डॉ. नंदिनी मुरली

अर्धविराम

आत्महत्या हानि का उत्तरजीवी होने का क्या मतलब है? - डॉ. नंदिनी मुरली

जिस व्यक्ति को आप खो चुके हैं, उसके लिए दर्द खत्म हो गया है। अब आपको अपने दर्द का मरहम ढूंढना है।

-अ हैण्डबुक फॉर सर्वाईवर्स ऑफ सुसाइड,जेफरी जैक्सन

सर्वाईवर्स ऑफ सुसाइड यानि 'आत्महत्या हानि के उत्तरजीवी' - इन शब्दों के साथ मेरा परिचय पिछले साल हुआ, मेरे पति के आत्महत्या के बाद। तब तक, आत्महत्या से मृत्यु मेरे लिए कुछ ऐसा था, जो दूसरों के साथ होता था। ऐसा अन्य परिवारों में हुआ करता है, मेरे परिवार में नहीं। आत्महत्या से मरने वाले लोगों बेनाम, अपरिचित आकड़े हुआ करते थे। इस दर्दनाक वास्तविकता का सामना करने के बाद मेरा यह भ्रम भी टूट गया।

आत्महत्या का उत्तरजीवी वह व्यक्ति होता है जिसने अपने प्रियजन को आत्महत्या जैसी दर्दनाक हादसे में खो दिया है। परिवार का एक करीबी सदस्य, एक प्रिय मित्र, सहयोगी या स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर (विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर) इनमें से कोई भी किसी भी समय आत्महत्या का उत्तरजीवी हो सकता है।

“आप 'आत्महत्या के उत्तरजीवी' हैं, और इस अनचाहे पदनाम का तात्पर्य है, आपका अस्तित्व - आपका भावनात्मक अस्तित्व - इस बात पर निर्भर करेगा कि आप अपनी त्रासदी से निपटने के लिए कितनी अच्छी तरह सीखते हैं। बुरी खबर यह है कि इससे उबरना जीवन का दूसरा सबसे बुरा अनुभव होगा,” आत्महत्या के उत्तरजीवी जेफरी जैक्सन ने अ हैण्डबुक फॉर सर्वाईवर्स ऑफ सुसाइड में लिखा है।

जैसा कि हम सभी जानते हैं आत्महत्या स्व-प्रेरित मौत है। अग्रणी सुसाइडोलॉजिस्ट एडविन श्नीडमैन, आत्महत्या का वर्णन "मन की पीड़ा" या तीव्र मनोवैज्ञानिक दर्द के रूप में करते हैं। आश्चर्य की बात नहीं है कि, आत्महत्या से होने वाली 90 प्रतिशत मौतों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को एक पूर्ववर्ती कारक के रूप में पहचाना गया है। अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ सुसाइडोलॉजी के मुताबिक, "आत्महत्या का प्राथमिक लक्ष्य जीवन खत्म करना नहीं, बल्कि दर्द को खत्म करना है।"

आंकड़े वास्तव में गंभीर हैं।

-वैश्विक स्तर पर, हर साल 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं

-दुनिया में हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है

-प्रत्येक 41वें  सेकंड में किसी को इस दर्द से जूझने के लिए छोड़ दिया जाता है

-आत्महत्या किसी भी उम्र का व्यक्ति कर सकता है

-विश्व स्तर पर 15-29 वर्ष आयुवर्ग के बीच यह मौत का दूसरा प्रमुख कारण है

-भारत में आत्महत्या मृत्यु दर प्रति एक लाख लोगों में 15.7 है, और इसका क्षेत्रीय औसत 12.9 है (डब्ल्यूएचओ 2015-17)

मृत्यु और इसके परिणामस्वरूप प्रियजन को खो देने की गहरे दुख की भावनाओं का अनुभव होना सार्वभौमिक है। हालांकि कहा जाता है कि आत्महत्या से मौत किसी अन्य तरह की मौत से अलग होता है। दुर्घटनाओं में मौत, हत्या और अन्य प्रकार के अप्रत्याशित मौत की तरह, आत्महत्या दर्दनाक मौत का एक और रूप है। हालांकि, आत्महत्या से घटी मृत्यु के शोक से जूझ रहे व्यक्तियों को उस तरह की करुणा और सहानुभूति नहीं मिलती जैसा अप्रत्याशित व दर्दनाक मौत घटने पर जताया जाता है।

