We use cookies to help you find the right information on mental health on our website. If you continue to use this site, you consent to our use of cookies.
डॉ एडवर्ड हॉफमैन

सकारात्मक जीवन

उच्चतम अनुभव: खुशी का एक रास्ता - डॉ एडवर्ड हॉफमैन

अगर आप 30 साल के हैं और किसी संकटमय दौर से गुजरते हुए अचानक आनंद की भावना से उस पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, परम आनंद की तरह मानो आपने उस दोपहर के उज्ज्वल टुकड़े को निगल लिया हो, तब आप क्या करोगे? कैथरीन मैन्सफील्ड ने प्रसिद्ध लघु कहानी, ब्लिस में इस बारे में पूछा है। संयोगवश, 20वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ब्रिटिश लेखिका खुद उस वक्त 30 वर्ष की थीं, और हालांकि वह अपनी चिरकालिक बीमारी के कारण सिर्फ चार साल ही और जीवित रहीं। उनका जीवन चकित कर देने वाले क्षणों से जीवंत था। ऐसा लगता है कि मैन्सफील्ड ने हमारी भावुकता और संभवत: शारीरिक भलाई के मूल्यों को उजागर करने वाली अब्राहम मॉस्लो की वैज्ञानिक खोज के मूल्यांकन के लिए यह सवाल किया होगा।

मॉस्लो ने इन्हें उच्चतम अनुभव बताया। ये अनुभव उस वक्त सामने आए जब वह 1940 के दशक के मध्य में भावनात्मक रूप से स्वस्थ, उच्चता प्राप्त वयस्कों के बारे में अध्ययन कर रहे थे। जिसे बाद में उन्होंने "आत्म-यथार्थता" कहा। न्यूयॉर्क शहर में एक युवा प्रोफेसर रहने के दौरान मॉस्लो को ज्ञात हुआ कि उनका शोध तब तक मनोविज्ञान के लिए क्रांतिकारी था, जब तक उन्होंने पूरी तरह से अपना ध्यान मानसिक रूप से बीमार या औसत लोगों के कामकाज पर केंद्रित नहीं कर लिया। जैसा कि मॉस्लो ने बाद में स्पष्ट किया कि यदि हम जानना चाहते हैं कि एक इंसान कितनी तेजी से दौड़ सकता है, तो सामान्य लोगों की रफ्तार के औसत का 'अच्छा नमूना' लेने का कोई फायदा नहीं है। ज्यादा अच्छा यह होगा कि ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेताओं को इकट्ठा कर जानें कि वे यह कैसे कर सकते हैं। 

उच्चता हासिल करने वालों से साक्षात्कार के दौरान मॉस्लो ने पाया कि उन्होंने बहुत खुशी के लगातार सामने आने वाले पलों और रोजमर्रा की जिंदगी में उनके पूरा होने की जानकारी दी। इससे भी कहीं आगे ऐसे पलों का वर्णन करने वाले शब्द अक्सर इतिहास के महान सूफी संतों के विचारों के समान थे। लंबे समय तक धार्मिक मान्यताओं को लेकर नास्तिक रहे मॉस्लो इन परिणामों से हैरान थे, लेकिन वे कभी भी वैज्ञानिक साक्ष्यों की उपेक्षा नहीं करते थे।  वैज्ञानिक दुनिया के साथ अपने निष्कर्षों को साझा करने से पहले, धीरे-धीरे उन्होंने विभिन्न जीवनियों के आंकड़े, अलग-अलग क्षेत्रों में अत्यधिक सफल पुरुषों व महिलाओं से विस्तृत साक्षात्कार और महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के सर्वेक्षणों को इकट्ठा किया। 1956 में अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए उनके पत्र में मानव स्वभाव की उच्चतम पहुंच और उच्चतम अनुभवों के बीच के संबंध का विस्तृत ब्यौरा दिया गया था और इस तरह के महान क्षणों के लगभग 20 लक्षणों का वर्णन किया गया था। इसमें ब्रह्मांड के भव्य दर्शन से पहले बहुत खुशी, भय की भावना, समय और स्थान के संबंध में अस्थायी भटकाव आदि शामिल था।

