डॉ. नंदिनी मुरली

अर्धविराम

आत्महत्या पर गैर जिम्मेदाराना सूचना देने का प्रभाव: एक व्यक्तिगत कथा - डॉ. नंदिनी मुरली

मैं पिछले दो वर्षों से आत्महत्या रोकथाम कार्यकर्ता के रूप में काम कर रही हूँ। इस दौरान आत्महत्या और आत्महत्या से सम्बन्धित मुद्दों के प्रति लोगों की असंवेदनशीलता ने मुझे हमेशा विस्मित किया है। लेकिन हाल ही में एक घटना ने मुझे चौंका दिया।

कुछ समय पहले मुझे एक प्रसिद्ध रेडियो प्रसारण स्टेशन द्वारा प्रायोजित महिला दिवस कार्यक्रम में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था। मेरा भाषण पूरा होने पर कार्यक्रम-उद्घोषक रेडियो जॉकी (आरजे) ने यह कहते हुए मेरी सराहना की कि मैं प्रेरणा का एक स्रोत हूँ, खासकर चूंकि "मेरे पति ने आत्महत्या कर ली थी" ।

यह घटना मीडिया पेशेवरों द्वारा आत्महत्या के चित्रण के बारे में कई समस्याग्रस्त मुद्दों पर प्रकाश डालती है। सबसे पहले उस आरजे को मेरी सहमति के बिना इस बात के खुलासा करने का कोई अधिकार नहीं था कि मैं आत्महत्या की उत्तरजीवी हूँ। मैं इस बात का खुलासा नहीं करना चाहती थी क्योंकि ये बात मेरे भाषण के संदर्भ में प्रासंगिक नहीं थी। ऐसा करने से उसने मुद्दे से बाहर जाकर आत्महत्या को संदर्भित किया, इसे सनसनीखेज बनाया और साथ ही सबका ध्यान बटोर लिया। दूसरा, "आत्महत्या की" वाक्यांश का उपयोग इसे आपराधिकता के संदर्भ में रखता है जो केवल इस मुद्दे से जुड़े प्रतिबंध को स्थायी बनाता है। वह तर्क दे सकता है कि उसका इरादा नेक था लेकिन इसका मुझ पर अतिक्रमणात्मक और अंतर्वेधी प्रभाव पड़ा।

आत्महत्या एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बन्धी मुद्दा है। इसकी रोकथाम और नियंत्रण एक कठिन चुनौती है। आत्महत्या की रोकथाम के प्रयास में स्वास्थ्य देखभालकर्ता, कानून स्थापित करने वाली संस्था, मीडिया, सरकार, सामाजिक एजेंसियां, धार्मिक नेता, परिवारों और समुदायों जैसे विभिन्न हितधारकों के अभिसरण की जरुरत होती है। जब हमने मधुराई में स्थित आत्महत्या रोकथाम उपक्रम – स्पीक- की शुरुआत की तो हमने आत्महत्या को जिम्मेदारी से संबोधित करने के एक कार्यक्रम के लिए शहर के मीडिया पेशेवरों को आमंत्रित किया। केवल 2 लोग आए।

आत्महत्या एक जटिल और उलझा हुआ मुद्दा है जिसका आत्महत्या का प्रयास करने वाले और इससे हुए नुकसान के उत्तरजीवियों पर एक लंबे समय तक शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से प्रभाव पड़ता है। विश्व स्तर पर हर साल लगभग 8,00,000 लोग आत्महत्या करते हैं और हर आत्महत्या का प्रभाव कम से कम छह लोगों पर पड़ता है। जनमत को प्रभावित करने और रवैये में बदलाव लाने की शुरुआत करने में अपनी विशाल पहुँच और प्रभाव के कारण मीडिया की भूमिका अहम हो सकती है।

मीडिया में आत्महत्या की जिम्मेदार और संवेदनशील सूचना देने के लिए नीचे कुछ अपरक्राम्य दिशानिर्देशों की सूचि दी गयी है:

