कार्यक्षेत्र

नियोक्ता को मानसिक समस्याओं के विषय में अधिक संवेदनशील और जागरूक होने की आवश्यकता है

वाइट स्वान फ़ाउंडेशन

व्हाइट स्वान फाउंडेशन की रंजीता जेउर्कर ने दो मानव संसाधन कर्मियों* से बात की वास्तव परिस्थिति के बारे में जानने के लिए: मानसिक रोगी अगर काम करते रहना चाहते है, या काम पर वापस लौटना चाहते हैं तो संगठनों में उनकी सहायता के लिए किस तरह की नीतियाँ बनी हुई हैं? उन्होंने यह कहा:
*उनके अनुरोध पर नामों को गोपनीय रखा गया है

कार्यक्षेत्रों में मानसिक बिमारी से जुझ रहे लोगों को साथ लेकर चलने के विषय में क्या सोच है?

  1.  मेरी राय में चाहे समस्या कितनी भी गंभीर क्यों न हो, ज्यादातर कार्यक्षेत्र मानसिक बिमारी से जुझ रहे व्यक्तियों को सहारा देने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसा जानबूझकर नहीं होता है। केवल मानव संसाधन कर्मियों की ही नहीं, सभी कर्मियों में जागरूकता और उनकी ट्रेनिंग से मदद मिल सकती है। कुछ संगठन अधिक भरपाई करते हैं और काउंसेलर/ थेरपिस्ट की भूमिका निभाने की कोशिश करते हैं और अन्य संगठनों में व्यक्ति की जरूरतों के प्रति संवेदनशीलता मौजूद नहीं होती है।
  2. यह अलगाववाद जानबूझकर नहीं किया जाता है। मानसिक रोग से जुझ रहा व्यक्ति दूसरों से मेलजोल रखना नहीं चाहता होगा या सक्रिय रूप से कार्यक्षेत्र के दलों में स्वयं को शामिल नहीं करता होगा। दूसरी चुनौती यह है कि अगर व्यक्ति को स्किज़ोफ़्रेनिया जैसी गंभीर बिमारी हो, और बाकी लोगों को यह पता न हो कि उसे साथ लेकर कैसे चलना है तो चाहकर भी वे उसकी मदद नहीं कर सकते है। शारीरिक विकलांगतावाले व्यक्तियों की समस्या सब देख पाते है। संगठन परिवर्तन ला सकते हैं और मदद कर सकते हैं। मानसिक रोगी की मदद आप कैसे कर सकते हैं? इस विषय पर जागरूकता, ट्रेनिंग और संवेदनशीलता की कमी के कारण कोई स्पष्ट धारणा नहीं है। और अधिकतर मानसिक रोगी अपनी समस्या का खुलासा करने से डरते हैं, जिससे और ज्यादा मुश्किल होती है।

आम तौर पर किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है मानसिक रोगियों को कार्यक्षेत्रों में?

  1. मानसिक रोगियों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है जिसमें शामिल है ऐसे टीमों के साथ काम करना जिसमें विभिन्न मानसिकता वाले व्यक्ति होते हैं। इनके लिए अपनी भावनाओं को सम्भालना और दूसरों के साथ बातचीत कर पाना कठिन होता है। प्रबंधक के साथ निपटने में उन्हें दिक्कत आ सकती है, विशेषकर अगर प्रबंधक की नेतृत्व पद्धति उनके अनुरूप न हो। उन्हें संगठन की ऐसी नीतियों से निपटना पड़ सकता है जो लचीले न हो, और मानसिक समस्या से जुझ रहे व्यक्ति की जरूरतों को नज़रअंदाज़ करते हो। इसके अलावा, वे संगठन के अनौपचारिक दलों में शामिल नहीं हो पाते हैं, और बाहरी व्यक्ति जैसे लग सकते हैं।
  2. जब कोई कहता है कि उन्हें कोई शारीरिक बिमारी है तो हम उससे आगे कोई सवाल नहीं पूछते हैं। जब वे बिमारी से स्वस्थ्य होकर छुट्टी से वापस लौटते हैं तो उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वे अपनी पुरानी गति से काम करेंगे और भरपाई कर देंगे। मानसिक रोगियों के लिए ऐसा कर पाना हमेशा संभव नहीं होता है। यह एक बहुत बड़ी चुनौती है।  