उनके पेपर में समावेशित सबसे महत्वपूर्ण पहलू में, मास्लो ने कहा कि उच्चतम अनुभव अक्सर गहरा और परिवर्तनकारी प्रभाव छोड़ते हैं। उन्होंने टिप्पणी की, कि आम तौर पर व्यक्ति यह महसूस करने को तत्पर है कि जीवन सार्थक है...क्योंकि इसके अस्तित्व को सौंदर्य, सच्चाई और अर्थपूर्णता के रूप में प्रदर्शित किया जाता रहा है, भले ही आम तौर पर यह नीरस, मामूली, कष्टपूर्ण या असंतुष्टिदायक हो। बाद के वर्षों में, मॉस्लो ने अनुमान लगाया कि अवसाद, शराब और नशीली दवाओं की जकड़ में आने जैसे भावनात्मक विकारों से पीड़ित लोगों को ऐसे चमत्कारिक क्षणों की भूख थी-और वे उच्चतम अनुभव को प्राप्त करने के लिए गलत प्रयासों के तहत नशीले पदार्थों का सहारा लेने में लगे हुए थे। इसलिए , उनकी प्रभावशाली पुस्तक रीलिजंस, वैल्यूज़ एंड पीक-एक्सपीरियेंसेस में, मॉस्लो ने कवितापूर्ण ढंग से कहा, " उच्चतम अनुभव की शक्ति  जीवन के प्रति (किसी के) दृष्टिकोण को स्थायी रूप से प्रभावित कर सकती है। स्वर्ग की सिर्फ एक झलक इसके अस्तित्व की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त है, भले ही इसे फिर कभी अनुभव न किया गया हो।"

पिछले एक दशक के दौरान, मैंने और मेरे सहयोगियों ने दुनियाभर के युवाओं और अधेड़ों के उच्चतम अनुभवों के बारे में खोजबीन की है। भारत और जापान से लेकर ब्राजील और चिली तक-प्रत्येक देश और क्षेत्र में पारस्परिक आनन्द के क्षण प्रभावी होते हैं। दूसरे शब्दों में, जब हम अपने प्रियजनों, खासकर पारिवारिक सदस्यों के साथ होते हैं, तो हमें खुशी के यादगार पल मिलते हैं। किसी हद तक, उच्चता को सौंदर्यात्मक खुशी, प्रकृति, बाहरी सफलता, धार्मिक गतिविधियों और कौशल श्रेष्ठता से जुड़ी घटनाओं से जोड़ा जाता है। हाल ही मैंने डॉ. गरिमा श्रीवास्तव और डॉ. सोनिया कपूर के साथ एक अध्ययन किया, जो इंडियन जर्नल ऑफ पॉजीटिव साइकोलॉजी में प्रकाशित हुआ था। हमने भारत के एक प्रतिष्ठित मेडिकल यूनिवर्सिटी के नर्सिंग विद्यार्थियों के जवानी के उच्चतम अनुभवों की जांच पड़ताल की। हमने पाया कि इनमें सबसे आम उच्चतम अनुभव बाहरी सफलताओं से जुड़े थे। इसके बाद पारस्परिक आनंद, विकास के संबंध में उल्लेखनीय कार्य और फिर इसके बाद  भौतिक उपहार प्राप्त करने के अनुभव सामने आए। हमारे विचार से भारतीय नर्सिंग शिक्षा में सुधार के लिए इन निष्कर्षों का महत्वपूर्ण संबंध था। 

