डॉ. नंदिनी मुरली

अर्धविराम

आत्महत्या के वियोग का सामना करना - डॉ. नंदिनी मुरली

आत्महत्या के वियोग का रहस्यमय अनुभव हमें एक अनूठा दृष्टिकोण प्रदान करता है। शायद आत्महत्या के 'क्यों' प्रश्न की खोज को खत्म करने के बाद ही हम अपने जीवन के लिए एक नए परिभाषित 'क्यों' की खोज कर सकते हैं।

- एलन वोल्फेल्ट, अंडरस्टैंडिंग योअर सुसाइड ग्रीफ

आत्महत्या से होने वाली मौत एक रहस्यमय, गूढ़ और भ्रमित करने वाला अनुभव है। अचानक होने वाली हिंसक मौत, आत्म-संरक्षण के हर मानदंड का उल्लंघन करती है। आश्चर्य की बात नहीं है कि किसी प्रियजन के आत्महत्या कर लेने के बाद वियोग से बच पाना चुनौतीपूर्ण है।

आत्महत्या (साथ ही हत्या, दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा में हुई मौत) के बाद प्रियजनों का वियोग दर्दनाक है। आत्महत्या के उत्तरजीवी के रूप में मेरे पति की आत्महत्या एक अप्रत्याशित घटना थी। आकस्मिक। खौफनाक। चौका देने वाली। मैं न सिर्फ अपने साथी के जाने का दुख मना रहा थी, इससे मुझे गहरा सदमा भी लगा था। और भी ज्यादा इसलिए, क्योंकि इस घटना का अवलोकन मैंने किया था।

आत्महत्या की घटना के बारे में बात करना आसान विषय नहीं है। आत्महत्या की चर्चा पर बदनामी, शर्म और कलंक हावी रहते हैं, जो चुप्पी और रहस्य को बढ़ावा देते हैं। आत्महत्या को आमतौर पर एक व्यक्तिगत घटना के रूप में माना जाता है जो कि व्यक्तिगत व्यवहार से प्रेरित होती है। ऐसी घटनाओं को समुदायों को प्रभावित वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप नहीं समझा जाता है।

आत्महत्या के वियोग के बारे में इस तरह की नकारात्मक रूढ़िवादिता, आत्महत्या के दुःख को बुरी तरह प्रभावित करती हैं जिससे पीड़ित व्यक्ति को 'आत्महत्या के वियोग के अंधकार' में आगे बढ़ना पड़ता हैं - एक अकेला और विच्छिन्न कर देने वाला एवं भयावह अनुभव। आत्महत्या से होने वाली मौत ही एकमात्र ऐसी मौत है जिसमें परिजनों को सच्चाई को अस्वीकार करना पड़ता है, या कारणों को छिपाना पड़ता है, या मौत के लिए सामाजिक रूप से स्वीकार्य कारण खोजने के लिए मजबूर होना पड़ता है क्योंकि आत्महत्या एक सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक वर्जना है। हमें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है क्योंकि हम मृतक, अपने परिवार और खुद के लिए सम्मान की भावना को पुनः प्राप्त करने के एक हताश प्रयास में मौत की विधा को नए अंदाज में रचना चाहते हैं।

आत्महत्या के बाद स्वयं जीवित रह जाने की ग्लानि से परेशान परिजनों में से अधिकांश एक बुनियादी सवाल से जूझते रहते हैं: मैं या हम मौत का पूर्वानुमान लगाने और इसे रोकने के लिए क्या कर सकते थे? आत्महत्या और मृत व्यक्ति के निर्णय को हम अपनी जिम्मेदारी मान लेते हैं। हम अपने वियोग की व्यथा की मात्रा ऐसे सवाल जवाब कर बढ़ा लेते हैं। मृतक ने किस बात को लेकर जीवन खत्म कर लिया, यह समझने की कोशिश करने लगते हैं।

इसके साथ ही हम मौत के अर्थ निकालने की अपनी हताशा में एक व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक चीरफाड़ यानि मामले की बखिया उधेड़ने की तीव्र आवश्यकता से प्रेरित हो जाते हैं। सीमित जानकारी के साथ हम इस मौत की पहेली को सुलझाने की चाह में इस घटना में अपनी भूमिका को समझने की कोशिश करते हैं। भले ही हम पूरी तस्वीर सामने लाने की इच्छा रखते हों, लेकिन सच्चाई के कई आक्रामक क्षणों के बाद हमें यह एहसास होगा कि चाहे हम कितनी भी कोशिश कर लें, हम कभी भी निश्चितता के साथ नहीं जान पायेंगे कि हमारे प्रियजनों ने क्यों अपने जीवन के इस अंत को चुना। मृतक के परिजन होने के नाते इस कढ़वे सच का सामना करना और इसे स्वीकार करना हमारी बेहतरी के लिए जरूरी है।

आफ्टर सुसाइड लॉस: कोपिंग विद योअर ग्रीफ में डॉ. जॉन जॉर्डन लिखते हैं "ऐसी कई चीजों जिन्हें आप हल्के में लेते हैं, आत्महत्या उन्हें बिखरा सकती है, आपके रिश्तों और आपकी दुनिया को तार-तार कर सकती है।" कई चीजें जो बदल सकती हैं उनमें अपने प्रियजन को लेकर हमारी धारणा और उसके साथ हमारे रिश्ते की प्रकृति शामिल है। हमारी वास्तविकता नकार दी जाती है और हम एक कठोर वास्तविकता को जांचना शुरू कर देते हैं: क्या हम वास्तव में अपने प्रियजन को पूरी तरह जानते थे? या हम किसी अजनबी के साथ रह रहे थे?

