डॉ श्यामला वत्स

किशोरावस्था की विस्मय दुनिया

अपने नाज़ुक व्यक्तित्व से जूझ रही उस लड़की की क्या आप मदद कर सकते हैं? - डॉ श्यामला वत्स

जेनी करीब पच्चीस साल की एक व्यावसायिक मॉडल है। वह अस्पताल के बाह्य रोगी विभाग में आती है एक खूबसूरत मुस्कुराहट के साथ और गुनगुनाहट के जैसे अपने ’सुप्रभात’ की कामना से सभी को मोहित करती चलती है।

यह बाहरी चुलबुलापन और खुशमिजाज़ी एक तरीके से उसके अन्दर छुपी उस दुखी बच्ची को बचाने का एक हथियार है। उसका बचपन बड़ा ही जटिल और नाटकीय रहा है। उसके खामोश डर जो अनेक लोगों के कारण उसे मिले, जिनमें उसके परिवार के सदस्य भी शामिल है। बेहतर बौद्धिक स्थिति होने के बावजूद उसका स्कूल उसे किसी दुस्वप्न से कम नही लगा। अपनी उम्र के 15 वे वर्ष में उसे पता चला कि उसे डिसलेक्सिया है और वह बुद्धू कतई नही है। उसने स्वयं ही अपनी सीखने संबंधी दुर्बलताओं की जांच करवाई थी और उसे यह भी लगा कि इस बारे में किसी को कुछ भी चिन्ता नही थी।

अपनी किशोरावस्था से लेकर उसके आसपास अनेक पुरुष मित्र रहे जो सभी उसका समान रुप से शोषण करते रहे, एक के बाद दूसरा जो पहले के समान ही शोषणकर्ता रहा, वह प्रत्येक उस संबंध में जिसमें प्रेम और विश्वास के साथ सकारात्मकता लेकर शामिल हुई, उसे निराशा ही मिली। उसे केवल एक विशेष व्यक्ति की तलाश थी जो उसे सच्चा प्रेम दे सके, जैसे कि उसने अपनी सारी प्राथमिकताएं अपने संबंध के लिये रखी थी।

उसने लोगों को उनके स्वभाव और व्यवहार में जमीन और आसमान का फर्क लाते देखा था, उसने ’सबसे बेहतर’ माने जाने वाले लोगों के साथ समय बिताया था जो दिखाई देने में उत्तम छवि के थे लेकिन सभी धोखेबाज़ निकले। उनका बेहतर व्यक्तित्व अचानक जटिल और पूरी तरह से खराब हो जाता था जब वह कोई मांग करती या अधिकार जताया करती थी। इसके बाद उसके पुरुष मित्र उसे टालना शुरु कर देते और उसके कॉल और टेक्स्ट मैसेजेस का जवाब भी नही देते। इसके कारण वह फिर से आंसुओं से भरे उस समय में पहुंच जाती थी जहां पर उसे जो समझ में आता, उसे जमीन पर पटक देती फिर वह उसका फोन हो, कॉफी मग, किताबें या और कुछ भी। इसके बाद वह उस मित्र को कोई मैसेज भेजती कि क्या वह किसी और के साथ है। यह उसके साथ अनेकानेक संबंधों में हुआ। कुछ दिनों के बाद वे फिर से सामान्य हो जाते।

उसने कभी भी किसी संबंध को अपनी ओर से खत्म करना नही चाहा क्योंकि उसके लिये सबसे बड़ा डर था उपेक्षा का और अकेले पड़ जाने का। इसके चलते यही होता था कि हमेशा ही लड़का उसके जीवन से बड़े ही नाटकीय तरीके से, तमाशा बनाकर बाहर निकलता था, उसे एकदम जटिल, खराब और असहाय स्थिति में डालकर।

उसने अब तक प्रत्येक सड़क पर मिलने वाले नशीले पदार्थ को उपयोग में लाकर देख लिया था जो उसके लिये ब्रेक अप के बाद  ’दर्द को कम करने’ के लिये था। उसने उसकी मां को दी जाने वाली दवा की ज्यादा मात्रा भी ले ली थी जिसे लेकर वह हमेशा के लिये सो जाना चाहती थी, और उसे इससे पहले भी दो बार, स्टमक वॉश के लिये अस्पताल ले जाया जा चुका था।