स्थिरता का अनुभव

बाद के दिनों में, मॉस्लो की रूचि रोजमर्रा की जिंदगी के एक और प्रकार के भावनात्मक उत्थान में हुई। अपने खुद के मिजाज और व्यापक रूप से समकालीनों के साथ साक्षात्कार को उन्होंने "स्थिरता के अनुभवों" के रूप में बताया और मुख्य रूप से इसे अधेड़ अवस्था या बुढ़ापे से जोड़ा। मॉस्लो ने "स्थिरता के अनुभवों" को अद्भुत निश्चिंतता और आत्मिक शांति के विस्तारित अवधि के रूप में वर्णित किया है, जो संभवत: घंटे, दिन या उससे भी अधिक समय तक रह सकता है। उदाहरण के लिए, पुरुष और महिलाएं आमतौर पर अति आवेशित उत्साह की बजाय नम्रता, शांति और उमंग जैसे शब्दों का उपयोग "स्थिरता" के रूप में करते हैं। कई दोपहर अपनी पोती जीनी के साथ बिताते वक्त या महासागर को टकटकी लगाकर देखने के दौरान, अक्सर मॉस्लो के सामने ऐसे वाकये पेश आए। उन्होंने "स्थिरता" को हालांकि उच्चतम-अनुभवों की भावनात्मक और शारीरिक तीव्रता से कम बताया, लेकिन यह शायद वृद्धावस्था में मानव शरीर को बेहतर रूप से अनुकूलित करने वाला था।

हालांकि मॉस्लो व्यक्तिगत विकास के लिए संयोगशील कार्यक्रम विकसित करने के लिए ज्यादा नहीं जी सके, उन्हें विश्वास था कि हम सभी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में "स्थिरता" की उपस्थिति बढ़ाने से लाभान्वित होंगे। उनका विश्वास था कि सांसारिक और साधारण के बारे में हमारी धारणाओं को ताजा करने के लिए दुनिया को नए सिरे से देखना एक तरीका है।   कुछ लोगों ने बताया कि उनके स्थिरता के अनुभवों के दौरान उन्हें आस-पास की सभी चीजें पवित्र और दिव्य दिखाई दीं। 1968 में एक बड़े दिल के दौरे से बचने के बाद मॉस्लो ने पाया कि उनकी चेतना बिल्कुल इसी तरह से बदल गई थी। एक पत्रिका के संपादक के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने इस पर खुलकर टिप्पणी की:

"मैं बहुत आसानी से मर गया था, इसलिए यह मेरे जीवन में एक तरह का अतिरिक्त, बोनस है... इसलिए, मुझे सिर्फ उसी तरह जीना है, जैसे कि मैं पहले से ही मर चुका हूं। मरणोपरांत की जिंदगी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सब कुछ दोगुना मूल्यवान हो जाता है... आप फूलों, बच्चों और खूबसूरत चीजों की ओर खिंचे चले जाते हो। जीने का सलीका, चलना, श्वास लेना, खाना, दोस्ती और बातचीत सब कुछ पहले से ज्यादा सुंदर लगती है, और व्यक्ति चमत्कारों को ज्यादा गहनता से समझने लगता है।"

निर्देशित गतिविधि

अपने जीवन के उच्चतम-अनुभव का वर्णन करें- खासकर, जो पिछले साल के भीतर हुआ हो- इन प्रश्नों के संबंध में: उस समय आपके साथ कौन था, या आप अकेले थे?  खुशी के इस महान पल ने क्या प्रचंडता दिखाई?  इसने जीवन के आपके दृष्टिकोण पर इसके बाद क्या प्रभाव डाला?  और, ऐसे अद्भुत अनुभवों के उत्थान के लिए आप क्या कर सकते हैं?

डॉ.एडवर्ड हॉफमैन न्यूयॉर्क में क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक और येशिवा यूनिवर्सिटी में अनुबंधित मनोविज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं। डॉ. हॉफमैन ने हाल ही में एक पुस्तक लिखी है, पाथ्स टू हैप्पीनेस:50 वेज़ टू एड जॉय टू योर लाइफ एवरी डे।उन्होंने मनोविज्ञान और इससे संबंधित क्षेत्रों में20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित या संपादित की हैं। डॉ. हॉफमैन अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ न्यूयॉर्क शहर में रहते हैं। फुर्सत के लम्हों में बांसुरी बजाना और तैराकी उनके शौक में शामिल हैं।