आत्महत्या से किसी प्रियजन को खो देने के बाद परिजनों का सामना कई ऐसे विषयों से होता है, जो बार-बार उठते हैं। सबसे पहले तो हमें इस रहस्यमयी मौत का मतलब निकालने की जरूरत पड़ती है। हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि मृतक ने किस बात प्रेरित होकर यह कदम उठाया। हम इस घटना में अपनी भूमिका और मौत के लिए कितने जिम्मेदार है इसका पता लगाते हैं। सामाजिक तौर पर आत्महत्या को पाप और अपराध के रूप में माने जाने के कारण हम क्रोध, अपराधबोध, और दोषारोपण की अशांत भावनाओं से घिर जाते हैं।

जॉन जॉर्डन कहते हैं "आत्महत्या एक कठिन पहेली है।" अन्य किसी तरह की मौत से विपरीत आत्महत्या के मामले में पीड़ित स्वयं ही अपराधी होता है। स्वाभाविक रूप से मृतक के परिजन खुद को एक दुविधाजनक स्थिति में पाते हैं। अपने पति द्वारा मेरा प्यार ठुकराए जाने से मैं उनसे नाराज थी। उनका खुदकुशी करना एक परित्याग की तरह महसूस हुआ। इस घटना को रोक नहीं पाने के कारण मैं खुद से भी नाराज़ थी। आत्महत्या के निर्णय की भूमिका का शाश्वत प्रश्न है - क्या आत्महत्या स्वैच्छिक है? स्वतंत्र इच्छा का एक कार्य? या यह तनाव, मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों जैसे कारकों से प्रभावित होता है जो किसी व्यक्ति को अपना जीवन खत्म कर लेने के लिए प्रेरित करता है?

ज्यादातर लोग, जो शोक व्यक्त करने के लिए आते हैं, वे आत्महत्या क्यों की गई इसके बारे में हमसे पूछते हैं। जब मेरे साथ ऐसा हुआ, तो मैंने खुद को अपने पति की तरफदारी करते हुए पाया; व्यक्तिगत और पेशेवर दोनों तरह से उनके अद्भुत गुणों का बखान करते सुना। इस बात से अनजान कि आत्महत्या का कारण बताने के लिए एक वाक्य का कोई सरल स्पष्टीकरण नहीं है मैंने पाया कि मैं हम दोनों को आत्महत्या के कलंक से दोषमुक्त करने की कोशिश कर रही हूं। क्या किसी अन्य वियोग में ऐसा हो सकता है? कुछ लोगों की बातचीत में हार्दिक संवेदनाएँ थीं। सहानुभूति और करुणा की कमी थी। मुझे यकीन है कि अगर एक 'स्वाभाविक' अचानक मृत्यु के कारण मैं शोक मना रही होती, तो प्रतिक्रियाएँ अधिक सहारा देने वाली होतीं।

आश्चर्य नहीं कि आत्महत्या से होने वाली मौत सामाजिक संबंधों को बाधित करती है। आत्महत्या करने वाले के अधिकांश परिजन इस बात से भयभीत और अनिश्चित रहते हैं कि दोस्त और परिवार उन्हें कैसे देखेंगे। और बदले में, ज्यादातर लोग उतने ही अनिश्चित और अनभिज्ञ होते हैं कि आत्महत्या करने वाले के परिजन के साथ उचित तरीके से प्रतिक्रिया कैसे करें। शुरुआत में बातचीत में झिझक और असुविधा; उसके बाद निंदा और अस्वीकृति। अस्पष्टता इस शोक को गहराई से अलग कर देती है।

जॉर्डन के अनुसार, आत्महत्या से होने वाली मौत भी परिवारों में जानकारी के आदान-प्रदान की समस्या पैदा करती है। अधिकांश परिवारवाले इस बात पर सहमत नहीं हो पाते हैं कि मृत्यु का कारण साझा करने को लेकर वे सहज महसूस करेंगे या नहीं। इस प्रकार बताना या न बताना अलगाव का एक विवादास्पद मुद्दा बन जाता है जो परिवारों को बांट देता है। हालांकि अधिकांश परिवार इसे गुप्त रखना पसंद करते हैं तथा यह निर्णय सदस्यों की बेहतरी पर शक्तिशाली प्रभाव डालता है। चूंकि आत्महत्या के बाद परिवार एक ऐसी कहानी बनाने के लिए संघर्ष करते हैं जिससे सभी लोग सहमत हों, ऐसे में परिजनों के बीच पारिवारिक सामंजस्य की कमी पारिवारिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचता है। ये मामले को जटिल बनाता है और आत्महत्या के उत्तरजीवी आगे के सफर में मूल्यवान सहयोग से वंचित रह जाते हैं।

डॉ. नंदिनी मुरली संचार, लैंगिक और विविधता से जुड़ी एक पेशेवर है।आत्महत्या हानिकी हालियाउत्तरजीवी,उन्होंने आत्महत्या पर चर्चाओं को बदलने और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए एमएस चेलामुथू ट्रस्ट एंड रिसर्च फाउंडेशन, मदुरै की पहल परस्पीककी स्थापना की है।