एक दिन, अन्तर्मुखी होते हुए, उसने कहा कि उसे तभी अच्छा लगता है जब वह अपने दोस्तों के साथ आनंद मनाती है और इसमें अल्कोहल और बाकी चीजों का होना जरुरी है। वह अकेलापन बर्दाश्त नही अक्र सकती है। जब वह अपने कमरे में अकेली होती है, तब उसे यह शंका होने लगती है कि क्या उसका अपना व्यक्तित्व है भी या नही, वह अपने आप को उन विचारों में धकेल देती है जब वह अन्य सभी से बाते कर रही थी। उसके हिसाब से, उसका कोई स्थिर व्यक्तित्व नही था, उसके होने का कोई अर्थ नही था।

अधिकांश स्थितियों में, उसे यही विचार आते रहते थे जब वह बाद में बताती थी कि यह ’मेरी आत्मा का खालीपन’ था। उसके गालों पर आंसू ढुलकते रहते जब वह यह बताती कि कुछ महसूस करने के लिये कैसे उसने अपने हाथों पर रेजर चला दिये थे जिससे वह दर्द को महसूस कर सके, उस खालीपन की बजाय दर्द ज्यादा बेहतर था। जब उसे तब भी कुछ महसूस नही हुआ, वह सारी रात रोती रही। शायद उन्ही अन्धेरे क्षणों में कभी उसे उसके आन्तरिक दर्द और दुख की जानकारी हुई। एक दिन उसने अचानक  यह निष्कर्ष निकाल लिया कि उसे अवसाद है और उसे मानसशास्त्री के पास जाकर दवाईयां लेना है।

अपने शुरुआती साक्षात्कार में, यह तय था कि वह अवसाद में ही थी। उसके लिये अवसादशामक दवाएं शुरु कर दी गई। इसके साथ ही, यह भी स्वाभाविक ही था कि उसकी बीमारी का निदान अवसादात्मक परिस्थिति के रुप में हुआ लेकिन इससे उसकी समस्याएं खत्म नही होनी थी। मेरे पास वह हफ्ते में एक बार आती थी और जब तक उसकी दवाईयां चली, यह क्रम जारी रहा, इसके बाद मैने उसे क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट के पास जाकर सायकोथैरेपी लेनेके लिये कहा और उसकी दवाईयों का ध्यान रखते हुए वह महीने में एक बार मेरे पास आती रही।

इस प्रकार के व्यक्तित्व का प्रसार, हमारी सोच से कहीं ज्यादा होता है। यह लड़कियों में, लड़कों की तुलना में ज्यादा होता है। कई लड़कियां होती है जिन्हे ड्रामा क्वीन कहा जाता है, उन्हे वास्तव में अनुभवी क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट की जरुरत होती है जो उन्हे भ्रम और आन्तरिक डर से बाहर निकाले, इलाज के अलावा मानसशास्त्री उन स्थितियों का भी इलाज करते हैं जिसमें नाज़ुक व्यक्तित्व से संबंधित व्यक्तियों का इलाज किया जाता है।

इस शृंखला में, डॉ. श्यामला वत्स द्वारा किशोरावस्था में होने वाले बदलाव और मानसिक समस्या के बारे में बात की है। ये लेख बताते हैं कि कैसे मानसिक समस्या संबंधी लक्षण सामान्य किशोरावस्था के व्यवहार में दिखाई देते हैं। युवाओं की कहानियों के द्वारा, वे बिना किसी कारण के समस्या में रहने वाले सभी को जानकारी देना चाहती हैं, यह जरुरी है कि मित्र और परिवार सामान्य सीमाओं से बाहर के व्यवहार को पहचानें और इससे पहले कि स्थिति हाथ से निकल जाए, तुरंत मदद लें।

डॉ श्यामला वत्स, बैंगलोर की मानसशास्त्री हैं जो पिछले बीस वर्षों से अपनी सेवाएं दे रही हैं। यदि आपको कोई समस्या या प्रश्न है जो आप उनसे बांटना चाहते हैं, तब उन्हे लिख सकते हैं columns@whiteswanfoundation.org पर।