्वयं को जिस स्थिति में है, वैसे ही स्वीकार करने का साहस जुटा पाते हैं जिससे यह मान सकें कि गलतियां और आदर्श न होना भी मानव की आधारभूत स्थिति है। उदाहरण के लिये इस प्रकार की मन:स्थिति का अर्थ है यह समझना कि हमारे व्यक्तिगत विचार, अनुभूतियां और क्रियाएं, इनपर बाहरी शक्तियों का आर बड़ता है जैसे अभिभावकों का इतिहास, संस्कृति, आनुवांशिकता और वातावरण का प्रभाव। इस प्रकार की जानकारी से हमारी विशेष अनुभूतियों में भी कमी को स्वीकारने और सभी के साथ जुड़ने का भाव आ जाता है।

अन्त में, आपको दुखी करने वाले विचारों को स्वीकार कर लेने की क्षमता जिसमें आपके विचार संतुलित होते हैं, आपके लिये किसी भी प्रकार के संवेदनात्मक दबाव और वैचारिक ग्रस्तता की स्थिति से आपको बाहर निकाल देते हैं और एक प्रतिविष के समान इनपर काम करते हैं। इसमें शामिल है हमारे नकारात्मक विचारों का निरीक्षण और खुलेपन व स्पष्टता का व्यवहार – इसके साथ ही समानंतर रुप से, उन्हे लेकर बार बार एक ही राग आलापने से बचना। साथ में काम करते हुए, ये तीन घटक मिलकर इस बात की पहचान आसान बना देते हैं कि वास्तविकता इस प्रकार ही है – और हमारी उस क्षमता को बढ़ा देते हैं जिसमें हम विविध स्थितियों को लेकर प्रभावी तरीके से प्रतिक्रिया दे पाते हैं।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि आत्म दया और स्वयं पर तरस खाने में फर्क है: आधारभूत तरीके से एक अहंकार से भरा व्यक्तित्व, जिसमें अकेलापन और दुख होता है, वह इस प्रकार का व्यवहार करता है। स्वयं पर तरस खाना अर्थात यह सोचना कि इस पृथ्वी पर इस प्रकार के भाव रखने वाला कोई भी नही है – अथवा इससे भी दुखभरा – तनाव भरा चुनौतीपूर्ण समस्या से भरा समय। इसमें दूसरों से किसी प्रकार के संबंध की उपेक्षा की जाती है। साथ ही, आत्म दया कहीं से भी आत्म विलासिता नही है। अनेक लोग यह कहते हैं कि वे आत्म दया को लेकर अनिच्छा रखते हैं क्योंकि वे अपने आस पास शून्य और जोखिम के प्रकार के व्यवहार से घिर जाएंगे, इस बात का उन्हे ड़र लगता है, (आज मुझे तनाव लग रहा है इसलिये मैं घर पर हूं, दिन भर टीवी देखना और ढ़ेर सारी आईसक्रीम खाना”)

 लेकिन इस प्रकार का व्यवहार आत्म विलासिता है – आत्म दया नही है – क्योंकि यह आपको दीर्घावधि में कमजोर बनाता है न कि शक्तिशाली। अपने सबसे अच्छे मित्र को बुरा महसूस होने पर जंक फूड खाने की सलाह देना, इसे भी दया के प्रकार से दी गई प्रतिक्रिया नही कहा जा सकता। इसलिये आत्म दया अर्थात स्वयं को अपने बेहतर मित्र के समान व्यवहार देना होता है, आप स्वयं को पैदल चलने के लिये प्रेरित करते हैं, जिम में व्यायाम के लिये प्रेरित करते हैं या कुछ सृजनात्मक करने के लिये और जिसमें आपकी रुचि है, ऎसा काम करने के लिये प्ररित करते हैं न कि मूड खराब होते बराबर सो जाने के लिये कहते हैं।

इस बात में कोई आश्चर्य नही है कि आत्म दया संबंधी विचारों की कमी के कारण ही भोजन संबंधी विकारों में वृद्धि होती है। जैसा कि डॉ मिखाईल मान्ट्झियस और जेनेट विल्सन ने युनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ यूके में यह सलाह दी है, कि मोटापे से ग्रस्त लोगों में स्वयं को प्रभावी रुप से प्रसन्न करने की क्षमता नही होती है – इसलिये, वे बाहरी भोजन जैसे कारकों से इसकी पूर्ति करते हैं। इसके साथ ही, मोटापे के कारण किसी बात का हौव्वा बन जाना, अकेलापन शर्म आना आदि स्थितियों के बन जाने के कारण व्यक्ति अपनी संवेदनात्मक परेशानियों से बाहर निकलने के लिये भी अधिकाधिक भोजन की शरण में जाना शुरु कर देता है। और फिर उन्हे इस अधिक भोजन के कारण नकारात्मक विचार आते हैं, और यह चक्र चलता रहता है।

