अपने अवसाद के बारे में मैंने अपने बॉस से कैसे बात की थी

मैंने अपनी वर्तमान भूमिका में जब काम करना शुरू किया, तो मुझे कई आशंकाएं थीं, उनमें से कुछ मेरी मानसिक बीमारी से संबंधित थीं। यह नौकरी करने के एक साल बाद तक मैने वास्तव में अपनी मानसिक बीमारी के बारे में खुल कर बात नहीं की। मैंने अपने बॉस को बताया कि मेरे सहयोगियों कैसे काम करते हैं, जिससे मुझे व्यग्रता होती थी। मुझे पता था कि मेरे बॉस को भी अवसाद था, और वह इस तरह से खतरे को दूर ले गया। 

उसकी चिंताएं व्यावहारिक थीं, जैसे यह मेरे कार्यक्रम को कैसे प्रभावित करेगा और मैं कैसे इसे प्रबंधित कर सकता हूं; और हमने सोचकर मेरी चुनौतियों से निपटने के लिए तंत्र स्थापित किया। चूंकि मेरे सहयोगियों को अब पता चल गया है, वे सहयोगी और सहानुभूति रखने वाले हैं।

मेरा काम मुझे स्वतंत्रता और लचीलापन देता है जो मेरा सहयोग करता है। मैं कभी-कभी अनुभव करता हूं कि मेरी अपरंपरागत दिनचर्या है, जो रचनात्मकता की प्रेरणा के लिए जगह बनाती है। जिस दिन मैं बहुत रचनात्मक नहीं होता हूँ, तो मैं दस्तावेज़ीकरण जैसे नियमित कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहता हूं। जब मैं ठीक महसूस नहीं करता हूं, और सहयोग प्राप्त कर सकता हूं, तो मैं स्पष्ट कर सकता हूं। लेकिन मैं कहूंगा, मैं नौकरी देने वालों को सलाम करता हूँ। मैं जो कुछ भी कर पा रहा हूं वह इसलिए क्योंकि वे ऐसे हैं।

मेरा मानना ​​है कि समय पर हस्तक्षेप, सहयोग और ईमानदारी के साथ रहें, अवसाद या व्यग्रता से ग्रस्त लोगों को काम छोड़ने की ज़रूरत नहीं है। वे इससे बच कर चल सकते हैं और ऐसी भूमिका ले सकते हैं जो उन्हें उत्तेजित और सहयोग करती हो।

अरुणा रमन एक सामाजिक प्रर्वतक और एक शिक्षक हैं।

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