जो नियोक्ता मानसिक समस्याओं से जुझ रहे व्यक्तियों को नौकरी पर रखते हैं उन्हें किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

  1. अधिकतर नियोक्ताओं में जागरूकता या आत्मविश्वास की कमी होती है जो एक रोगग्रस्त व्यक्ति के साथ काम करने के लिए आवश्यक है। संवेदनशीलता की भी कमी होती है ऐसे व्यक्ति के प्रति जिसे लचीले सांगठनिक नीतियों की जरूरत है। लोगों का यह मानना है कि मानसिक रोग भोग रहे व्यक्तियों की जरूरतों की देखभाल करने का दायित्व केवल मानव संसाधन कर्मियों का है; इस कारण अन्य कर्मी इसे अपनी ज़िम्मेदारी नहीं मानते हैं।
  2. जब किसी व्यक्ति को मानसिक रोग होता है, उसका प्रदर्शन खराब हो सकता है। इसका असर कम्पनी की प्रगति पर पड़ता है। आप किस तरह से व्यक्ति की देखभाल करते हुए अपनी टीम की दक्षता और प्रदर्शन का मान बनाए रखेंगे? आप इस परिस्थिति का मुकाबला कैसे करेंगे जब आपकी टीम के आंतरिक समीकरण बदल जाते हैं? उस व्यक्ति की भूमिका का आप क्या करेंगे? शुरूआती दौर में कम्पनियां उन्हें सहारा देने की कोशिश करते हैं। लेकिन समय के साथ कम्पनी को भी समझ नहीं आता कि क्या करें – विशेषकर अगर व्यक्ति का प्रदर्शन लगातार खराब हो रहा हो, या उसे आये दिन छुट्टी लेनी पड़े। उनकी क्षमता बदल सकती है – आप कैसे उसका साथ निभाएंगे? आप कितने लचीले हो सकते हैं? क्या आपके पास ऐसे संसाधन है जिससे आप उनकी बदलती जरूरतों को सहारा दे पाएं? और यह सब करते हुए इस बात का ख्याल रखना पड़ेगा कि इसका असर कम्पनी के मुनाफ़े पर कैसा होगा…

इस परिस्थिति से निपटने के क्या उपाय हैं नियोक्ता और कर्मचारियों के पास?

  1. फ्रीलान्सिंग (स्वच्छंद भूमिका) और परामर्श भूमिकाएं वैकल्पिक उपाय हैं। लेकिन नियोक्ता भी कार्य को कैसे और कब किया जाए इसे लेकर लचीलापन दिखा सकते हैं। कर्मी को भी परिणाम दिखाना पड़ेगा और भरोसा जीतना पड़ेगा, लेकिन एक पूरी-अवधि की भूमिका में भी नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के पास यह मौका रहता है कि वे विभिन्न तरह की कार्य व्यवस्था को टटोलें।
    दूसरा उपाय है परीक्षण करना। यह एक इंटर्नशिप या स्वयं सेवा या अल्पावधि अनुबंध के रूप में हो सकता है, जिससे दोनों पक्षों को यह देखने का मौका मिलता है कि यह असरदार है या नहीं।
  2. कर्मचारी एक आसान भूमिका चुन सकता है - फ्रीलान्सिंग (स्वच्छंद भूमिका), या किसी ऐसे काम को चुनना जिसमें तनाव या दबाव कम हो। या वह किसी ऐसे संगठन को चुन सकता है जो अपनी सम्मेलन नीतियों के लिए जाना जाता हो – एसएपी और लेमन ट्री का नाम तुरंत दिमाग में आता है। एक ऐसी जगह काम करना आसान होता है जहां पहले से ही विविधता का माहौल हो। दूसरा उपाय यह है कि अपने प्रबंधक या मानव संसाधन सहकर्मी के साथ अपनी चुनौतियों को लेकर आलोचना करें। उन्हें बताएं कि आपका बुरा समय चल रहा है और आपको सहारे की आवश्यकता है। इस स्थिति में यह महत्वपूर्ण है कि आप अपनी जरूरतों की व्याख्या स्पष्ट शब्दों में करें। पहले से निर्णीत कर लें कि आपके इस खुलासे का क्या असर हो सकता है, और सावधानी से बात को आगे बढाएं। आपको उनकी मदद करनी होगी यह समझने में कि आपको थोड़ी छूट चाहिए, या थोड़ा समय चाहिए।

क्या ऐसे विशेष संस्थान या क्षेत्र हैं जो उन लोगों की जरूरतों के प्रति जागरूक हैं जिन्हें मानसिक समस्याएं हैं?