सहानुभूति की इस भारी कमी से आत्महत्या का उत्तरजीवी व्यक्ति खुद को समाज से कटा हुआ और अलग-थलग सा महसूस करता है। अमेरिकी साइकिएट्री असोसिएशन (एपीए) का कहना है कि आत्महत्या का शोक "आपदाजनक" है और किसी कॉन्सेंट्रेशन कैंप (एकाग्रता शिविर) के अनुभव के बराबर है। एपीए के अनुसार, आत्महत्या से मरने वाले व्यक्तियों के परिवार के सदस्यों में- जिसमें माता-पिता, बच्चें और भाई-बहन शामिल हैं - आत्महत्या करने की संभावना का जोखिम दूसरों की तुलना में लगभग 400 गुना बढ़ जाता है।

आत्महत्या के उत्तरजीवी अदृश्य और हाशिए पर पहुंच जाने वाले लोग होते हैं। उन्हें अक्सर दोष, निर्णायकता या सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है,  जबकि बीमारी, दुर्घटना, बुढ़ापे या अन्य प्रकार की मौतों से मरने वाले के प्रियजनों को आमतौर पर दूसरों से सहानुभूति और करुणा मिलती है। इसके कारण आत्महत्या हानि के उत्तरजीवी लोगों के लिए दुख और शोक प्रकट करने की प्रक्रिया जटिल होती है। यह आत्महत्या से जुड़े कलंक, शर्म, गोपनीयता और आत्महत्या को  लेकर चुप्पी के आधार पर नकारात्मक सामाजिक दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम आत्महत्या की वास्तविकता को नकारते हुए इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और मानसिक स्वास्थ्य समस्या के बजाय नैतिकता के नज़रिए से देखते हैं।

अंडरस्टैंडिंग सर्वाइवर्स ऑफ सुसाइड लॉस में डेबोरा सेरानी लिखती हैं, "यह अजीब बात है कि हम कभी भी किसी प्रियजन को कैंसर या अल्जाइमर होने के लिए परिवार के सदस्य को दोष नहीं देंगे, लेकिन समाज, प्रियजन की आत्महत्या की छाया उसके उत्तरजीवी पर डालना जारी रखता है।"

आत्महत्या के साथ शर्म की भावना मज़बूती से जुड़ा हुआ है। आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के अधिकांश परिजन मरने वाले व्यक्ति एवं उसकी आत्महत्या के बारे में बात नहीं करते हैं। हम इसे स्वीकार करने में बहुत शर्मिंदा महसूस करते हैं। इसके बजाए, हम मौत के कारण के रूप में हम ऐसे 'स्वीकार्य' स्पष्टीकरण पैदा करते हैं, जिन्हें हम दूसरों को बताने के लिए चुनते हैं। यदि किसी प्रियजन की मौत आत्महत्या से होती है और कोई हमें मृत्यु के कारण के बारे में पूछता है, तो हम अक्सर कहते हैं, "उसे दिल का दौरा पड़ा था" या मौत का कोई ऐसा अन्य 'स्वाभाविक' कारण बताते हैं, जो सामाजिक रूप से स्वीकार्य है।

हम आत्महत्या को महिमा मंडित करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं और न ही हम इसकी निंदा कर रहे हैं। आत्महत्या करने वाले लोग न तो हीरो हैं, न डरपोक, और न ही अपराधी। आत्महत्या कोई अपराध नहीं है। यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। यह एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या है जो इलाज योग्य और रोकथाम योग्य है।

जागरूक दृष्टिकोण आत्महत्या पर होने वाली चर्चाओं को बदल सकता हैं और प्रियजन की आत्महत्या का दर्द झेल रहे लोगों के जीवन के पुनर्निर्माण के लिए सहायक वातावरण सुनिश्चित कर सकता है।

डॉ. नंदिनी मुरली संचार, लैंगिक और विविधता से जुड़ी एक पेशेवर है। आत्महत्या हानि की हालिया उत्तरजीवी, उन्होंने आत्महत्या पर चर्चाओं को बदलने और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए एमएस चेलामुथू ट्रस्ट एंड रिसर्च फाउंडेशन, मदुरै की पहल परस्पीककी स्थापना की है।