आत्महत्या की सटीक और जिम्मेदाराना सूचना देने पर ध्यान दें: आत्महत्या एक वर्जित मुद्दा है जो इन चार कारकों से घिरा हुआ है- कलंक, शर्म, गोपनीयता और चुप्पी। आत्महत्या पर रपट करना, सिर्फ इसलिए क्योंकि यह समाचार योग्य है, और इस कारण इसे सनसनीखेज बनाना, सामान्य बनाना या समस्याओं के समाधान के रूप में पेश करना इससे जुड़े मिथकों और भ्रांतियों को और बढ़ावा देता है।

आत्महत्या के बारे में जनता को शिक्षित करने का मौका न छोड़े: आत्महत्या जैविक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और पर्यावरण कारकों के अभिसरण का परिणाम है। यह कभी किसी एक कारक का परिणाम नहीं होता है। लेकिन ज्यादातर मीडिया की रपट किसी एक कारक पर ध्यान केंद्रित करती हैं। जैसे परीक्षा में असफलता या पारस्परिक संबंधों में परेशानियाँ। वास्तव में यह सूचित कारक सिर्फ एक संचालक है। यह किसी वास्तविक स्थिति का संकेत नहीं है।

आत्महत्या कीप्रवृतिका सटीक, बिना किसी अलार्म के वर्णन करें: सूचक भाषा का उपयोग करें; अतिशयोक्ति का उपयोग न करें। उदाहरण के लिए, "आत्महत्या बढ़ रही है," सही है, लेकिन अंग्रेजी में 'एपिक' या 'प्रकांड' और ‘गगनचुंबी’ जैसे शब्दों का उपयोग सही नहीं है।

आत्महत्या को सनसनीखेज या सामान्य बनाने वाली भाषा का उपयोग करने से बचें: आत्महत्या कोई अपराध नहीं है और न ही कोई पाप है। यह कायरता या वीरता नहीं है। इस तर्क को अगर विस्तृत करें तो आत्महत्या करने वाले और आत्महत्या के प्रयासों से बच निकले लोग नायक, बेकार या कायर नहीं होते हैं।

सुर्खियों में'आत्महत्या' शब्द और अखबार के पहले पन्ने या अपराध सम्बन्धी ख़बरों के पन्ने परआत्महत्या की घटनाको प्रमुखता देने से बचें: आपको ध्यान रखना होगा कि कौनसी खबर सूचित करने योग्य है और कौनसी खबर सनसनीखेज बनने के योग्य है। सनसनीखेज रपट से कमजोर लोगों को आत्महत्या करने के लिए प्रेरणा मिलती है। खासकर अगर खबर किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की आत्महत्या को लेकर हो।

तटस्थ सुर्खियों का उपयोग करें: हालाँकि घटना को लेकर पाठकों की उत्सुकता अपरिहार्य है पर खबर के बारे में लिखते समय संवेदनशीलता और जिम्मेदारी भूली नहीं जा सकती।

भाषा के असंवेदनशील उपयोग से बचें: भाषा विचारों का दर्पण है जो सामाजिक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करता है। ऐसे शब्दों का उपयोग करने से बचें जो आत्महत्या को एक आपराधिक ढांचे में डालता है। आत्महत्या शब्द का मुद्दे से बाहर प्रयोग करने से बचें और / या जैसे "असफल आत्महत्या," "आत्मघात की महामारी" या "राजनीतिक आत्महत्या" जैसे असंवेदनशील उपयोग से बचें। ये शब्द नकारात्मक रूढ़ियों को मजबूत करते हैं। इसके बजाय, संवेदनशील और सूचित उपयोग समस्या का समाधान करता है। उदाहरण के लिए, "आत्महत्या की" कहने के बजाय "आत्महत्या से मरे या आत्महत्या से मौत हुई"। "आत्महत्या की महामारी" के बजाय 'आत्महत्या की बढ़ती दर' कहें।

आत्महत्या की विधि के स्पष्ट विवरण से बचें: इस तरह के विवरण मृतक और उनके परिवारों की गरिमा और गोपनीयता का उल्लंघन करते हैं। वे उन लोगों के लिए संभावित संचालक भी हैं जो आत्मघाती विचारों का अनुभव कर रहे हैं।