  1. मुझे लगता है कि गैरलाभकारी क्षेत्र मानसिक रोगों के जुझ रहें लोगों की जरूरतों के बारे में अधिक सचेतन हैं। लेकिन साथ ही यह भी कहूँगी कि गैरलाभकारी संस्थानों में और अधिक जागरूकता पैदा करने की जरूरत है और एक ऐसा कार्य परिसर तैयार करने की जरूरत है जो मानसिक रोगों से जुझ रहे व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील हो। कुछ सरकारी और पब्लिक सेक्टर संगठन भी अन्य क्षेत्रों से अधिक सहायक होते हैं। कुछ भविष्यवादी सॉफ्टवेयर संगठन भी कोशिश कर रहें हैं अधिक स्वीकारक बनने की।

किस तरह से संगठन और कर्मचारी एक ऐसा रास्ता अपना सकते हैं जो दोनों के हित में हो?

  1. मुझे लगता है कि दोनों पक्षों के बीच विश्वास स्थापित करना महत्वपूर्ण है। जैसा कि मैंने आपसे पहले कहा था, स्वल्पकालिक परीक्षण अवधि व्यावहारिक समाधान खोजने में मदद कर सकता है।

अगर आप अभी किसी मानसिक रोग से उबरे हों और किसी नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जा रहें हो, तो आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? कौनसी बातें का खुलासा करना चाहिए?

  1. कुछ कार्यक्षेत्रों की संस्कृति दूसरों के मुकाबले अधिक विनम्र होती हैं। इसलिए मैं उस जगह की संस्कृति के बारे में जितना हो सके जानने की कोशिश करूँगा; अपने प्रबंधक के बारे में, और उस टीम के बारे में, जिसका मैं हिस्सा बनने जा रहा हूँ।
    ऐसी समस्याओं के बारे में बता देना अच्छा है जिनका असर आपके काम या कार्यक्षेत्र में होने वाले मेलजोल पर पड़ सकता है। यह तब अधिक महत्वपूर्ण बन जाता है जब आप चाहते हैं कि नियोक्ता आपको काम के विषय में कुछ रियायतें या लचीलापन दे। ऐसे ही भरोसा बढता है।
    दूसरा सवाल यह है कि यह खुलासा कब करें? क्या पहली बार ही आपको पूरी बात बता देनी चाहिए, या आखिरी इंटरव्यू के दौरान जब आप लगभग निश्चित हैं कि नौकरी आपको ही मिल रही है, या कि प्रस्ताव मिल जाने के बाद? मुझे लगता है कि पहली या दूसरी मुलाकात में ही आपको इस विषय पर आलोचना करनी चाहिए जब प्रबंधक और मानव संसाधन कर्ता साथ हों।

मानसिक रोग से जुझ रहे लोगों को ध्यान में रखते हुए हमें भविष्य में अपनी व्यवस्था नीति में किस तरह के बदलाव लाने चाहिए?

  1. अगर हमें ऐसे कार्यक्षेत्र बनाने हैं जहां मानसिक रोगों से लड़ रहें व्यक्ति भी काम कर सकें तो पहले हमें कार्य व्यवस्था के ऐसे उदाहरणों को देखना होगा जहां ऐसा सफलतापूर्वक किया गया है। विविधता और सम्मेलन पर कार्यशालाएं होनी चाहिए, जिसमें हर तरह की विकलांगता पर चर्चा होनी चाहिए, खासकर मानसिक रोगों पर। संगठनों को काउंसेलर या थेरपिस्ट की मदद लेनी चाहिए समस्याओं को समझने के लिए और मानसिक रोग से जुझ रहे कर्मी के साथ कैसे पेश आना चाहिए इस जागरूकता के विकास के लिए।
  2. आजकल ज्यादातर कार्पोरेट कम्पनियां सिर्फ पैसे और मुनाफ़े के बारे में सोचती हैं। जिसका अर्थ यह है कि वे दूसरे कारकों को मान्यता नहीं देते हैं। स्थिति में बदलाव लाने के लिए हमें सोच बदलनी होगी। यह भी महत्वपूर्ण है कि विकलांगता के विषय पर होनेवाली हर आलोचना में मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा उठाया जाना चाहिए।                      
वाइट स्वान फाउंडेशन
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