इस प्रकार की स्थिति के लिये अनुभवजन्य मदद मौजूद होती है। ल्युसियाना स्टेट युनिवर्सिटी के डॉ क्लायरे एडम्स द्वारा किये गए एक शोध अध्ययन में सामने आया है कि कॉलेज जाने वाली लड़कियों में प्रतिबन्धात्मक भोजन की आदतें होती हैं (इसमें अस्वास्थ्यकर भोजन को टालने का लक्ष्य होता है) उन्हे तनाव कम होता है और आत्म दया संबंधी विचारों के बाद कम भोजन की आदत पाई जाती है और इसे यदि नियंत्रित समूह के साथ तुलना में लिया जाए तो यह कम होता है। अपने शोध के परिणामों को बताते समय शोधकर्ता कहते हैं कि, ’सामान्य रुप से वे लोग जो स्वयं को आत्म दया के भाव से देखते हैं खासकर अधिक भोजन के समय, वे अपने भोजन को नियमित कर पाने में सफल होते हैं, क्योंकि वे भोजन के समय नकारात्मक स्व भावनाओं से प्रेरित नही होते, और यही कारण है कि वे वास्तविक प्रतिबन्धात्मक भोजन करने वाले बन पाते हैं।’

आत्म दया की मदद से संपूर्ण स्वास्थ्य पर होने वाले परिणामों को लेकर भी साक्ष्यों में वृद्धि हो रही है। एक अध्ययन जिसे कैनेडा युनिवर्सिटी के डॉ फुशिता सिरोइस द्वारा किया गया, इसमें आत्म दया को सीधे स्वास्थ्य को बेहतर बनाने वाली आदतों से जोडा गया जैसे भोजन की मात्रा कम करना, जंक फूड को टालना, नियमित शारीरिक व्यायाम, आवश्यक नींद लेना और प्रभावी तनाव प्रबन्धन। साथ ही ऑस्ट्रेलिया में डॉ वेन्डी फिलिप्स और सूसन फर्ग्युसन द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण में, 65 वर्ष की आयु के बाद के स्त्री और पुरुषों में आत्म दया को लेकर शोध किया गया और इसे सकारात्मक रुप से संवेदनाओं से जुड़ाव के साथ पाया गया जैसे आनंद, स्वयं की शक्तिशाली पहचान और जीवन के अर्थ की अनुभीति, साथ ही नकारात्मक संवेदनाएं जैसे गुस्सा और पश्चाताप।

अति आदर्शवाद से बाहर निकलना

आत्म दया के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध होता है अति आदर्शवाद। कोई भी मनुष्य कभी भी आदर्श नही हो सकता, किसी एक क्षेत्र में भी नही। मेरा यह पक्का विश्वास है कि हम सभी के द्वारा अपनी प्रतिभा और क्षमताओं का पूरा पूरा उपयोग किया जाना चाहिये। लेकिन अब्राहम मैस्लो का उच्च उपलब्धि वाला, स्वयं को पूर्ण करने वाला स्त्री और पुरुषों का मॉडल भी मानक परिभाषा से काफी दूर रहा है। यह सही है कि मेस्लो ने बुद्धिमत्ता के साथ ही अति आदर्शवाद को लेकर चेतावनी दी थी, हाल ही में होने वाले सकारात्मक मानसशास्त्र संबंधी शोध बताते हैं कि अति आदर्शवादी अन्य लोगों के मुकाबले कम खुश रहते हैं।

इस गतिविधि में, अपने जीवन को लेकर उस तथ्य की पहचान करें जिसके संबंध में आपको कई बार, या कहें कि हमेशा ही मुकाबला करना मुश्किल होता है और इसका कारण है आपका अति आदर्शवादी होना। इसमें शामिल है आपका काम, छुट्टियों पर जाना, परिवार या अन्य सामाजिक संबंध – इसका एक कठिन कारक यह है कि आप स्वयं को लेकर ही इतने आग्रही हो जाते हैं और इसके चलते स्वयं को आराम करने, शांत होने या गलतियां करने से रोकने लगते हैं। यदि विशेष स्वरुप में कहा जाए, तब उस स्थिति के बारे में कहिये जो कि पिछले महीने हुई थी जिसमें आपने अति आदर्शवाद के कारण अपने मूड को खराब किया या अन्य लोगों के साथ अपनी बातचीत को लेकर समस्या पैदा की। वह कौन सी गतिविधि का प्रकार था? आपके साथ उसमें कौन शामिल था? अब उस स्थिति के बारे में विचार करने पर, यदि आप आदर्शवाद को परे रख देते, तब सोचिये कि क्या आपने स्वयं को और अधिक बेहतर तरीके से व्यवहार दिया होता या नही?

डॉ. एडवर्ड हॉफमैन याशिवा युनिवर्सिटी न्यूयॉर्क सिटी में मानसशास्त्र के सहायक प्राध्यापक है। वे निजी सेवा के लिये क्लिनिकल सायकोलॉजिट के रुप में लायसेन्सधारक हैं। आपने मानसशास्त्र और संबंधित विषयों पर 25 से भी अधिक पुस्तकों क असंपादन किया है। डॉ हॉफमेन डॉ विलियम कॉमटन के साथ सकारात्मक मानसशास्त्र पुस्तक के सह लेखक हैं। आनंद का व उत्साह का शास्त्र नामक इस पुस्तक के लेखक और भारत में जर्नल ऑफ ह्युमेनेस्टिक सायकोलॉजी जर्नल के संपाद्क हैं। आप उनसे इस पते पर संपर्क कर सकते हैं columns@whiteswanfoundation.org