मृतक और उनके परिवारों के चित्र या वीडियो का उपयोग करने से बचें; सुसाइड नोट को प्रकाशित न करें: उत्तरजीवियों को इस घटना से आघात लगता है। इस तरह की चीज़े प्रकाशित करने से उनकी गरिमा और गोपनीयता का उल्लंघन होता है। ऐसी घटनाओं में मृतक की गरिमा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि चित्र प्रकाशित करना जरूरी है तो उस व्यक्ति की कोई पुराणी तस्वीर का इस्तेमाल करें।

मदद की उपलब्धि की जानकारी दें: मदद के संसाधनों की एक व्यापक सूचि शामिल करने से यह मजबूत संदेश जाता है कि आत्महत्या को रोका जा सकता है। आत्महत्या करने से बचे लोगों के लिए प्रासंगिक जानकारी प्रकाशित करें जिससे उन्हें उचित मनोसामाजिक हस्तक्षेप और समर्थन मिल सके। इससे उत्तरजीवियों को उस दुर्घटना के बाद अपने जीवन का पुनर्निर्माण करने में मदद मिलेगी।

उत्तरजीवियों का ध्यान रखें: दुर्घटना के तुरंत बाद साक्षात्कार, ऑडियो रिकॉर्ड या तस्वीरों की माँग न करें। उनके दर्द और सम्मान के अधिकार की इज्जत अपरक्राम्य है; आपकी जानकारी की आवश्यकता जो इस खबर को सूचित करने योग्य बनाएगी, इस हालात में समान महत्व नहीं रखती है।

आत्महत्या से जुड़े बड़े मुद्दों पर ध्यान दें: यह आत्महत्या के सार्वजनिक स्वास्थ्य पहलू के बारे में जागरूकता बढ़ाने का एक जबरदस्त मौका है। प्रासंगिक आँकड़े, आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य के बारे में विशेषज्ञों का कथन, और छोटे इन्फोग्राफिक जो आत्महत्या की चेतावनी के संकेतों को सूचीबद्ध करते हैं और यह बताते है कि हम सब इसकी रोकथाम में कैसे मदद कर सकते है, शामिल करें।

कहानियों में आशावाद और उम्मीद का सहारा लें: विशेषज्ञ बताते हैं की किस तरह समय पर हस्तक्षेप करके आत्महत्या को रोका जा सकता है। इनके कथन को रपट में शामिल करें। इसके अलावा आत्महत्या के प्रयास से बचे और उत्तरजीवी, जिन्होंने सही समय पर हस्तक्षेप से आत्महत्या को रोककर अपने जीवन का पुनर्निर्माण किया है और इस दुर्घटना से उभर कर अपने जीवन के अर्थ और उद्देश्य को खोजने की कोशिश की है, उनके कथन को भी शामिल करें।

अंत में, कृपया कोई धारणा न बनायें और लेबल न लगाएं, क्योंकि हममें से अधिकांश इस एहसास को दूर-दूर तक नहीं समझ पाएंगे जब तक हम खुद किसी ऐसे अनुभव से नहीं गुज़रते हैं।

डॉ नंदिनी मुरली संचार, लैंगिक और विविधता से जुड़ी एक पेशेवर है। आत्महत्या हानि की हालिया उत्तरजीवी, उन्होंने आत्महत्या पर चर्चाओं को बदलने और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए एमएस चेलामुथू ट्रस्ट एंड रिसर्च फाउंडेशन, मदुरै की पहल परस्पीककी स्थापना की है। उन्होंने बाउंस फॉरवर्ड की स्थापना भी की, जो लोगों को दुःख से उबरने और अपने जीवन में बदलाव लाने में मदद करता है।

संदर्भ:

- 'रिपोर्टिंग ऑन सुसाइड', सिंडी दोशमैन - रुइटज द्वारा,

https://www।poynter।org/archive/2003/reporting-on-suicide/ 

- 'प्रेवेंटिंग सुसाइड: अ रिसोर्स फॉर मीडिया प्रोफेशनल्स' विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर सुसाइड प्रिवेंशन (IASP) द्वारा https://www।who।int/mental_health/prevention/suicide/resource_media।pdf

 

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